जयपुर मेयर चुनाव: 78 पार्षद फिर भी BJP में टेंशन? समझिए शहरी सरकार का पूरा गणित
Rajasthan News: जयपुर में मेयर चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज है. BJP के पास 78 पार्षद हैं, जबकि बहुमत के लिए 76 वोट चाहिए. कई नामों की चर्चा के बीच 2019 की एक वोट वाली हार ने पार्टी की चिंता बढ़ा दी है. इस एक्सप्लेनर में जानें भाजपा की चिंता के पीछे का कारण.
Jaipur Nagar Nigam Mayor: जयपुर नगर निगम के पार्षदों का चुनाव खत्म हो चुका है और अब सबकी नजर मेयर की कुर्सी पर है. 150 पार्षदों वाले जयपुर नगर निगम में बहुमत के लिए 76 पार्षदों का समर्थन चाहिए, जबकि भाजपा के पास 78 पार्षद हैं. यानी पार्टी बहुमत से सिर्फ 2 कदम आगे है. दूसरी तरफ कांग्रेस के 57 और निर्दलीय 15 पार्षद हैं. दोनों को जोड़ दें तो आंकड़ा 72 तक पहुंचता है. ऐसे में भाजपा के पास संख्या तो ज्यादा है, लेकिन 2019 में एक वोट से मिली हार की पुरानी कहानी उसके सामने है. इस बार मेयर पद के लिए कई नाम चर्चा में हैं और अलग-अलग सामाजिक संगठनों की ओर से भी अपने समाज को प्रतिनिधित्व देने की मांग उठ रही है. इसलिए अब असली चुनौती सिर्फ मेयर का नाम तय करना नहीं, बल्कि ऐसा नाम चुनना है जिसके पीछे पार्टी के सभी पार्षद एक साथ खड़े रहें.
78 पार्षद होने के बाद भी BJP क्यों सतर्क?
पहली नजर में देखें तो भाजपा के लिए मेयर चुनाव आसान लगता है. 150 सदस्यों वाले बोर्ड में 76 वोट बहुमत के लिए चाहिए और भाजपा के पास 78 हैं. लेकिन यह अंतर सिर्फ दो वोट का है. अगर कुछ पार्षदों ने मतदान में पार्टी के तय उम्मीदवार का साथ नहीं दिया, तो पूरा गणित बदल सकता है.
यही वजह है कि भाजपा अपने पार्षदों को लेकर पूरी तरह सतर्क है. पार्टी के सामने 2019 का उदाहरण भी है. उस समय 90 सदस्यीय बोर्ड में भाजपा के 63 पार्षद थे. कांग्रेस के पास 18 और निर्दलीयों के पास 9 सीटें थीं. संख्या के हिसाब से भाजपा काफी मजबूत थी, लेकिन मेयर चुनाव में बागी विष्णु लाटा ने भाजपा के उम्मीदवार मनोज भारद्वाज को एक वोट से हरा दिया था. लाटा को 45 और भारद्वाज को 44 वोट मिले थे, जबकि एक वोट निरस्त हुआ था.
2019 की हार से क्या सबक मिला?
2019 के चुनाव में भाजपा ने अपने पार्षदों को रिसॉर्ट में भी रखा था, लेकिन इसके बावजूद क्रॉस वोटिंग नहीं रुक सकी. यानी पार्टी के पास बहुमत से काफी ज्यादा सीटें होने के बावजूद मतदान के समय तस्वीर बदल गई.
इस बार भाजपा के पास बहुमत से सिर्फ दो सीट ज्यादा हैं. इसलिए पार्टी के लिए यह देखना जरूरी है कि उसके 78 पार्षद मतदान के समय एकजुट रहें. यही वजह है कि वरिष्ठ नेताओं की पार्षदों के साथ लगातार बातचीत और मुलाकातें बढ़ी हैं. संगठन की तरफ से भी पार्षदों को एकजुट रहने का संदेश दिया जा रहा है.
मेयर की दौड़ में कौन-कौन से नाम?
जयपुर के नए मेयर को लेकर भाजपा में कई नाम चर्चा में हैं. सुनील कोठारी, पुनीत कर्णावट, शैलेन्द्र भार्गव, सुभाष सिंगी, विमल अग्रवाल और भवानी सिंह राजावत के नाम पहले से चर्चा में हैं. अब अनुराधा माहेश्वरी और विजय अग्रवाल के नाम भी सामने आए हैं.
इन नामों के अलावा एक नए चेहरे को आगे बढ़ाने की चर्चा भी है. इनपुट के मुताबिक, इसके लिए दो केंद्रीय मंत्रियों के स्तर पर सक्रियता की बात कही जा रही है. इनमें से एक केंद्रीय मंत्री राजस्थान से बताए जा रहे हैं. हालांकि भाजपा ने अभी तक किसी भी नाम पर आधिकारिक मुहर नहीं लगाई है.
इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी मौजूदा दावेदारों में से किसी एक को मौका देती है या अचानक किसी नए चेहरे का नाम सामने आता है.
मेयर चुनाव में समाज का समीकरण क्यों अहम?
मेयर की कुर्सी को लेकर सिर्फ नेताओं के बीच ही दावेदारी नहीं है. अलग-अलग सामाजिक संगठनों ने भी भाजपा नेतृत्व के सामने अपने समाज को प्रतिनिधित्व देने की मांग रखी है.
ब्राह्मण संगठनों ने बैठक कर समाज के व्यक्ति को मौका देने की मांग की है. विप्र फाउंडेशन का प्रतिनिधिमंडल भी भाजपा नेतृत्व से मिला है. इसी तरह अग्रवाल समाज के संगठनों ने अग्रवाल चेहरे को मौका देने की मांग उठाई है. राजपूत संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने भी पार्टी नेतृत्व को ज्ञापन दिया है.
ऐसे में मेयर के चेहरे के साथ उपमहापौर का समीकरण भी चर्चा में है. राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि जिस सामाजिक वर्ग से मेयर चुना जाएगा, उसके अलावा किसी दूसरे वर्ग को उपमहापौर पद के जरिए प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है.
निर्दलीय पार्षदों पर भी नजर
भाजपा के पास 78 पार्षद हैं, लेकिन पार्टी की नजर 15 निर्दलीय पार्षदों पर भी बनी हुई है. भाजपा की ओर से दावा किया गया है कि करीब 50 फीसदी निर्दलीय उसके संपर्क में हैं. कुछ निर्दलीय पार्षदों के भाजपा से जुड़ने की बात भी सामने आई है.
हालांकि मेयर चुनाव में निर्दलीय पार्षद किस तरफ जाएंगे, यह मतदान के समय ही साफ होगा. भाजपा के लिए निर्दलीयों का समर्थन अतिरिक्त सुरक्षा दे सकता है, क्योंकि उसके पास बहुमत से सिर्फ दो वोट ज्यादा हैं. वहीं कांग्रेस और निर्दलीयों को जोड़ने पर संख्या 72 होती है. दोनों पक्षों के बीच सिर्फ 6 वोट का अंतर है.
मेयर और पार्षद में क्या अंतर है?
आम तौर पर लोगों के मन में सवाल होता है कि पार्षद और मेयर का काम अलग-अलग क्या होता है. नगर निगम के हर वार्ड से पार्षद चुना जाता है और वह अपने वार्ड की समस्याओं को निगम तक पहुंचाता है. सड़क, सफाई, नाली, स्ट्रीट लाइट, कचरा और स्थानीय सुविधाओं से जुड़े मुद्दे पार्षद निगम की बैठकों में उठा सकता है.
मेयर पूरे नगर निगम का प्रमुख होता है. वह निगम की बैठकों की अध्यक्षता करता है और नगर निगम के कामकाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. हालांकि रोजमर्रा के प्रशासनिक कामों में नगर निगम के अधिकारियों की भी अहम भूमिका होती है. इसलिए मेयर के पास राजनीतिक और निर्वाचित निकाय से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां होती हैं, जबकि प्रशासनिक स्तर पर अधिकारी काम करते हैं.
मेयर का चुनाव कैसे होता है?
नगर निगम में जनता सीधे मेयर को चुनती है या नहीं, यह उस राज्य में लागू चुनाव व्यवस्था और संबंधित कानून पर निर्भर करता है. जयपुर के मौजूदा निकाय चुनाव के संदर्भ में पहले पार्षद चुने गए हैं और उसके बाद मेयर का चुनाव होना है.
मेयर चुनाव में पार्षद मतदान करते हैं. ऐसे में किसी उम्मीदवार की जीत के लिए जरूरी संख्या में पार्षदों का समर्थन हासिल करना अहम होता है. जयपुर में कुल 150 पार्षद हैं और बहुमत का आंकड़ा 76 है. इसलिए भाजपा के 78 पार्षद होने के बावजूद दो वोट का अंतर ही उसकी सबसे बड़ी चिंता है.
मेयर को कितना वेतन मिलता है?
मेयर और पार्षद को मिलने वाला मानदेय सरकारी नियमों के तहत तय होता है. यह सामान्य नौकरी की तरह केवल एक तय मासिक सैलरी के रूप में नहीं देखा जाता. इसके अलावा बैठक, यात्रा या अन्य निर्धारित सुविधाएं और भत्ते नियमों के मुताबिक मिल सकते हैं. समय-समय पर सरकार इनके मानदेय और सुविधाओं में बदलाव भी कर सकती है.
इसलिए मेयर और पार्षद के पद को सिर्फ वेतन के नजरिए से देखना सही नहीं होगा. दोनों पदों पर शहर और वार्ड से जुड़े फैसलों में निर्वाचित प्रतिनिधि की भूमिका होती है.
पार्षद को कैसे हटाया जा सकता है?
पार्षद को सिर्फ इसलिए पद से नहीं हटाया जा सकता कि किसी व्यक्ति या पार्टी को उसका काम पसंद नहीं आया. नगर निकाय कानून में पद खत्म होने या पार्षद को हटाए जाने से जुड़े प्रावधान होते हैं. किसी गंभीर मामले, अयोग्यता या कानून में तय परिस्थितियों में संबंधित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई हो सकती है.
इसी तरह मेयर को हटाने के लिए भी संबंधित राज्य के नगर निकाय कानून और उसमें दिए गए प्रावधान लागू होते हैं. यानी मेयर या पार्षद को हटाने की प्रक्रिया सामान्य राजनीतिक नाराजगी से अलग कानूनी नियमों के तहत होती है.
क्या 78 पार्षद भाजपा के लिए पर्याप्त हैं?
संख्या के हिसाब से भाजपा के पास बहुमत है. 150 में 76 का आंकड़ा चाहिए और भाजपा के पास 78 पार्षद हैं. लेकिन 2019 का अनुभव बताता है कि सिर्फ बोर्ड में संख्या ज्यादा होना मतदान के नतीजे की पूरी गारंटी नहीं देता.
इस बार भी भाजपा के सामने यही सवाल है कि उसके 78 पार्षद मतदान के समय एक साथ रहते हैं या नहीं. कांग्रेस के पास 57 और निर्दलीयों के पास 15 पार्षद हैं. यानी कांग्रेस और निर्दलीयों की कुल संख्या 72 है. ऐसे में सिर्फ सीटों का हिसाब नहीं, बल्कि आखिरी समय तक पार्षदों को साथ रखना भी अहम होगा.
अब सबसे बड़ा सवाल-कौन बनेगा जयपुर का मेयर?
पार्षदों का चुनाव खत्म हो चुका है, लेकिन जयपुर की राजनीति में असली चर्चा अब मेयर के नाम को लेकर है. भाजपा के पास बहुमत है और कई दावेदार मैदान में हैं. अलग-अलग समाजों की ओर से भी प्रतिनिधित्व की मांग सामने आ रही है.
इसलिए आने वाले समय में पार्टी के सामने दो बड़े फैसले होंगे. पहला, मेयर के लिए किस नाम पर सहमति बनती है और दूसरा, उस नाम के पीछे सभी 78 पार्षदों को कैसे एकजुट रखा जाता है. 2019 की एक वोट वाली कहानी के बाद इस बार जयपुर मेयर चुनाव में हर एक वोट की अहमियत और बढ़ गई है.