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अंतरिक्ष की दुनिया में भारत आज एक और बड़ी छलांग लगाने के लिए तैयार है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO आज रात ठीक 11:51 बजे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से अपना नया नेविगेशन सैटेलाइट NVS-03 लॉन्च करने की पूरी तैयार कर लिया है. GSLV-F18 रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजा जाने वाला यह सैटेलाइट भारत के अपने स्वदेशी जीपीएस यानी NavIC को शक्ति देगा. इस मिशन की कामयाबी न सिर्फ हमारे नेविगेशन सिस्टम को और ज्यादा सटीक और विश्वसनीय बनाएगी, बल्कि विदेशी तकनीकों पर देश की निर्भरता को भी कम करने का काम करेगी.
ISRO इस मिशन को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च करेगा. इसके लिए दूसरे लॉन्च पैड का इस्तेमाल किया जाएगा. 51.7 मीटर ऊंचा GSLV-F18 रॉकेट रात 11:51 बजे उड़ान भरेगा. रॉकेट के साथ 2,232 किलोग्राम वजनी NVS-03 सैटेलाइट जाएगा. जिसे जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट यानी GTO में भेजना ही मिशन का काम है. GSLV सीरीज के रॉकेट की यह 20वीं उड़ान होगी.
अगर आप इस लॉन्चिंग को अपने स्मार्टफोन पर लाइव देखना चाहते हैं, तो इसके लिए अंतरिक्ष एजेंसी की आधिकारिक वेबसाइट और YouTube चैनल https: //www.youtube.com/live/qIiYr3tRSqE पर नजर रखनी होगी. यहां लॉन्च का लाइव प्रसारण और मिशन से जुड़े अपडेट मिलेंगे.
Launch Day! The GSLV-F18/NVS-03 Mission is scheduled for launch today, 30 October 2026, at 23:51 hrs IST from Satish Dhawan Space Centre (SDSC SHAR), Sriharikota. Watch live: 30th October 2026, 23:20 hours IST onwards https://t.co/Mbllc4lcM2 Mission details: https://t.co/6YvrbYjFJI #GSLVF18 #NVS03 #ISRO #NavIC
— ISRO (@isro) October 30, 2026
NavIC का नाम सुनते ही आपके मन में सवाल जरूर आ रहा होगा कि आखिर ये है क्या? इसका जवाब है जैसे GPS फोन में गूगल मैप्स चलाने से लेकर किसी जगह का रास्ता पता करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. ठीक उसी तरह NavIC भी नेविगेशन सिस्टम है, जिसे भारत ने तैयार किया है. इसकी सहायता से किसी जगह की लोकेशन और समय का पता लगाया जा सकता है. इसका इस्तेमाल आम लोगों के साथ ही ट्रांसपोर्ट, समुद्री एक्टिविटी और कई जरूरी सर्विस में भी होता है. NavIC पूरे भारत और देश की सीमाओं से लगभग 1,500 किलोमीटर आगे तक सर्विस देने के लिए तैयार किया गया है. NVS-03 इसी सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए तैयार किया गया है. यह दूसरी पीढ़ी के NavIC सैटेलाइट प्रोग्राम का तीसरा सैटेलाइट है.
इस सैटेलाइट की सबसे खास बात इसमें लगाई गई भारतीय एटॉमिक क्लॉक है. इसके अलावा इसमें दूसरे क्लॉक भी होंगे, जिन्हें विदेशों से लिया गया है. एटॉमिक क्लॉक का काम सैटेलाइट में समय का बिल्कुल सही हिसाब रखना है. अब सवाल है कि समय का इतना सटीक हिसाब रखना जरूरी क्यों है? दरअसल, जब आपका फोन GPS या NavIC की मदद से लोकेशन बताता है, तो वह सैटेलाइट से मिलने वाले सिग्नल के समय के आधार पर दूरी का अंदाजा लगाता है. समय में जरा सी गड़बड़ी भी लोकेशन की जानकारी को प्रभावित कर सकती है.
NVS-03 में L1 बैंड का सपोर्ट भी दिया गया है. यह बदलाव इसलिए अहम है, क्योंकि इससे स्मार्टफोन और दूसरे आम नेविगेशन डिवाइस के लिए NavIC के सिग्नल इस्तेमाल करना आसान हो सकता है. साथ ही यह अमेरिकी GPS जैसे दूसरे सिस्टम के साथ भी बेहतर तालमेल बिठा सकेगा.
भारत का NavIC सिस्टम पिछले कुछ सालों से लगातार तकनीकी परेशानियों से जूझ रहा है. इसके कई पुराने सैटेलाइट में लगे एटॉमिक क्लॉक ने काम करना बंद कर दिया. कुछ सैटेलाइट सही कक्षा तक भी नहीं पहुंच सके. इसका असर पूरे नेविगेशन सिस्टम पर पड़ा. जनवरी 2025 में लॉन्च हुआ NVS-02 भी ISRO के लिए परेशानी की वजह बना. थ्रस्टर में आई गड़बड़ी के कारण यह अपनी तय कक्षा तक नहीं पहुंच पाया. इस वजह से सैटेलाइट से वैसी सेवाएं नहीं मिल सकीं, जैसी उम्मीद की जा रही थी.
मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं. मार्च 2026 में IRNSS-1F सैटेलाइट में मौजूद आखिरी काम कर रही एटॉमिक क्लॉक ने भी काम करना बंद कर दिया. इसके बाद NavIC के पास नेविगेशन सेवाओं के लिए केवल तीन सैटेलाइट बचे. जबकि सिस्टम को पूरी क्षमता से चलाने के लिए कम से कम चार सैटेलाइट की जरूरत होती है. अब ISRO इस कमी को दूर करने में जुटा है. NVS-03 के बाद NVS-04 और NVS-05 को भी लॉन्च करने की तैयारी है. इन सैटेलाइट के आने से NavIC का नेटवर्क पहले से बेहतर हो सकेगा.