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संसद से सड़क तक युवा, पर निकायों में कौन बना राजा? Gen-Z ने गाड़े झंडे, लेकिन चेयरमैन की कुर्सी तक पहुंचने में छूटे पसीने

राजस्थान के निकाय चुनावों में वार्ड स्तर पर युवाओं ने लगभग 8-10% हिस्सेदारी हासिल कर अपनी धमाकेदार उपस्थिति भी दर्ज करा ली, लेकिन जब बात शहर सरकार बनाने की आती है यानी की मेयर/डिप्टीमेयर/सभापति/चेयरमैन की कुर्सी की आई, तो ये आंकड़ा 1% से भी नीचे (लगभग 0.6%) सिमट गया है.

संसद से सड़क तक युवा, पर निकायों में कौन बना राजा? Gen-Z ने गाड़े झंडे, लेकिन चेयरमैन की कुर्सी तक पहुंचने में छूटे पसीने
Image Credit: rajasthan nikay chunav gen z parshad chairman mayor analysis

Rajasthan Nikay Chunav : राजस्थान में 309 निकायों (नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिका) के मेयर, सभापति और चेयरमैन के पदों से तुलना करें, तो पूरे राजस्थान में 309 निकायों में से केवल 2 बड़े अपवाद ऐसे सामने आए हैं जहां 20-30 साल की उम्र के युवा शीर्ष कुर्सी तक पहुंचे.

कीर्ति गोसाईवाल (21 साल) - धोरीमन्ना (बाड़मेर) पालिका अध्यक्ष
मयंक गोयल (24 साल) - टोंक नगर परिषद सभापति

जहां बाड़मेर के धोरीमन्ना से वार्ड नंबर 20 से बीजेपी के टिकट पर पार्षद का चुनाव जीतने वाली कीर्ति की बात है तो अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित इस पद पर कोई दूसरा नामांकन दाखिल नहीं हुआ था, ऐसे में कीर्ति ही निर्विरोध पालिका अध्यक्ष बनी. कीर्ति के नाम, राजस्थान में सबसे कम उम्र की जेन जी पालिका अध्यक्ष बनने का रिकॉर्ड दर्ज हो गया है. वहीं MBA कर चुके टोंक के मंयक गोयल ने 17 वोट से अपने विरोधी को मात दी थी.

309 कुल निकायों में से सिर्फ 2 जगहों पर युवा चेयरमैन बने. यानी कि शीर्ष पदों पर इनका प्रतिशत 1% से भी काफी कम है, क्योंकि राजनीतिक दलों ने इन मुख्य पदों पर लगभग 99% मामलों में वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं को ही प्राथमिकता दी है.

यहां ये समझना भी जरूरी है कि असली Gen-Z कौन हैं ? 
20 से 25 साल या थोड़ा ऊपर 25-30 साल तक के युवा, जो अभी-अभी कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर या तो सीधे मैदान में उतरे हैं या राजनीति में अपनी पहली पारी खेल रहे हैं.

40 साल वाले कहां खड़े हैं ? 
आमतौर पर राजनीतिक पार्टिया 'युवा चेहरा' कहकर बड़े पदों (जैसे मेयर या डिप्टी मेयर)पर उतारते हैं,वे असल में 35 से 45 वर्ष की उम्र के होते हैं.तो टेक्नीकली ये Gen-Z नहीं हैं. हालांकि राजनीति के लिहाज से युवा और ऊर्जावान जरूर हो सकते है.

राजस्थान के 309 नगरीय निकायों में कुळ 10,245 पार्षद सीटों पर चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस दोनों दलों ने इस बार लगभग 40 फीसदी से 51 फीसदी 40 साल से कम आयु के युवाओं को दिए थे. इनमें से 20-30 साल की आयु के जो उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरे और पार्षद बने, उनकी कुल संख्या का राज्य स्तर पर औसत लगभग 8 से 10 फीसदी के आसपास माना जा सकता है. 

टिकटों की बाजीगरी और ज़मीनी हकीकत का अंतर
राजस्थान में इस बार हुए निकाय चुनाव के आंकड़े का एक दिलचस्प पहलू ये भी बता गये हैं कि भले ही भाजपा और कांग्रेस नेयुवाओं को आगे बढ़ाने के दावे किए और 40 साल से कम आयु वाले 40% से ज्यादा टिकट भी बांटे हों, लेकिन जब सत्ता की चाबी सौंपने की बारी आई , तो पार्टियों ने एक सुरक्षात्मक रवैया अपनाया है.राजनीतिक विश्लेषकों का मानने है कि शहरी स्थानीय निकायों का प्रबंधन, खास तौर पर बजट, वार्ड समितियों के बीच बैलेंस और जमीनी विरोध से निपटाने का अनुभव. ये कुछ ऐसे क्षेत्र है. जहां कोई भी पार्टी जोखिम मोल लेने से बचती है. और ये ही वजह है कि 10 हजार से ज्यादा पार्षदों के इस बड़े समंदर में 20 से 30 तक की की आयु के Gen-Z युवाओं ने वार्ड स्तर पर लगभग 8-10 प्रतिशत हिस्सेदारी यानी करीब 800 से ज्यादा सीटों पर धमाकेदार दी, लेकिन लगभग 99% मामलों में पार्टियों  ने पुराने और मंझे हुए राजनीतिक चेहरों पर ही उच्च पदों पर भरोसा जताया.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि बदलाव की इबारत लिखी जा रही है, युवा वोटर्स और राजनीतिक दल अब स्थानीय स्तर पर भी पढ़े लिखे और डिजिटल सोच वाले चेहरों को स्वीकारने लगे हैं. लेकिन शीर्ष पदों पर वरिष्ठ नेताओं का दबदबा ये बताने के लिए काफी है कि राजनीति के इस पारंपरिक गलियारे में पावर सेंटर तक पहुंचना अभी भी लंबी राजनीतिक और जातीय-क्षेत्रीय समीकरणों बंधा हुआ है.

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Pragati Pant Awasthi

Pragati Pant Awasthi

मीडिया की दुनिया में 18 साल का सफर... एंकरिंग से लेकर डिजिटल की स्क्रीन तक, हर नया बदलाव दिल से अपनाया, जो सोचती हूं, वही कहती हूं, बातों को घुमाना मेरी आदत नहीं, दिल की बात जुबां पर रखना पहचान है. फिलहाल 'ज़ी राजस्थान डिजिटल' के साथ सफर जारी है और हर दिन कुछ नया सीखने की ललक बरकरार है और रहेगी. Pragati.Pant@india.com ईमेल के जरिए आप संपर्क कर सकते हैं.
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