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30-31 मई 2016 की रात महाराष्ट्र के वर्धा जिले में स्थित पुलगांव के लिए एक काली रात साबित हुई. देर रात करीब डेढ़ बजे वहां सेना के केंद्रीय गोला-बारूद डिपो (CAD) के एक शेड में अचानक भीषण आग लग गई. यह शेड कोई आम जगह नहीं था, बल्कि यहां भारी मात्रा में एंटी-टैंक माइंस रखी हुई थीं. आग की लपटें इतनी तेज थीं कि पलभर में पूरा आसमान लाल हो गया. खबर मिलते ही डिपो के दमकलकर्मी बिना अपनी जान की परवाह किए तुरंत मौके पर पहुंचे और आग पर काबू पाने की कोशिश करने लगे. लेकिन बढ़ते तापमान की वजह से माइंस में एक के बाद एक भीषण धमाके होने लगे.
इस दौरान जो जांबाज आग के सबसे करीब रहकर उसे बुझा रहे थे, वे ही इन धमाकों की चपेट में आ गए. सुबह होने तक इस दर्दनाक हादसे में 16 जानें जा चुकी थीं. सेना के तत्कालीन डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह ने पुष्टि की कि जान गंवाने वालों में लेफ्टिनेंट कर्नल आर.एस. पवार, मेजर के. मनोज, सेना का एक जवान और 13 नागरिक अग्निशमन कर्मी शामिल थे. खतरे की गंभीरता को देखते हुए आसपास के गांवों से 1,000 से अधिक लोगों को सुरक्षित जगहों पर शिफ्ट करना पड़ा. कर्तव्य निभाते हुए अपनी जान न्योछावर करने वाले इन वीरों की शहादत आज भी उस खौफनाक रात की याद दिलाती है.
पुलगांव का डिपो देश के सबसे बड़े गोला-बारूद भंडारों में गिना जाता है. ऐसी जगह लगी आग आम आग नहीं होती. इसमें धमाकों का डर होता है, ज़हरीला धुआं होता है और कोई नहीं जानता कि अगला विस्फोट कब और कहां होगा. उस रात दमकलकर्मियों ने वही किया, जिसकी उनसे उम्मीद थी. आग दिखी तो वे उसकी ओर दौड़े. उस वक्त आग बुझाने का यही तरीका था कि इंसान पाइप थामकर लपटों के जितना पास जा सके, जाए. बाद में यह भी माना गया कि उनकी कोशिशों ने कहीं बड़ी तबाही टाल दी. हादसे के बाद सवाल भी उठे.
कैग ने एक साल पहले ही अपनी रिपोर्ट में आगाह किया था कि सेना के गोला-बारूद डिपो में आग से निपटने के लिए ज़रूरी उपकरण और कर्मचारी पूरे नहीं हैं. पुलगांव ने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया- क्या बारूद के ढेर में लगी आग के सामने हर बार इंसान को ही सबसे पहले भेजना होगा?
करीब दस साल बाद, 27 फरवरी 2026 को राजस्थान की पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में नज़ारा अलग था. वायुसेना का अभ्यास 'वायु शक्ति 2026' चल रहा था. दर्शकों में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह मौजूद थे. दिन और रात के चरणों के बीच जमीन पर एक ऐसा प्रदर्शन हुआ, जिस पर शायद कम लोगों का ध्यान गया.
धुएं और मलबे के बीच एक मजबूत मशीन आग की ओर बढ़ी. उसके साथ कोई दमकलकर्मी नहीं था. उसे चलाने वाला ऑपरेटर दूर सुरक्षित जगह से रिमोट के जरिए उसे दिशा दे रहा था. मशीन पर लगे ऑप्टिकल और थर्मल कैमरे लाइव तस्वीरें भेज रहे थे. थर्मल कैमरा घने धुएं में भी आग का असली केंद्र ढूंढ लेता है, फिर मशीन फोम और पानी की फुहार से उस पर वार करती है. यह रोबोट अहमदाबाद के स्टार्टअप स्वदेशी एम्प्रेसा प्राइवेट लिमिटेड ने रक्षा मंत्रालय की आईडेक्स (iDEX) पहल के तहत बनाया है. गर्मी झेलने वाला कवच, खुद को ठंडा रखने वाला सिस्टम और एक ही जगह पर पूरा घूम जाने की क्षमता इसे तंग गलियारों और मलबे से भरे इलाकों में भी काम का बनाती है.
रक्षा अधिकारियों का साफ कहना है कि यह रोबोट अग्निशमन कर्मियों की जगह नहीं लेता. इसका काम है सबसे खतरनाक जगह पर सबसे पहले पहुंचना. जहां अगला धमाका कभी भी हो सकता है, जहां धुआं जहरीला है या ढांचा गिरने का डर है, वहां पहले मशीन जाती है. दमकलकर्मी तब आगे बढ़ते हैं, जब ख़तरा कुछ कम हो चुका होता है. पुलगांव की उस रात से तुलना करें तो यह फर्क छोटा नहीं है. तब इंसान और आग के बीच कोई फ़ासला नहीं था. अब बीच में मशीन खड़ी है. यह बदलाव सिर्फ प्रदर्शन तक सीमित नहीं है. सितंबर 2023 में नौसेना ने विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत पर इस रोबोट का परीक्षण किया था. इसी साल 13 जनवरी को थलसेना ने ऐसे 18 रोबोट खरीदने का करार किया, जिसकी कुल लागत करीब 62 करोड़ रुपये है. इन्हें गोला-बारूद डिपो जैसी जोखिम भरी जगहों के लिए लिया जा रहा है, यानी ठीक वैसी जगहों के लिए जैसी पुलगांव में थी.
आग से लड़ने का पुराना तरीका पूरी तरह इंसानी साहस पर टिका था. इंसान आगे जाता था, क्योंकि उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था. पिछले दस साल में यह सोच बदली है. अब पहला सवाल यह पूछा जाता है कि सबसे बड़ा जोखिम कौन उठाएगा. चुनौतियां अब भी कम नहीं हैं. देश भर में गोला-बारूद डिपो, बंदरगाह, तेल भंडार और बड़े कारखाने हैं, जहां ऐसी आग का ख़तरा हमेशा बना रहता है. हर जगह ऐसी मशीनें पहुंचाना, उन्हें चलाने वालों को प्रशिक्षण देना और रखरखाव का पक्का इंतजाम करना लंबा काम है. पुलगांव में जान गंवाने वाले दमकलकर्मियों के पास दूर से आग बुझाने का विकल्प नहीं था. आज यह विकल्प मौजूद है. आग अब भी उतनी ही खतरनाक है, फर्क बस इतना है कि उसकी ओर पहला कदम अब इंसान नहीं, मशीन बढ़ाती है.