क्या सुप्रीम कोर्ट की तीखी फटकार राहुल गांधी के लिए थी? चीफ जस्टिस की नाराजगी के पीछे का असली सच क्या है?
क्या देश की सबसे बड़ी अदालत पर दबाव बनाने की कोई सुनियोजित कोशिश हो रही है? और क्या सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने 'डराने-धमकाने' को लेकर जो सख्त टिप्पणी की, उसका सीधा इशारा राहुल गांधी की तरफ था? आइए जानते हैं पूरा मामला...
12 अक्टूबर को इंडिया गठबंधन के नेताओं और कार्यकर्ताओं का हुजूम जिस तरह सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री के भीतर तक दाखिल हुआ और वहां जमकर नारेबाजी हुई, उसने न्यायपालिका की गरिमा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. आज जब चीफ जस्टिस ने साफ शब्दों में कहा कि 'न्यायपालिका को कोई डरा नहीं सकता', तो सियासी गलियारों में भूचाल आ गया. बीजेपी इसे सीधे राहुल गांधी के आचरण पर अदालत का आईना बता रही है. आइए आज के DNA में जानते हैं इस पूरे विवाद की इनसाइड स्टोरी...
संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव आंबेडकर का मानना था, 'यदि न्यायपालिका को बाहरी दबाव से स्वतंत्र नहीं रखा गया तो आम नागरिक के अधिकारों का कोई मूल्य नहीं रह जाएगा. न्यायालय की गरिमा और स्वतंत्रता ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ढाल है.' आज भी न्यायपालिका देश के आखिरी व्यक्ति की उम्मीद का आखिरी दरवाजा है. अदालत पर लोगों का अडिग भरोसा ही लोकतंत्र को हर संकट से बचाता और मजबूत करता है.
'न्यायपालिका को कोई डरा नहीं सकता'
दुर्भाग्यवश आज देश की सबसे बड़ी अदालत को यह कहना पड़ा कि न्यायपालिका को कोई डरा नहीं सकता. मुख्य न्यायाधीश को ये टिप्पणी करनी पड़ी है. सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई हो रही थी. इसी दौरान मुख्य न्यायाधीश ने 12 अक्टूबर को हुए इंडिया गठबंधन के 'सुप्रीम कोर्ट मार्च' पर बहुत सख्त टिप्पणी की. उन्होंने मार्च के दौरान नेताओं के आचरण पर सवाल उठाए और कहा कि हमें सब पता है कि कोर्ट के अंदर और बाहर क्या कहा जा रहा है. यह अहम टिप्पणी करते हुए चीफ जस्टिस ने किसी नेता का नाम तो नहीं लिया, लेकिन बीजेपी कह रही है कि यह संदेश राहुल गांधी के लिए था.
सवाल है, क्या सुप्रीम कोर्ट की डराने-धमकाने वाली टिप्पणी राहुल गांधी के लिए ही थी? 12 अक्टूबर को ऐसा क्या-क्या हुआ था, जिसकी वजह से चीफ जस्टिस को ऐसी तल्ख टिप्पणी करनी पड़ी? उनके शब्दों में किसके लिए आक्रोश था. सीजेआई किसके आचरण से आहत थे? इसे डिकोड करने से पहले विस्तार से जानिए, आज सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या हुआ?
आज अदालत में क्या हुआ?
मुख्य चुनाव आयुक्त और एसआईआर को लेकर जारी विवाद से जुड़ी 46 याचिकाओं पर आज सर्वोच्च अदालत में एक साथ सुनवाई हुई. इनमें दिल्ली में विरोध प्रदर्शन, पुलिस की कार्रवाई, पत्रकारों और वकीलों के खिलाफ कार्रवाई के साथ-साथ प्रदर्शन के दौरान मेट्रो, ट्रेन और इंटरनेट सेवाओं के बाधित होने से जुड़ी याचिकाएं शामिल थीं.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ के सामने विपक्ष और प्रदर्शनकारियों की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, इंदिरा जयसिंह और गोपाल शंकरनारायणन जैसे वरिष्ठ वकील पेश हुए, जबकि केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस का पक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रखा.
इन 46 याचिकाओं में से एक याचिका में मांग की गई थी कि कोर्ट परिसर के अंदर राजनीतिक प्रदर्शन करने पर रोक लगाई जाए. याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील गौरव भाटिया ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के आसपास जुलूस और प्रदर्शनों पर रोक लगनी चाहिए. 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में जो हुआ, वैसा नहीं होना चाहिए था.
मुख्य न्यायाधीश ने क्या कहा?
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कोई भी न्यायपालिका पर दबाव नहीं बना सकता. ऐसी कोशिशें पहले भी होती रही हैं, लेकिन कभी कामयाब नहीं हो पाई हैं. हमें पता है कि लोग बाहर क्या बयान दे रहे हैं और कोर्ट में क्या कह रहे हैं. हम बंद कमरों में बैठकर काम नहीं करते. कोर्ट को सभी बातों की जानकारी है.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि हम अगली सुनवाई की तारीख पर एक याचिकाकर्ता से उनके आचरण के बारे में पूछना चाहेंगे. उन्हें अपना स्पष्टीकरण देना होगा.
इस पर कपिल सिब्बल ने कहा कि नेताओं का इरादा न्यायपालिका को प्रभावित करने का बिल्कुल नहीं था. अगर कोर्ट को ऐसा लगा है, तो हम इस पर जवाब दाखिल करेंगे, लेकिन इस वजह से मुख्य मामले की गंभीरता कम नहीं होने दी जानी चाहिए.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कपिल सिब्बल और याचिकाकर्ताओं से कहा कि चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया जा रहा है, लेकिन एक याचिकाकर्ता के रवैये पर आपत्ति है और हम उनसे जरूर सवाल करेंगे.
इस बीच, सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए वरिष्ठ वकील गौरव भाटिया ने कोर्ट परिसर में हंगामे को लेकर इंडिया गठबंधन के नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने के लिए नोटिस जारी करने की मांग की. हालांकि, कोर्ट ने अभी अवमानना की कार्रवाई के लिए नोटिस जारी नहीं किया है.
सर्वोच्च अदालत ने विपक्ष के सुप्रीम कोर्ट मार्च के दौरान हुई नारेबाजी और हंगामे के खिलाफ दायर इस याचिका में रखी गई दूसरी मांगों पर नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, अखिलेश यादव और अन्य नेताओं को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.
12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में असल में हुआ क्या था?
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमना का मानना है कि "न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उस पर जनता का भरोसा लोकतंत्र के जीवित रहने के लिए नॉन-नेगोशिएबल हैं. जब अदालतों पर हमले होते हैं या उन्हें डराने का प्रयास किया जाता है, तो असल में लोकतंत्र की नींव पर हमला होता है." इसलिए चीफ जस्टिस की आज की टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है.
सुप्रीम कोर्ट जिस घटना से नाराज है, वह हम आपको बताते हैं. असल में 12 अक्टूबर को बाराखंभा रोड से मार्च करते हुए राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के नेता अपने समर्थकों के साथ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे. भीड़ के साथ राहुल गांधी सीधे सुप्रीम कोर्ट परिसर में पहुंच गए थे. उस समय सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री बंद होने वाली थी. राहुल गांधी और दूसरे बड़े नेता खुद सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री के अंदर तक चले गए. उनके साथ समर्थकों और सुरक्षाकर्मियों की भारी भीड़ भी अंदर आ गई और नारेबाजी करने लगी. इससे कोर्ट परिसर से लेकर रजिस्ट्री के भीतर तक भारी अव्यवस्था फैल गई. हम आपको सुनाते हैं कि किस तरह रजिस्ट्री में नारेबाजी हो रही थी.
ऐसी तस्वीरें देखकर चीफ जस्टिस आहत हुए. इसीलिए उन्होंने आचरण को लेकर आईना दिखाया. किसी तरह की धमकी या दबाव से नहीं डरने की बात कही. प्रदर्शन आयोजित करने वालों को जिम्मेदार ठहराने की बात कही. अब बीजेपी का दावा है कि सुप्रीम कोर्ट ने जो डराने-धमकाने वाली टिप्पणी की है, वह राहुल गांधी के संदर्भ में है.
बीजेपी राहुल गांधी पर अराजकता फैलाने का आरोप लगा रही है, तो कांग्रेस कह रही है कि सुप्रीम कोर्ट पर कौन दबाव बना रहा है, यह सबको पता है. हम आपको सुनाते हैं कि किस तरह सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर सियासी बयानबाजी हो रही है.
अदालतों की साख पर चोट और सोशल मीडिया ट्रायल की साजिश
12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के अंदर जो हुआ, वैसा आज तक कभी नहीं हुआ था. इसलिए चीफ जस्टिस नाराज हैं. कांग्रेस के नेताओं की निष्ठा पर इसलिए भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि जिस दिन इंडिया गठबंधन के नेता और समर्थक सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में दाखिल हुए थे, उसी दिन केरलम कांग्रेस प्रदेश कमेटी के सोशल मीडिया हैंडल से चीफ जस्टिस को लेकर एक विवादित पोस्ट किया गया था.
इसमें चीफ जस्टिस सूर्यकांत से कानून-व्यवस्था से जुड़ी एक टिप्पणी को लेकर इस्तीफे की मांग की गई थी. हालांकि, बाद में उस पोस्ट को हटा लिया गया था और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने ऐसी टिप्पणी से किनारा भी कर लिया था. लेकिन एक तरह से यह सुप्रीम कोर्ट की साख पर चोट थी. और सच्चाई यह है कि पिछले कुछ बरसों में इसी तरह सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता को कमजोर करने की साजिशें हुई हैं.
फैसले को स्वीकार करने के बजाय जज की नीयत पर अक्सर यह कहकर हमला होता है कि वह सरकार का आदमी है, विपक्ष का समर्थक है या फिर पक्षपाती है. अधूरी वीडियो क्लिप, संदर्भ से बाहर की गई टिप्पणियों और व्यक्तिगत हैशटैग अभियानों के जरिए सोशल मीडिया पर ट्रायल किया जा रहा है.
बात-बात पर इस्तीफा मांगना, 'रिप्लेसमेंट' की धमकी देना, जूता फेंकना या फिर कोर्ट रूम में गाली देना सामान्य आलोचना नहीं है. फिर भी ऐसा हो रहा है. और दुर्भाग्य की बात यह है कि इसमें हर पक्ष के लोग शामिल हैं. ऐसा नहीं है कि सिर्फ विपक्ष के लोग ऐसा कर रहे हैं या सिर्फ सत्ता पक्ष के लोग ऐसा कर रहे हैं. जिसको जब मौका मिलता है, वह न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुंचाने की कोशिश करता है. 2018 में राहुल गांधी ने कहा था कि जजों को काम नहीं करने दिया जा रहा है.
अप्रैल 2025 में बीजेपी के सांसद निशिकांत दुबे ने तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना को देश में हो रहे गृहयुद्धों के लिए जिम्मेदार बताया था. तब बीजेपी ने निशिकांत दुबे की टिप्पणी से दूरी बना ली थी और इस बार एक तरफ केरल कांग्रेस ने चीफ जस्टिस के इस्तीफे की बात की तो राहुल गांधी के साथ उनके समर्थक रजिस्ट्री में जाकर नारेबाजी करने लगे. इसलिए आज जब रजिस्ट्री के अंदर हंगामे पर चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की है, उसने बीजेपी को मौका दे दिया.
केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को भी कोर्ट का नोटिस
हालांकि आज सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी नोटिस जारी किया. जंतर मंतर को प्रदर्शन स्थल का दर्जा समाप्त करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया और कहा कि सरकार इस फैसले की वजह स्पष्ट करे. कोर्ट ने पुलिस और अन्य एजेंसियों को प्रदर्शन स्थल से जुड़े सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का आदेश भी दिया है.
कोर्ट ने वकीलों, पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कार्रवाई और अवैध हिरासत के आरोपों से जुड़ी याचिकाओं पर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है. हालांकि बीजेपी याचिकाकर्ता पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी को लेकर राहुल गांधी को घेर रही है.
नेहा बोरा का बयान और बांग्लादेश मॉडल पर सियासी घमासान
12 अक्टूबर को मार्च के दौरान और उसके बाद आइसा की नेता नेहा बोरा कांग्रेस के बेहद करीब दिख रही हैं. आज बीजेपी के एक नेता ने नेहा बोरा के एक बयान को आधार बनाकर विपक्ष के धरना-प्रदर्शन पर सवाल उठाए हैं. सबसे पहले हम आपको सुनाते हैं कि नेहा बोरा का कौन-सा बयान लगातार शेयर हो रहा है, जिस पर बीजेपी आक्रामक है.
नेहा बोरा जो कह रही हैं वह बहुत ही आपत्तिजनक और चिंताजनक दोनों है. क्योंकि जिस बांग्लादेश के आंदोलन को नेहा बोरा भारत में प्रदर्शन का प्रेरणास्रोत बता रही हैं, उसमें क्या-क्या हुआ था, यह हम याद दिलाना चाहेंगे.
बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के देश छोड़ते ही हजारों प्रदर्शनकारी उनके आधिकारिक निवास 'गणभवन' में घुस गए थे. उग्र प्रदर्शनकारियों ने पूरे परिसर पर कब्जा कर लिया. प्रधानमंत्री आवास के अंदर घुसपेठियों के हाथ जो भी लगा वे उसे लूट ले गए. फर्नीचर, गद्दे, कपड़े, पेंटिंग्स, यहां तक कि रसोई के बर्तन और मछलियां तक लूट ले गए थे. जिस शेख मुजीबुर रहमान ने बांग्लादेश को आजाद करवाया था उनकी मूर्ति को हथौड़ों से तोड़ दिया गया और क्रेन की मदद से गिरा दिया गया. प्रदर्शनकारियों ने बांग्लादेश के मुख्य न्यायाधीश के आधिकारिक आवास में भी घुसकर तोड़फोड़ की. क्रांति की आड़ में कट्टरपंथियों ने दीपू चंद्र दास को बीच सड़क पर जिंदा जला दिया था. जिस छात्र क्रांति की चर्चा नेहा बोरा कर रही हैं उसके बाद बांग्लादेश में सिस्टम कोलैप्स कर गया था. शासन व्यवस्था खत्म हो गई थी. उस दौरान, ढाका के कई थानों पर हमला किया गया. पुलिस की गाड़ियों और दूसरे सरकारी वाहनों को सड़कों पर फूंक दिया गया. बीजेपी पूछ रही है कि क्या नेहा बोरा बांग्लादेश से प्रेरणा लेकर यह सब करना चाहती हैं?
विपक्ष की दुखती रग और बीजेपी का सियासी पलटवार
आइसा की नेता नेहा बोरा को लेकर बीजेपी इसलिए आक्रामक है, क्योंकि 12 अक्टूबर के सुप्रीम कोर्ट मार्च के दौरान नेहा बोरा प्रियंका गांधी के साथ चल रही थीं. राहुल गांधी ने नेहा बोरा के कंधे पर हाथ रखकर मार्च किया था. उसके बाद से वह लगातार विपक्षी नेताओं के साथ दिख रही हैं. इसलिए नेहा के बहाने बीजेपी कांग्रेस पर सवाल उठा रही है, तो कांग्रेस के नेता नेहा बोरा के बांग्लादेश वाले बयान पर गोलमोल जवाब दे रहे हैं.
राजनीति में सफल होने का नियम यही है कि आप सामने वाले की सबसे कमजोर नस को ढूंढें और सही समय आने पर उसे दबाएं. जब मुख्य चुनाव आयुक्त और एसआईआर को लेकर विपक्ष आक्रामक है, हर दिन धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं, तब मौका देखकर बीजेपी ने यही किया. आज जब सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष के प्रदर्शन पर सख्त टिप्पणी की, उसके बाद ही बीजेपी ने नेहा बोरा का वीडियो निकालकर कांग्रेस को घेरना शुरू कर दिया. कांग्रेस को घेरने के पीछे बीजेपी का तर्क ये है कि, आजकल नेहा बोरा प्रदर्शन में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ दिखती हैं.
ये भी पढ़ें: अंकिता भंडारी के माता-पिता को न्याय दिलाने के लिए राहुल गांधी ने लिखी राष्ट्रपति को चिट्ठी