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न कोई पुजारी, न कर्मकांड! जानिए क्या हैं बहाई धर्म के अनोखे नियम और परंपराएं

बहाई धर्म 19वीं सदी के आसपास ईरान से शुरू हुआ एक ऐसा धर्म है, जिसके मानने वाले आज पूरी दुनिया में मौजूद हैं. इसकी स्थापना बहाउल्लाह ने की थी. ये धर्म सभी धर्मों की मौलिक एकता, विश्व शांति और मानवता के कल्याण का संदेश देता है.

न कोई पुजारी, न कर्मकांड! जानिए क्या हैं बहाई धर्म के अनोखे नियम और परंपराएं

दुनिया में 19वीं सदी के मध्य में एक ऐसे धर्म की शुरुआत हुई, जो पूरी दुनिया को एक परिवार मानता है. इसे बहाई धर्म कहा जाता है. इसकी नींव मिर्जा हुसैन अली नूरी ने रखी थी, जिन्हें इतिहास में बहाउल्लाह के नाम से जाना जाता है.

अरबी भाषा में बहाउल्लाह का मतलब ईश्वर की महिमा होता है. इस धर्म की शुरुआत ईरान से एक सामाजिक और धार्मिक आंदोलन के रूप में हुई थी. बाद में इराक में बहाउल्लाह ने औपचारिक रूप से इसका ऐलान किया. इस धर्म का मूल सिद्धांत सभी धर्मों की मौलिक एकता और पूरी इंसानियत को एक सूत्र में पिरोना है.

ईरान में बाब की घोषणा और दमन का दौर

बहाई धर्म की जड़ें वास्तव में बाबी संप्रदाय से जुड़ी हुई हैं. इसकी शुरुआत 1844 में ईरान के शिराज शहर में मिर्जा अली मोहम्मद ने की थी. उन्होंने खुद को बाब यानी ईश्वर का द्वार घोषित किया था.

उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि जल्द ही दुनिया में एक नया पैगंबर आएगा. उनके विचारों का ईरान के मुस्लिम धर्मगुरुओं और सरकार ने जमकर विरोध किया. इसके बाद बाब को गिरफ्तार कर लिया गया और 1850 में उन्हें सजा-ए-मौत दे दी गई. उनके अनुयायियों पर भी भारी अत्याचार किए गए.

बहाउल्लाह का आगमन और नए युग की शुरुआत

बाब के सबसे प्रमुख शिष्यों में मिर्जा हुसैन अली नूरी शामिल थे. उन्होंने अपना पुराना रुतबा छोड़कर बहाउल्लाह नाम अपनाया. 1852 में तेहरान की जेल में उन्हें अहसास हुआ कि वे ही वह पैगंबर हैं, जिसकी भविष्यवाणी बाब ने की थी.

जेल से छूटने के बाद उन्हें बगदाद भेज दिया गया. 1863 में बहाउल्लाह ने जनता के सामने अपने पैगंबर होने का ऐलान किया. इसके बाद बाब के ज्यादातर अनुयायी बहाउल्लाह के साथ जुड़ गए और उन्हें बहाई कहा जाने लगा. बाद में ऑटोमन साम्राज्य ने उन्हें तुर्की और इजराइल के अक्रा शहर में नजरबंद कर दिया.

समुदाय का विस्तार और नेतृत्व की परंपरा

1892 में बहाउल्लाह के निधन से पहले उन्होंने अपने बड़े बेटे अब्दुल बहा को समुदाय का अगला प्रमुख और अपने विचारों का आधिकारिक व्याख्याकार नियुक्त किया. अब्दुल बहा ने बहाई धर्म के संदेश को उत्तर अमेरिका, यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों तक पहुंचाया.

उनके बाद उनके पोते शौगी एफेंदी रब्बानी ने इस सिलसिले को आगे बढ़ाया. 1960 के दशक के बाद से बहाई धर्म का दुनिया भर में तेजी से प्रसार हुआ. 21वीं सदी की शुरुआत तक दुनिया भर में सैकड़ों राष्ट्रीय और हजारों स्थानीय प्रशासनिक संस्थाएं बन चुकी थीं.

अनोखी परंपराएं, प्रार्थना और नियम

बहाई धर्म की अपनी अलग परंपराएं और जीवनशैली है. इस धर्म में कोई पुजारी वर्ग, दीक्षा समारोह या जटिल कर्मकांड नहीं होते हैं. हर बहाई के लिए रोज प्रार्थना करना, नशीले पदार्थों से दूर रहना और एकनिष्ठा से शादी के नियमों का पालन करना जरूरी है.

बहाई कैलेंडर में 19 महीने होते हैं और हर महीने में 19 दिन होते हैं. 15 से 70 साल के लोगों के लिए साल में 19 दिन का उपवास रखने का नियम है. दुनिया भर में इसके कई मशहूर उपासना गृह यानी बहाई मंदिर हैं, जहां सभी धर्मों के ग्रंथों का पाठ किया जाता है.

लोकतांत्रिक चुनाव और सर्वोच्च संस्था का गठन

बहाई समाज के संचालन के लिए एक पारदर्शी और लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाई गई है. स्थानीय स्तर पर बिना किसी चुनाव प्रचार या पार्टीबाजी के संस्थाओं का चुनाव होता है. राष्ट्रीय स्तर पर चुनिंदा प्रतिनिधि मिलकर राष्ट्रीय संस्था चुनते हैं.

दुनिया भर की राष्ट्रीय संस्थाएं मिलकर एक सर्वोच्च संस्था को चुनती हैं, जिसे यूनिवर्सल हाउस ऑफ जस्टिस कहा जाता है. इस सर्वोच्च संस्था का मुख्यालय इजराइल के हैफा शहर में स्थित है. यह संस्था बहाई नियमों का पालन कराने और दुनिया भर के सामाजिक कार्यों की देखरेख का काम करती है.

(Disclaimer): यह लेख ऐतिहासिक दस्तावेजों, प्रामाणिक संदर्भों और बहाई धर्म से जुड़ी आधिकारिक जानकारियों पर आधारित एक विवरणात्मक रिपोर्ट है. इसका उद्देश्य पाठकों तक विभिन्न वैश्विक धर्मों और उनकी परंपराओं की निष्पक्ष जानकारी पहुंचाना है.

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About the Author

Harsh Singh

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हर्ष सिंह जी न्यूज डिजिटल में एक अनुभवी और धारदार शैली के पत्रकार हैं. उन्होंने मार्च 2024 में जी न्यूज जॉइन किया था. वर्तमान में हर्ष धर्म और ज्योतिष से जुड़ी खबरों की खास कवरेज कर रहे हैं. वे देश-दुनिया के धार्मिक आयोजनों, अध्यात्म और ज्योतिषीय गणनाओं से जुड़े जरूरी अपडेट्स दर्शकों तक पूरी सटीकता के साथ पहुंचाते हैं. हर्ष को उनकी फैक्ट-आधारित और भरोसेमंद लेखन शैली के लिए जाना जाता है.बनारस के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट-ग्रेजुएशन करने वाले हर्ष अपनी पूरी ऊर्जा और समझ के साथ धर्म-कर्म और ऐस्ट्रो की दुनिया के खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं.अगर आप हर्ष सिंह से संपर्क करना चाहते हैं या उनसे जुड़ा कोई सुझाव साझा करना चाहते हैं, तो उन्हें इस ईमेल आईडी पर लिख सकते हैं: Harsh.singh@India.com
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