चुनाव में वोटर की तलाश, जीत के बाद सरपंच गायब! जयपुर के गांवों का दर्द
जयपुर में तीसरे चरण के पंचायत चुनाव के लिए वोट करने आए ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव आते ही प्रत्याशी घर-घर आकर हाथ जोड़ते हैं और वादों की पोटली खोल देते हैं. लेकिन चुनाव जीतते ही तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है. जो प्रत्याशी पहले वोटर को ढूंढता था, जीतने के बाद वही सरपंच गायब हो जाता है और ग्रामीणों को अपने ही काम के लिए चक्कर काटने पड़ते हैं.
जयपुर के गांवों में लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी निभाने के लिए कोई लाठी के सहारे मतदान केंद्र पहुंचा. तो कोई व्हीलचेयर पर. घूंघट की ओट में महिलाओं ने भी मतपत्र पर मुहर लगाई. लेकिन मतदान केंद्रों से बाहर निकले ग्रामीणों की जुबान पर लोकतंत्र के उत्सव के साथ विकास की अधूरी उम्मीदों का दर्द भी था. यहां सवाल सिर्फ सरपंच कौन बनेगा, इसका नहीं है. सवाल ये भी है कि आखिर गांव कब बदलेगा.
ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव आते ही प्रत्याशियों को हर घर का रास्ता याद आ जाता है. हाथ जोड़कर वोट मांगे जाते हैं. चुनाव के समय प्रत्याशियों को एक-एक मतदाता का घर याद रहता है. सुबह से शाम तक दरवाजे खटखटाए जाते हैं. चुनाव से पहले प्रत्याशी मतदाता के दरवाजे पर होता है और चुनाव के बाद मतदाता अपनी समस्या लेकर सरपंच के दरवाजे पर. ग्रामीण चाहते हैं कि सरपंच केवल चुनाव जीतने तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे पांच साल गांव में उपलब्ध रहे और जनता के प्रति जवाबदेह बने. सड़क, पानी, सफाई और विकास के वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद उन्हीं जनप्रतिनिधियों तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को चक्कर लगाने पड़ते हैं. ग्रामीणों ने गांव के सरकारी स्कूलों की स्थिति और सफाई व्यवस्था को लेकर भी नाराजगी जताई. उनका कहना है कि बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के दावे किए जाते हैं, लेकिन कई गांवों में स्कूलों की सुविधाओं में सुधार की जरूरत है. गांव की गलियों में गंदगी, नालियों की सफाई नहीं होना और खराब सड़कों जैसी समस्याएं आज भी बनी हुई हैं.
राजधानी जयपुर का दायरा लगातार बढ़ रहा है. लेकिन इससे सटे कई गांवों के ग्रामीण आज भी बुनियादी सुविधाओं की कमी की शिकायत कर रहे हैं. ग्रामीणों के मुताबिक गांव तक नियमित बस नहीं पहुंचती. शहर जाना हो तो खुद का वाहन चाहिए. घर में मेहमान आ जाएं तो उन्हें हाईवे से लेने जाना पड़ता है. बीमार को अस्पताल पहुंचाना हो तो पहले गाड़ी का इंतजाम करना पड़ता है. कहीं टूटी सड़कें हैं. कहीं गंदगी से भरी नालियां. कहीं स्कूलों में सुविधाओं की कमी तो कहीं पेयजल और स्वास्थ्य सेवाओं की परेशानी.
ग्रामीणों का सवाल है कि आखिर हर चुनाव में विकास के वादे तो होते हैं. लेकिन उन वादों को पूरा करने की जवाबदेही कौन तय करेगा. ग्रामीणों का सवाल था कि जब मतदाता अपनी उम्र, बीमारी और परेशानियों को पीछे छोड़कर लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी निभा सकता है, तो चुनाव जीतने वाला जनप्रतिनिधि पांच साल तक अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं निभा सकत ? ग्रामीणों की अपेक्षा है कि मतदान के दिन जिस तरह प्रत्येक वोट की अहमियत होती है, उसी तरह चुनाव के बाद प्रत्येक मतदाता की समस्या को भी महत्व मिले. गांव के मतदाताओं ने पंचायतों के विकास बजट को लेकर भी सवाल उठाए हैं. ग्रामीण जानना चाहते हैं कि उनके गांव के विकास के लिए कितना पैसा आया ? किस काम के लिए आया ? और आखिर खर्च कहां हुआ.
इन सभी वोटर्स की अपेक्षा है कि जिस तरह मतदान के दिन उनके एक-एक वोट की अहमियत है. उसी तरह चुनाव के बाद उनकी एक-एक समस्या की भी सुनवाई हो. गांव के मतदाता अब सिर्फ नया सरपंच नहीं. पांच साल तक जवाबदेह रहने वाला जनप्रतिनिधि चाहते हैं. क्योंकि चुनाव एक दिन का होता है. लेकिन विकास की जिम्मेदारी पूरे पांच साल की.