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तमिलनाडु सरकार को झटका: हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने वाले को नहीं मिलेगा आरक्षण, सुप्रीम कोर्ट ने दी व्‍यवस्‍था

हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने वाले व्यक्ति को OBC आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को ही बरकरार रखा है. सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद हिंदू सामाजिक व्यवस्था का पिछड़ापन दूसरे धर्म में स्थानांतरित नहीं हो सकता.

Reported By Arvind Singh Written By K. Raj Mishra
Published: Oct 15, 2026, 11:31 AM IST | Updated: Oct 15, 2026, 02:12 PM IST
Image Credit: सुप्रीम कोर्ट (File Photo)
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गैर हिंदुओं को ओबीसी आरक्षण देने के मामले में तमिलनाडु सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा झटका दिया है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने वाले व्यक्ति को OBC आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद हिंदू सामाजिक व्यवस्था का पिछड़ापन दूसरे धर्म में स्थानांतरित नहीं हो सकता. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस चंद्रशेखर की पीठ ने इस मामले की सुनवाई में यह आदेश दिया है.

क्या है पूरा मामला?

यह पूरा मामला  सेक्रेटरी टू गवर्नमेंट बनाम समीर अहमद एन से जुड़ा है. समीर का जन्म तूतीकोरिन जिले में एक हिंदू परिवार में हुआ था और उसका नाम परमशिवम था. साल 2015 में उसने मुस्लिम लड़की से शादी के लिए हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपना लिया और अपना नाम बदलकर समीर अहमद कर लिया. 

मुस्लिम धर्म अपनाने पर उसने मुस्लिम लेब्बाई समुदाय के प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया. मुस्लिम धर्म के पिछड़े वर्ग की जातियों को यह प्रमाणपत्र दिया जाता है. तहसीलदार ने उसका आवेदन खारिज कर दिया था. 

हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया था?

इस मामले के बाद साल 2024 में तमिलनाडु सरकार ने एक आदेश जारी किया था, जिसके तहत हिंदू धर्म के पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदाय और अनुसूचित जाति के लोगों को मुस्लिम धर्म अपनाने पर मुस्लिम पिछड़ा वर्ग में शामिल करने की अनुमति दी थी. 

तमिलनाडु सरकार के इस आदेश पर मद्रास हाई कोर्ट ने 9 मार्च 2024 को रोक लगा दी थी. उच्च न्यायालय ने कहा था कि सरकार किसी कार्यकारी आदेश के जरिए उन न्यायिक नजीरों को नहीं बदल सकती, जो इस्लाम अपनाने के परिणामों को तय करती हैं. मद्रास उच्च न्यायालय के ही एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति जीआरॉ स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति पीबी बालाजी की खंडपीठ ने कहा था कि जब कोई हिंदू इस्लाम अपनाता है, तो वह केवल एक मुसलमान बन जाता है. मुस्लिम समाज में उसका स्थान इस बात से तय नहीं होता कि धर्म परिवर्तन से पहले वह किस जाति से था.

उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि सरकारी आदेश मनमाना था, क्योंकि इसमें अनुसूचित जातियों और पिछड़ा वर्गों जैसी अलग-अलग आरक्षण श्रेणियों के लोगों को एक ही श्रेणी 'पिछड़ा वर्ग मुस्लिम' में शामिल करने की कोशिश की गई थी. 

मद्रास उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि इस्लाम अपनाने वाला कोई भी व्यक्ति, केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर अधिसूचित 'पिछड़ा वर्ग मुस्लिम' समुदायों में से किसी एक का सदस्य होने का दावा नहीं कर सकता है. इसके बाद राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के आदेश के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के फैसले को ही बरकरार रखा है.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या टिप्पणी की?

तमिलनाडु सरकार को झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धर्म बदलने पर व्यवस्था भी बदल जाएगी. कोर्ट ने कहा कि गैर हिंदू समाज में जाने वाला व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत पुरानी व्यवस्था के तहत सामाजिक पिछड़ेपन पर सकारात्मक कार्रवाई का दावा नहीं कर सकता है. 

कोर्ट ने कहा कि संविधान में अनुसूचित जाति की स्पष्ट व्याख्या की गई है. हिंदू धर्म के अलावा बौद्ध धर्म और सिख धर्म में ही अनुसूचित जाति की व्यवस्था पाई जाती है. इसके अलावा किसी अन्य धर्म के लोगों को अनुसूचित जाति का लाभ नहीं दिया जा सकता है. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धर्म बदलने पर अनुसूचित जाति दर्जा भी अपने आप समाप्त हो जाता है.

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About the Author

अरविन्द सिंह ज़ी न्यूज़ में सीनियर जर्नलिस्ट हैं. पत्रकारिता में करीब दो दशक का अनुभव है. वह मुख्यत: सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्टिंग करते हैं. इसके अलावा देशभर में कोर्ट से आने वाली बड़ी ख़बरों पर भी उनकी नज़र रहती है. कानून की जटिल, तकनीकी खबरों को सरल अंदाज में पेश करना उनकी खासियत है, इन्होंने जामिया यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. 
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