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हिंदू पंचांग का सातवां महीना यानी आश्विन मास इस साल 27 सितंबर 2026, रविवार से शुरू होने जा रहा है. धर्म के लिहाज से देखें तो ये महीना खुद पर काबू रखने और पूजा-पाठ करने का समय माना जाता है.
आश्विन का महीना भाद्रपद की समाप्ति के बाद आता है और अपने साथ कई बड़े धार्मिक बदलाव लेकर आता है.इस पूरे महीने घर में सादगी और शुद्धता रखने के लिए शास्त्रों में कुछ खास नियम बताए गए हैं.
27 सितंबर से दैनिक जीवन में कई परिवर्तन आ जाएंगे, जिनका पालन करना हर सनातन धर्म को मानने वाले व्यक्ति के लिए बहुत जरूरी होता है.
कहा जाता है कि आश्विन मास के शुरू होते ही कुछ ऐसे काम हैं जिन्हें करने की सख्त मनाही होती है, ताकि घर में निगेटिव ऊर्जा न आए और पितरों के साथ-साथ मां दुर्गा का आशीर्वाद बना रहे.
आश्विन महीने का पहला पखवाड़ा पितृ पक्ष के रूप में जाना जाता है, जो पूरी तरह से पूर्वजों को समर्पित होता है. इस दौरान किसी भी तरह की नई चीजों की खरीदारी करने से बचना चाहिए.
नई गाड़ी, संपत्ति, नए कपड़े या घर के लिए कीमती सामान खरीदना इस अवधि में अशुभ माना गया है. इसके अलावा गृह प्रवेश, मुंडन, सगाई या विवाह जैसे मांगलिक कार्यों पर भी पूरी तरह रोक रहती है.
शास्त्रों के अनुसार, पितृ पक्ष का समय उत्सव मनाने का नहीं बल्कि पितरों के प्रति आभार व्यक्त करने और तर्पण करने का होता है. इसलिए इस दौरान सादगी से रहना ही अच्छा माना जाता है.
27 सितंबर से अपने खान-पान में भी बड़ा बदलाव करना आवश्यक होता है. पूरे आश्विन मास में, खासतौर पर नवरात्रि के दिनों में, तामसिक भोजन का पूरी तरह त्याग कर देना चाहिए.
मांसाहार, शराब, सिगरेट के साथ-साथ भोजन में अधिक लहसुन और प्याज का उपयोग करने से बचना चाहिए. मान्यता है कि तामसिक भोजन करने से मन में चंचलता और गुस्सा बढ़ता है, जिससे आध्यात्मिक साधना में बाधा आती है.
इस पूरे महीने सात्विक और हल्का भोजन ग्रहण करना चाहिए. ऐसा करने से न केवल मानसिक शांति मिलती है बल्कि सेहत भी अच्छी बनी रहती है.
आश्विन मास में शारीरिक स्वच्छता और सात्विकता का खास ख्याल रखा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र महीने में बाल कटवाना, शेविंग करना और नाखून काटना वर्जित होता है.
खासतौर पर जो लोग पितृ पक्ष में तर्पण करते हैं या नवरात्रि का व्रत रखते हैं, उन्हें इन नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए. शरीर को अनावश्यक संवारने के बजाय ध्यान भक्ति और साधना पर केंद्रित होना चाहिए.
यही कारण है कि 27 सितंबर से ही लोग इन नियमों को अपनी दिनचर्या में शामिल कर लेते हैं और पूरे महीने इनका अच्छे से पालन करते हैं.
सनातन परंपरा में महिलाओं को लक्ष्मी और देवी का स्वरूप माना गया है. आश्विन का महीना देवी शक्ति की उपासना का महीना होता है, इसलिए इस दौरान किसी भी महिला, बुजुर्ग या कन्या का अनादर या अपमान करना भारी पाप माना गया है.
जिस घर में महिलाओं का अनादर होता है या उन्हें कटु वचन कहे जाते हैं, वहां कभी भी मां दुर्गा और पितरों का वास नहीं होता है. आश्विन मास में अपने विचारों और वाणी पर संयम रखना चाहिए.
घर की महिलाओं के साथ-साथ समाज की हर स्त्री के प्रति आदर और सम्मान का भाव रखना इस महीने की सबसे बड़ी पूजा मानी गई है.
आश्विन मास में सुबह और शाम के दैनिक नियमों में अनुशासन लाना बहुत आवश्यक होता है. 27 सितंबर से रोज सुबह जल्दी उठकर स्नान करना और इष्ट देव की पूजा करना शुभ फल देता है.
सबसे जरूरी नियम शाम के समय तुलसी जी के पौधे के पास और घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाना है. आश्विन के पूरे महीने में शाम को किया गया दीपदान घर की सभी नकारात्मक शक्तियों को दूर भगाता है.
इन 5 मुख्य नियमों का निष्ठा से पालन करने पर परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास हमेशा बना रहता है.
(Disclaimer): यह आलेख हिंदू पंचांग, सनातन मान्यताओं और पौराणिक शास्त्रों में उल्लेखित नियमों पर आधारित है. इसका उद्देश्य पाठकों को आश्विन मास के दौरान अपनाई जाने वाली पारंपरिक और धार्मिक परंपराओं की जानकारी देना है.