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राजस्थान के बीकानेर का नाम आते ही जुबां पर भुजिया और मिठाई का स्वाद आ जाता है, लेकिन अब इस शहर की पहचान में एक और चीज जुड़ रही है. आस्था का धागा... जी हां, जिस मौली या कलावा को हम पूजा-पाठ और हर मांगलिक अवसर पर कलाई में बांधते हैं वही धागा अब बीकानेर से निकलकर देशभर की कलाई तक पहुंच रहा है.
खास बात यह है कि इस कारोबार की शुरुआत एक महिला ने महज 10 हजार रुपये से अपने घर से की थी और आज उनका उद्यम करीब 100 लोगों की रोजी-रोटी का जरिया बन चुका है. यह कहानी है परंपरागत हुनर, महिला उद्यमशीलता और छोटे से सपने के बड़े कारोबार में बदलने की.
किसी की कलाई पर बंधा यह लाल-पीला धागा देखने में भले ही छोटा हो, लेकिन सनातन परंपरा में इसका महत्व बेहद खास है. पूजा हो, हवन हो, विवाह हो या कोई भी मांगलिक कार्य कलावा यानी मौली के बिना धार्मिक रस्में अधूरी मानी जाती हैं. इसी आस्था को बीकानेर के हुनरमंद हाथ अब कारोबार की नई पहचान दे रहे हैं.
दिवाली से लेकर छठ तक त्योहारों और धार्मिक आयोजनों के चलते मौली की मांग बढ़ जाती है. ऐसे में बीकानेर की इस यूनिट में इन दिनों काम की रफ्तार तेज है. मशीनों के दौर में भी यहां परंपरागत हुनर और मेहनत का मेल देखने को मिल रहा है. धागों को तैयार करने से लेकर उन्हें अलग-अलग रूप देने तक, हर चरण में बड़ी संख्या में लोग जुटे हैं.
इस कारोबार की कहानी भी किसी प्रेरणा से कम नहीं, कृष्णा खत्री ने बताया कि उन्होंने साल 2012 में महज 10 हजार रुपये की पूंजी से इस काम की शुरुआत की थी. शुरुआत छोटी थी, लेकिन सपना बड़ा था. धीरे-धीरे मेहनत रंग लाई और बीकानेर में तैयार होने वाली उनकी मौली आज देश के कई राज्यों तक पहुंच रही है.
कृष्णा खत्री के मुताबिक, आज उनका यह कारोबार करीब 100 लोगों को रोजगार दे रहा है. यानी एक छोटे से घरेलू प्रयास ने न केवल बाजार में अपनी जगह बनाई, बल्कि कई परिवारों की आजीविका से भी जुड़ गया. लोकल फॉर वोकल की भावना के साथ आगे बढ़ता यह उद्योग स्थानीय हुनर और महिला उद्यमशीलता की मिसाल पेश कर रहा है. एक तरफ आधुनिक मशीनें उत्पादन को रफ्तार दे रही हैं, तो दूसरी तरफ सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा से जुड़ा यह धागा आज भी लोगों की आस्था का हिस्सा बना हुआ है.
बीकानेर की पहचान अब सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं रही. यहां का बना आस्था का धागा भी देशभर में पहुंच रहा है. महज 10 हजार रुपये से शुरू हुआ यह सफर बताता है कि छोटे से विचार, मेहनत और हौसले के दम पर स्थानीय हुनर को राष्ट्रीय पहचान दिलाई जा सकती है.
Reporter- Raunak Vyas