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कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके को एक दिन हिरासत में रखने के बाद दिल्ली पुलिस ने शनिवार को उन्हें एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कोर्ट (AMC) में पेश किया. वहां पर पीस बॉन्ड भरवाकर उन्हें रिहा कर दिया गया. यह इस साल दूसरा मामला था, जिसमें दीपके को बिना इजाजत धरना-प्रदर्शन करने के आरोप में अदालत के सामने इस तरह शपथ पत्र भरकर देना हो. सवाल ये है कि यह पीस बॉन्ड क्या होता है, जिसके आधार पर अदालत ने दीपके को शर्तों के साथ छोड़ दिया. यह पीस बॉन्ड बेल बॉन्ड से किस प्रकार अलग होता है. अगर दीपके ने पीस बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया तो उसका अंजाम क्या होगा. आइए, आज आपको इन सब कानूनी पहलुओं के बारे में विस्तार से बताते हैं.
गौतमबुद्ध डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में सीनियर एडवोकेट चौधरी प्रेम सिंह के मुताबिक, पीस बॉन्ड और बेल बॉन्ड, दोनों ही कानूनी प्रक्रिया के हिस्से हैं. इनमें से कौन-सी प्रक्रिया का इस्तेमाल होगा, यह मौजूदा परिस्थितियां देखकर ही तय किया जाता है.
इन दोनों के बीच के अंतर को हम ऐसे समझ सकते हैं:
नए BNS/BNSS के प्रावधानों के तहत, पीस बॉन्ड को भरने का आदेश कोई एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट जारी करता है. यह बॉन्ड तब भराया जाता है, जब मजिस्ट्रेट को यह अंदेशा हो कि अमुक व्यक्ति भविष्य में शांति भंग कर सकता है या कोई झगड़ा-फसाद कर सकता है.
ऐसे हालात में पुलिस उस व्यक्ति को पकड़कर एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की कोर्ट में पेश करती है. आमतौर पर ऐहतियातन हिरासत में लिए गए व्यक्ति को जेल नहीं भेजा जाता और उससे 6 महीने या एक साल का मुचलका भरवाकर छोड़ दिया जाता है. इस मुचलके में इस बात का शपथ पत्र दिया जाता है कि वह तय की गई अवधि में ऐसा कोई भी काम नहीं करेगा, जिससे शांति-व्यवस्था प्रभावित हो.
अगर तय अवधि में आरोपी अपने मुचलके की शर्तों का उल्लंघन करता है तो कोर्ट उससे जुर्माने के रूप में बॉन्ड की राशि वसूल सकती है. साथ ही शांति बनाए रखने के लिए उसे जेल भेजने का आदेश भी जारी कर सकती है.
इस बारे में एक अपवाद भी है. अगर एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को लगे कि शांति भंग की आशंका में पेश किए गए व्यक्ति को छोड़ने से हालात बिगड़ सकते हैं तो वह उसे 14 दिनों तक के लिए जेल भेजने का आदेश जारी कर सकती है.
एडवोकेट चौधरी प्रेम सिंह बताते हैं कि अगर कोई व्यक्ति संज्ञेय अपराध में पकड़ा जाए लेकिन उसका आरोप ज्यादा गंभीर न हो तो उसे बेल बॉन्ड पर थाने या एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कोर्ट से रिहा किया जाता है. इस बॉन्ड की खास बात ये होती है कि इसमें आरोपी की पहले औपचारिक गिरफ्तारी की जाती है. उसके बाद उसे जमानत दाखिल करने का अवसर दिया जाता है.
इस बेल बॉन्ड में आरोपी को लिखित में इस बात की गारंटी देनी होती है कि वह तय की गई तारीखों पर नियमित रूप से कोर्ट में हाजिर होगा और भविष्य में किसी अपराध में शामिल नहीं होगा. अगर वह शर्तों का उल्लंघन करता है तो एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कोर्ट उसका बेल बॉन्ड खारिज करके जमानत राशि जब्त करने का आदेश दे देती है. इसके साथ ही उसकी गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया जाता है.
एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट कोर्ट ने सौरव दास या आशुतोष रांका की तरह अभिजीत दीपके को जेल भेजने के बजाय लगातार दूसरी बार पीस बॉन्ड भरवाकर रिहा कर दिया. इस रिहाई के लिए दीपके ने खुद बॉन्ड पर साइन करके आग्रह किया. इसका मतलब ये है कि उन्हें अब बॉन्ड में दी गई शर्तों का पालन करना ही होगा. अगर वे इन शर्तों से मुकरते हैं तो कोर्ट उनका बॉन्ड खारिज कर गिरफ्तारी और जेल भेजने का आदेश जारी कर सकती है.