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जिनपिंग 14 साल की सत्ता के बाद भी क्यों डरे हुए हैं? जिन वफादारों को खुद आगे बढ़ाया, अब उन्हें ही क्यों दिखा रहे बाहर का रास्ता

शी जिनपिंग को चीन की सत्ता में आए हुए 14 साल हो चुके हैं. इसके बावजूद वे अंदर से बहुत डरे हुए लगते हैं. जिन वफादारों को उन्होंने आगे बढ़ाया, अब उन्हें ही वे एक-एक करके बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं.

जिनपिंग 14 साल की सत्ता के बाद भी क्यों डरे हुए हैं? जिन वफादारों को खुद आगे बढ़ाया, अब उन्हें ही क्यों दिखा रहे बाहर का रास्ता
Image Credit: सत्ता के डेढ़ दशक बाद भी डरे हैं जिनपिंग

जियो-पॉलिटिक्स को जानने वालों के लिए चीन की अंदरूनी राजनीति को समझना हमेशा से पेचीदा काम रहा है. वहां पर सत्ता के गलियारों में क्या चल रहा है, इसका अंदाजा लगाना किसी ब्लैक होल से रोशनी की किरण ढूंढने जैसा माना जाता रहा है. हाल में बीजिंग में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) की 20वीं केंद्रीय समिति की पांचवीं बैठक हुई. इस बैठक के बाद जो विज्ञप्ति जारी हुई, उसने दुनिया को चौंका दिया है. विज्ञप्ति से साफ इशारा मिल रहा है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग भले ही अगले साल अपने चौथे कार्यकाल की तैयारी में हैं. लेकिन जितनी ताकत उनके हाथ में केंद्रित हो रही है, उतना ही उनके अंदर डर और अविश्वास भी बढ़ता जा रहा है.

माओ के दौर के बाद सबसे बड़ी उथल-पुथल

फर्स्ट पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, इस चार दिवसीय बैठक में माओ त्से तुंग के दौर के बाद का सबसे बड़ा राजनीतिक फेरबदल देखने को मिला. शी जिनपिंग ने रिकॉर्ड 33 वरिष्ठ अधिकारियों को एक झटके में पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. ऐसा करके वे 2022 से अब तक लगभग 100 नेताओं को हटा चुके हैं. उन्होंने ये सब कार्रवाई भ्रष्टाचार उन्मूलन के नाम पर की. जिनपिंग के तेवरों को देखते हुए पार्टी के मुखपत्र 'पीपुल्स डेली' ने भी एक लेख में साफ किया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ यह जंग बिना किसी ढील के जारी रहेगी, चाहे आरोपी का पद कितना भी ऊंचा क्यों न हो.

दुश्मनों के बजाय अपनों पर गिरी गाज

इस बार की कार्रवाई में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि शी जिनपिंग के निशाने पर पुराने विरोधी नहीं, बल्कि उनके अपने ही खास लोग थे. असल में, वर्ष 2012 में सत्ता संभालने के बाद जिनपिंग ने पार्टी में अपने प्रतिद्वंद्वियों को चुन-चुनकर किनारे कर दिया था. इसके बाद वर्ष 2022 तक हर अहम मंत्रालय और सेना की कमान में केवल वही लोग बचे थे, जिन्हें शी ने खुद आगे बढ़ाया था. अब उनके सामने किसी भी गड़बड़ी या भ्रष्टाचार का ठीकरा किसी पुराने विरोधी पर फोड़ने का मौका नहीं है. लिहाजा अब वे 'तलवार को अंदर की तरफ मोड़ने' की नीति अपनाकर अपने द्वारा चुने लोगों को ही ठिकाने लगाने में लगे हैं.

सेना का शीर्ष नेतृत्व हुआ तबाह

जिनपिंग की इस कार्रवाई की सबसे ताजी गाज पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) पर गिरी है. निष्कासित नेताओं में उसके जनरल झांग यूशिया और झोंग शाओजुन भी शामिल हैं, जो शी जिनपिंग के सबसे करीबी माने जाते थे. झांग यूशिया चीन के शीर्ष सैन्य अधिकारी ही नहीं थे, बल्कि उनके पिता ने शी के पिता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर गृहयुद्ध लड़ा था. वहीं, 1970 और 80 के दशक के युद्धों का अनुभव रखने वाले झांग को सेना संभालने के लिए रिटायरमेंट के बाद भी पद पर रखा गया था.

जबकि, वहीं झोंग शाओजुन 2002 से शी के निजी सचिव और भाषण लेखक थे. लेकिन करीबी होने की वजह से जिनपिंग ने बिना किसी सैन्य पृष्ठभूमि के भी उन्हें सेना में सीनियर कर्नल बनाकर जनरलों पर नजर रखने के लिए भेज दिया था. ऐसे में जब आर्मी के जनरल हटाए गए तो जिनपिंग ने उन्हें भी हटाने में देर नहीं लगाई.

अविश्वास ने जिनपिंग को अंदर तक हिलाया

रिपोर्ट के मुताबिक, शी जिनपिंग जिस तरह अपने वफादार सहयोगियों और जनरलों पर कार्रवाई कर रहे हैं, उससे पता लग रहा है कि वहां का शीर्ष किस कदर अविश्वास से भरा हुआ है. उसे अपने ही वफादार जनरलों और पार्टी नेताओं से बगावत का डर सता रहा है. वैसे भी, शी जिनपिंग अब तानाशाही के उस दौर से गुजर रहे हैं, जहां शासक को सुरक्षा देने के लिए बनाए गए वफादार ही कई बार शक्ति जुटाकर उसके लिए खतरा बनने लगते हैं. ऐसे में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान अब आपराधिक कार्रवाई न रहकर वैचारिक और राजनीतिक मनोविज्ञान को बदलने का औजार बन गया है.

खासकर, सोवियत संघ के पतन और चीनी राजवंशों के अंत के इतिहास से शी जिनपिंग ज्यादा परेशान हैं. उनका मानना है कि अगर वक्त रहते पार्टी के भीतर से सड़न को साफ नहीं किया गया, तो CCP भी इतिहास के पन्नों में खो जाएगी. चीन में न लोकतंत्र है और  न ही स्वतंत्र न्यायपालिका. ऐसे में जवाबदेही तय करने के लिए उन्होंने 'आत्म-क्रांति' को अपना मुख्य जरिया बना लिया है.

दिखने में मजबूत लेकिन अंदर से कमजोर

चीन में CCP की अगली पार्टी कांग्रेस अब 2027 में होगी. उससे पहले शी जिनपिंग ने अपने ही तंत्र पर वार करके साफ संदेश दिया है कि किसी भी गुट को इतना ताकतवर नहीं होने दिया जाएगा कि वह उन पर शर्तें थोप सके. एक्सपर्टों का कहना है कि शी की यह रणनीति उन्हें शॉर्ट टर्म में भले ही सुरक्षित रखे, लेकिन दीर्घावधि में यह उनकी स्थिति को कमजोर ही कर रही है.

दुनिया की सबसे बड़ी सेना और परमाणु हथियारों की कमान संभालने वाला 7 सदस्यीय केंद्रीय सैन्य आयोग इस कार्रवाई से पूरी तरह हिल चुका है. इस आयोग के डिप्टी चीफ और  जनरल झांग यूशिया को जिनपिंग पद से हटा चुके हैं. अटूट मजबूती का दिखावा करने की कोशिश में शी जिनपिंग एक ऐसे पिरामिड के शिखर पर अकेले बैठे हैं, जो हर कार्रवाई के साथ और ज्यादा खोखला होता जा रहा है. यही वजह है कि 14 साल से ज्यादा समय से सत्ता में रहने के बाद भी शी जिनपिंग को अपनी चुनी हुई सेना की वफादारी पर पूरा भरोसा नहीं हो पा रहा है.
 

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About the Author

Devinder Kumar

Devinder Kumar

अनुभवी पत्रकार और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक हैं. पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. अमर उजाला और नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने के बाद, वर्तमान में वे Zee News में कार्यरत हैं. देश-दुनिया और ब्रेकिंग न्यूज पर नजर रखते हैं. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक घटनाक्रमों और खोजपरक पत्रकारिता में विशेष पकड़ है.
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