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जयपुर के श्रीराम मंदिर में रहकर 5 पीढ़ियों से रावण बना रहा मुस्लिम परिवार, लहसुन-प्याज तक नहीं खाते

जयपुर के आदर्श नगर श्रीराम मंदिर में मथुरा के मुस्लिम कारीगर चांद बाबू का परिवार पिछले 5 पीढ़ियों से रावण के पुतले बना रहा है. इस बार 25 कारीगर मिलकर 120 फीट ऊंचा रावण और 105 फीट ऊंचा कुंभकर्ण तैयार कर रहे हैं. मंदिर परिसर में रहते हुए परिवार सात्विक भोजन करता है.

Written By Deepak Goyal
Published: Oct 18, 2026, 07:29 PM IST | Updated: Oct 18, 2026, 07:40 PM IST
Image Credit: 120 फीट ऊंचा रावण
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जिस रावण को आग में खाक करना है, उसे शानदार बनाने के लिए 25 मुस्लिम कारीगर दिन-रात एक कर रहे हैं. डेढ़ महीने की मेहनत और महज दो मिनट में सब राख. लेकिन न अफसोस, न मलाल क्योंकि इनके लिए रावण बनाना सिर्फ हुनर नहीं, इबादत है. जयपुर के श्रीराम मंदिर में पांच पीढ़ियों से यह मुस्लिम परिवार रावण को आकार दे रहा है. इस बार 120 फीट के रावण को ऐसा रौब देने की तैयारी है कि जलने से पहले हर नजर उसी पर ठहर जाए.

रावण अहंकारी था. उसके अहंकार को कोई पसंद नहीं करता, लेकिन उसका पुतला ऐसा बने कि देखने वाला देखता रह जाए. चेहरे पर रौब हो, नाक-नक्श शानदार हों और सीना ऐसा तना हो कि दूर से ही लंकापति का अहंकार झलकने लगे. जिस रावण को आखिर में आग के हवाले करना है, उसे खूबसूरत बनाने के लिए 25 मुस्लिम कारीगर दिन-रात पसीना बहा रहे हैं. डेढ़ महीने की मेहनत महज दो मिनट में राख हो जाएगी, लेकिन इन कलाकारों के चेहरे पर शिकन नहीं होगी.

मथुरा के चांद बाबू का परिवार पीढ़ियों से बना रहा रावण
यह कहानी है मथुरा के मुस्लिम कारीगर चांद बाबू और उनके परिवार की. जयपुर के आदर्श नगर स्थित श्रीराम मंदिर में यह परिवार पीढ़ियों से रावण के पुतले तैयार कर रहा है. मंदिर परिसर में रहते हैं तो चूल्हे पर न मांस पकता है, न लहसुन-प्याज. इनके लिए रावण बनाना महज रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि कला की साधना है. 55 वर्षीय चांद बाबू कहते हैं, रावण अहंकारी था. सच्चाई के सामने उसका अहंकार नहीं टिक पाया लेकिन जब हम उसका पुतला बनाते हैं तो कोशिश रहती है कि वह सबसे सुंदर और रोबदार दिखाई दें. उसकी आंखें, मूंछें, नाक-नक्श और छाती ऐसी बनाएं कि लगे सचमुच लंकापति सामने खड़ा है. हमारी और हमारे 25 साथी कलाकारों की कोशिश रहती है कि जयपुर का रावण देश के सबसे खूबसूरत पुतलों में गिना जाए. यही हमारी कला है और यही हमारे लिए पूजा है.

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डेढ़ महीने की मेहनत दो मिनट में राख 
चांद बाबू कहते हैं कि रावण के पुतले का एक-एक हिस्सा बनाने में मेहनत लगती है. बांस का ढांचा खड़ा करने से लेकर चेहरे को आकार देने और सजावट तक कई सप्ताह गुजर जाते हैं लेकिन दशहरे की शाम जब पुतला जलता है तो डेढ़ महीने की मेहनत महज दो मिनट में खत्म हो जाती है. वे कहते हैं कि हमें कभी इस बात का मलाल नहीं होता कि इतनी मेहनत से बनाया पुतला इतनी जल्दी क्यों जला दिया. रावण का यही हश्र हुआ था. उसके पुतले का भी यही होना है. हमारी खुशी इस बात में है कि जलने से पहले लोग हमारी कला की तारीफ करें.

60-70 साल पहले शुरू हुआ सफर 
आदर्श नगर में रावण के पुतले तैयार करने वाले चांद बाबू के मुताबिक, उनके परिवार ने जयपुर में करीब 60-70 साल पहले रावण बनाने की शुरुआत की थी. उस समय महज 20 फीट ऊंचा पुतला तैयार किया जाता था. इसके लिए 250 रुपये मेहनताना और 10 रुपये इनाम मिलता था. समय बदला तो रावण का कद भी बढ़ता चला गया. इस बार 120 फीट ऊंचा रावण और 105 फीट ऊंचा कुंभकर्ण तैयार किया जा रहा है. रावण की ऊंचाई इतनी अधिक है कि उसे खड़ा करने के लिए क्रेन की मदद लेनी पड़ेगी.

मंदिर परिसर में सात्विक भोजन करता है परिवार
चांद बाबू के मुताबिक, इस बार रावण निर्माण का मेहनताना एक लाख रुपये तय हुआ है. इस मुस्लिम परिवार की परंपरा का सबसे दिलचस्प पहलू उसकी जीवनशैली है. रावण बनाने के लिए परिवार के सदस्य दशहरे से करीब डेढ़-दो महीने पहले जयपुर पहुंच जाते हैं. श्रीराम मंदिर परिसर ही उनका अस्थायी घर बन जाता है. चांद बाबू और उनके भाई राजा खां बताते हैं कि यहां रहते हुए पूरा परिवार सात्विक भोजन करता है. रसोई में मांसाहार तो दूर, लहसुन-प्याज तक नहीं बनाया जाता. बच्चे भी इसी माहौल में बड़े हुए हैं. चांद बाबू बताते हैं कि रावण बनाने का हुनर उन्हें विरासत में मिला है. उनके पिता लखो भाई को लोग 'रावण वाले भाई' के नाम से जानते थे. वे महज छह साल की उम्र में अपने दादा के साथ जयपुर आए थे तब श्रीराम मंदिर में दशहरा मेले की शुरुआत हुई थी.

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परदादा से छठी पीढ़ी तक पहुंचा रावण बनाने का सफर 
परदादा से शुरू हुआ यह सिलसिला दादा, ताऊ और पिता से होते हुए अब पांचवीं पीढ़ी तक पहुंच चुका है. परिवार की छठी पीढ़ी भी बांस बांधना, ढांचा तैयार करना और पुतलों के चेहरे बनाना सीख रही है. चांद बाबू कहते हैं कि उनके बुजुर्गों ने जो कला सौंपी, उसे आगे बढ़ाना उनकी जिम्मेदारी है. रावण का विशाल पुतला तैयार करने में सिर्फ कारीगरी ही नहीं, भारी मात्रा में सामग्री भी लगती है. चांद बाबू के मुताबिक इस बार 120 फीट के पुतले के निर्माण में 600 बांस, पांच क्विंटल मैदा, तीन क्विंटल खाकी कागज (मलेट), 200 किलो जेवड़ी, 200 किलो सफेद रद्दी, 150 किलो सन की रस्सी और 35 किलो धागे का इस्तेमाल हो रहा है. बांस से विशाल ढांचा तैयार करने के बाद कागज और अन्य सामग्री से रावण को आकार दिया जाता है. इसके बाद चेहरे, मुकुट और सजावट का काम होता है. कारीगरों की सबसे ज्यादा मेहनत रावण के चेहरे को रोबदार बनाने पर रहती है.

बहरहाल, जयपुर का यह दशहरा केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द की कहानी भी कहता है. एक ओर श्रीराम मंदिर का परिसर है, दूसरी ओर मुस्लिम परिवार की पीढ़ियों पुरानी कला. यहां न धर्म की दीवार हुनर के आड़े आती है, न परंपरा के. चांद बाबू और उनके साथी हर साल रावण को पहले से ज्यादा भव्य बनाने का संकल्प लेकर आते हैं. उन्हें पता है कि दशहरे की शाम उनकी पूरी मेहनत आग की लपटों में समा जाएगी लेकिन उनके लिए यही इस कला की खूबसूरती है. हाथों से रावण को आकार देना और फिर अपनी आंखों के सामने अहंकार को राख होते देखना. 

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