खुतबा क्या है, इस्लाम में क्यों है इसकी अहमियत; कश्मीर की मस्जिदों में एक जैसे उपदेश के प्रस्ताव पर क्यों छिड़ा संग्राम?
जम्मू-कश्मीर में 'खुतबा' को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है. मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री समेत तमाम धार्मिक नेता इस पर बयानबाजी कर रहे हैं. चलिए जानते हैं कि खुतबा क्या होता है और क्यों विवाद मचा हुआ है.
जुमा की नमाज के दौरान पढ़े जाने वाले 'खुतबा' को लेकर विवाद हो गया है. राज्य के वक्फ बोर्ड ने फैसला लिया है कि सभी धार्मिक जगहों पर होने वाले खुतबा का 'विषय' पहले ही तय किया जाएगा. 10 अक्टूबर को बोर्ड की चेयरपर्सन और BJP नेता डॉ दरख्शां अंद्राबी ने बोर्ड से जुड़े इस्लामिक विद्वानों के साथ बैठक की और एक ऐसी व्यवस्था अपनाने का फैसला किया जिसके तहत धार्मिक उपदेश यानी खुतबे के विषय पहले से तय किए जाएंगे. विषयों को मंजूरी देने के लिए एक कमेटी बनाई जाएगी. इस पहल को भारत में अपनी तरह का पहला कदम बताया गया, जिसमें जम्मू-कश्मीर इसे अपनाने वाला पहला क्षेत्र बना.
प्रस्ताव के तहत, वक्फ से जुड़े संस्थानों (जिनमें मस्जिदें और दरगाहें शामिल हैं) में एक कोर कमेटी बनाई जाएगी जो पहले से ही विषयों को अंतिम रूप देगी और उन्हें लागू करने के लिए विद्वानों तक पहुंचाएगी. बोर्ड ने इसे प्रशासनिक तालमेल के तौर पर पेश किया था और इसका एक प्रेस रिलीज भी बोर्ड ने जारी किया था, लेकिन जल्द ही इसका कड़ा विरोध शुरू हो गया. इसे वक्फ संपत्तियों के शुद्ध प्रशासन के बजाय धार्मिक मामलों में दखलंदाजी के तौर पर भी देखा जा रहा है.
खुतबा क्या होता है?
खुतबा एक तरह का धार्मिक उपदेश होता है, जो जुमा की नमाज या फिर ईद की नमाज के मौकों पर पढ़ा जाता है. यह एक अरबी भाषा का शब्द है, जिसका हिंदी अर्थ भाषण या उपदेश होता है. खुतबा पढ़ने वाले शख्स को 'खतीब' कहते हैं, आम तौर पर मस्जिद के इमाम साहब यह पढ़ते हैं. जबकि खुतबा देने के लिए इस्तेमाल होने वाले ऊंचे स्थान को मिम्बर कहते हैं. खुतबे में अल्लाह की तारीफ, पैगंबर मोहम्मद का जिक्र, कुरआन की आयतों की तिलावत और लोगों को धार्मिक व नैतिक जीवन के लिए प्रेरित करने वाली बातें शामिल होती हैं. इसमें सामाजिक जिम्मेदारियों, इंसाफ, इंसानियत और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मुद्दों पर भी मार्गदर्शन दिया जा सकता है. खुतबा हमेशा अरबी भाषा में ही पढ़ा जाता है.
उमर अब्दुल्ला ने क्या कहा?
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विरोध करते हुए X पर लिखा,'यह मुसलमानों के धार्मिक मामलों में BJP की दखल अंदाजी की एक अस्वीकार्य कोशिश है और इसे किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. BJP के जरिए नियुक्त चेयरपर्सन को अपने आकाओं को खुश करने की इस गलत कोशिश से तुरंत बाज आना चाहिए.'
महबूबा मुफ्ती ने भी किया तीखा हमला
PDP प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने भी तीखी आलोचना करते हुए कहा,'...मस्जिदें लोगों की आस्था और उनके योगदान से बनती हैं. मौलवी और इमाम बेहतर जानते हैं कि उन्हें अपने उपदेशों (खुत्बों) में क्या कहना है. अब ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि शुक्रवार के उपदेश में इमाम क्या कहेंगे, यह BJP या RSS के दफ्तर तय करेंगे. हमें ऐसा दखल बिल्कुल मंजूर नहीं है.'
मीरवाइज उमर फारूक भी बोले
MMU के प्रमुख मीरवाइज उमर फारूक ने कहा,'मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा ने वक्फ बोर्ड के उस प्रस्ताव पर गंभीरता से ध्यान दिया है और उसे पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि मस्जिदों में जुमे (शुक्रवार) के खुतबे (धार्मिक उपदेश) वक्फ बोर्ड द्वारा तय किए जाएं. मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा यह साफ करना चाहती है कि किसी भी सरकार या सरकारी संस्था को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि मस्जिद के इमाम मिंबर (मंच) से क्या खुतबा देंगे. ऐसा प्रस्ताव बेहद गैर-जिम्मेदाराना है, जिसे जम्मू-कश्मीर के मुसलमान कभी स्वीकार नहीं करेंगे.'
मुफ्ती-ए-आजम का भी फूटा गुस्सा
जम्मू-कश्मीर के मुफ्ती-ए-आजम और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रमुख मुफ्ती नासिर-उल-इस्लाम ने केंद्र शासित प्रदेश के लोगों से कहा कि वे ऐसे फैसलों को न अपनाएं और न ही उन पर अमल करें. क्या उन्हें नहीं दिखता कि ऐसे कई विद्वान और इमाम हैं जिनका इस्लामी कानून (फ़िक़्ह) में ऊंचा मकाम है और जिनकी बातों का असर होता है? ऐसे संदेश और फैसले फूट डालने वाले हैं और इन पर अमल करने की कोई जरूरत नहीं है. मेरा मानना है कि ऐसा फैसला न सिर्फ लोगों के खिलाफ है, बल्कि यह शरीयत और इस्लाम के उसूलों के भी खिलाफ है. मैं वक्फ अधिकारियों से कहना चाहता हूं कि आप अपने काम में जिस तरह चाहें कामयाबी हासिल करें, लेकिन शरीयत के मामलों में दखलंदाजी सिर्फ उतनी ही होनी चाहिए जिससे यहां के मुसलमानों की भावनाओं को ठेस न पहुंचे.
दरख्शा अंद्राबी ने बाद में दी सफाई
बढ़ते विवाद के बीच, जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की चेयरपर्सन डॉ. दरख्शा अंद्राबी ने सभी आरोपों को खारिज कर दिया. उन्होंने जोर देकर कहा,'बोर्ड की तरफ से कोई आदेश जारी नहीं किया गया था, बल्कि यह फैसला जम्मू-कश्मीर के इस्लामी विद्वानों को लेना था. उन्होंने उन दावों को भी नकार दिया कि वक्फ बोर्ड ने ऐसा कोई आदेश जारी किया था.' उन्होंने आगे कहा कि हमारा मकसद यह है कि जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड से जुड़े सामाजिक मुद्दों और बुराइयों पर हमारे धार्मिक विद्वान जम्मू-कश्मीर में किसी एक आम मुद्दे पर बात करें. हमारे सभी विद्वान बहुत पढ़े-लिखे हैं, उन्होंने न सिर्फ नाम कमाया है, बल्कि डिग्रियां भी हासिल की हैं. हमें अपने विद्वानों और इमामों पर सचमुच गर्व है. जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड और उससे जुड़े धार्मिक विद्वानों और बुद्धिजीवियों ने तय किया कि अगर किसी आम मुद्दे पर बात करना या उसे उठाना हमारे नेताओं को ठीक नहीं लगता, तो ठीक है, ऐसा नहीं किया जाएगा.
उन्होंने आगे कहा,'मैंने खुद कोई फैसला नहीं लिया और न ही मेरे अधिकारी फैसले लेते हैं. बल्कि, विद्वानों को खुद तय करना होता है कि उपदेशों में क्या कहना है. आप जानते हैं कि हाल ही में एक वीडियो सामने आया था जिसमें मीरवाइज साहब ने भी शुक्रवार को कहा था कि हर जगह एक जैसा उपदेश दिया जाना चाहिए. मैंने देखा कि वह भी कह रहे हैं कि हमें धर्म, सामाजिक बुराइयों और समाज में मौजूद आम मुद्दों और बुराइयों पर बात करनी चाहिए, तो हमारा रुख भी वही है, फिर इतना हंगामा क्यों?'