)
दाऊद इब्राहिम ने 1980 और 1990 के दशक में तस्करी, रंगदारी और टारगेट किलिंग के जरिए मुंबई के अंडरवर्ल्ड में अपना नेटवर्क मजबूत किया. छोटा राजन जैसे सहयोगियों ने भी गैंग के विस्तार में भूमिका निभाई. बाद में डी कंपनी का नेटवर्क विदेशों तक फैला. दूसरी ओर, लॉरेंस बिश्नोई जेल में रहने के बावजूद कई आपराधिक मामलों को लेकर चर्चा में रहा है. गोल्डी बराड़, अनमोल बिश्नोई, सचिन बिश्नोई, विक्रम बराड़, काला जठेड़ी और काला राणा जैसे नाम उसके नेटवर्क से जोड़े जाते रहे हैं. इस नेटवर्क की गतिविधियां कई राज्यों तक फैली हैं.
अपराध की दुनिया में जब किसी नए गिरोह का फैलाव तेजी से होता है, तो उसकी तुलना अक्सर पुराने और कुख्यात नेटवर्क से की जाती है. हाल के दिनों में लॉरेंस बिश्नोई गैंग के काम करने के तरीके और उसके फैलते जाल को देखकर यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह गिरोह दाऊद इब्राहिम की 'D-कंपनी' की राह पर चल रहा है? इन दोनों गिरोहों के नेटवर्क और कार्यशैली में कई चौंकाने वाली समानताएं देखने को मिलती हैं. आइए आपको बताते हैं दोनों के काम करने के तरीकों में क्या समानताएं थीं.
टेरर-सिंडिकेट मॉडल: दोनों ही गिरोह महज रंगदारी या हत्याओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे एक सुसंगठित 'टेरर-सिंडिकेट' की तरह काम करते हैं.
स्थानीय युवाओं का इस्तेमाल: D-कंपनी स्थानीय गुर्गों का इस्तेमाल करती थी. ठीक वैसे ही, L-गैंग भी सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को आकर्षित कर उनसे आपराधिक घटनाओं को अंजाम दिलवाता है.
वर्चुअल और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म: समय के साथ अपराध का तरीका बदला है. L-गैंग आधुनिक तकनीक, सिग्नल, टेलीग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड ऐप और डार्क वेब के जरिए अपना मैसेज और सुपारी मॉडल चलाता है.
संक्षेप में कहें तो, जिस तरह 90 के दशक में दाऊद के नेटवर्क का खौफ था, आज L-गैंग भी उसी मॉडल को हाई-टेक अंदाज में अपनाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत तेजी से अपने पांव पसारने की कोशिश कर रहा है.
NIA ने UAPA के तहत लॉरेंस बिश्नोई गैंग के खिलाफ मामला दर्ज कर उसके नेटवर्क की जांच की है. डी-कंपनी और लॉरेंस गैंग के काम करने के तरीके में समानताएं हैं. लेकिन क्या दोनों का नेटवर्क, आर्थिक ताकत और अपराध करने का तरीका वास्तव में एक जैसा है? क्या मुंबई में डी कंपनी का प्रभाव घटने के बाद लॉरेंस गैंग के लिए जगह बनी है? इसी की पड़ताल इस रिसर्च स्टोरी में है.
दाऊद इब्राहिम ने मुंबई के अंडरवर्ल्ड से शुरुआत करके खाड़ी देशों के ज़रिए सोने की तस्करी, सट्टेबाजी और जबरन वसूली का अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट बनाया. वहीं, लॉरेंस बिश्नोई ने पंजाब के छात्र संगठन से निकलकर जेल में रहते हुए तकनीक, सोशल मीडिया और दूसरे राज्यों के अपराधियों को जोड़कर अपना गैंग खड़ा किया. दोनों ने डर और अपने-अपने दौर के तरीकों से दबदबा बनाया.

छोटा राजन पहले दाऊद इब्राहिम का खास दाहिना हाथ था, जिसने दाऊद के वसूली, तस्करी और मुंबई में क्राइम नेटवर्क को फैलाने व मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई. वही लॉरेंस बिश्नोई ने जेल के अंदर से ही मोबाइल और एनक्रिप्टेड ऐप्स के जरिए अपना गिरोह चलाया. बाहर मौजूद गोल्डी बराड़ और अनमोल बिश्नोई जैसे सहयोगी उसके इशारों पर रंगदारी, हत्याएं और विदेशी नेटवर्क संभालते रहे.
अलग-अलग जिम्मेदारियां: दोनों ही गैंग एक सुनियोजित नेटवर्क की तरह काम करते हैं. इनमें रेकी करना, हथियारों का इंतजाम करना और हमले को अंजाम देना. सबके लिए अलग-अलग शूटर या मेंबर्स तैनात किए जाते हैं.
स्थानीय नेटवर्क का इस्तेमाल: ये अपने नेटवर्क को फैलाने के लिए स्थानीय अपराधियों और छोटे बदमाशों को साथ जोड़ते हैं. इससे उन्हें हर इलाके में आसानी से पनाह और मदद मिल जाती है.
रंगदारी और टारगेट किलिंग: खौफ का माहौल बनाने और अपना दबदबा कायम करने के लिए दोनों ही गैंग्स रंगदारी वसूलने और टारगेट किलिंग (लक्षित हत्याओं) का सहारा लेते हैं.
कुल मिलाकर, दोनों गैंग्स का मुख्य मकसद दहशत फैलाकर अपना आपराधिक साम्राज्य बढ़ाना है और इनका पूरा ढांचा बेहद योजनाबद्ध तरीके से काम करता है.
डी कंपनी और लॉरेंस गैंग जैसे आपराधिक गिरोहों के पास अपनी काली कमाई छिपाने और अपराधों को अंजाम देने का एक बड़ा नेटवर्क होता है. डी कंपनी ने दशकों पहले सोने और हथियारों की तस्करी से शुरुआत की थी. धीरे-धीरे उसने जबरन वसूली (रंगदारी), बॉलीवुड और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में अपनी जड़ें मजबूत कर लीं. वहीं दूसरी ओर, लॉरेंस बिश्नोई गैंग पर मुख्य रूप से बड़े कारोबारियों, गायकों और नेताओं से रंगदारी वसूलने और सुपारी लेकर हत्याएं करवाने का आरोप है. इन दोनों की अवैध कमाई का पता लगाना जांच एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती है.
डी कंपनी मुख्य रूप से विदेश में छिपे आकाओं और हवाला नेटवर्क का सहारा लेती है, जबकि नया आपराधिक नेटवर्क क्रिप्टो और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करता है. सार्वजनिक रूप से दोनों गैंग की असली आर्थिक ताकत की सीधी तुलना करना बेहद मुश्किल है. इसकी वजह यह है कि इनसे जुड़े कोई आधिकारिक या पुख्ता आंकड़े मौजूद नहीं हैं; एजेंसियां केवल अपनी जांच और अनुमान के आधार पर ही इन पर कार्रवाई करती हैं.
दाऊद इब्राहिम के विदेश भागने और डी-कंपनी का दबदबा कम होने के बाद मुंबई अंडरवर्ल्ड का पारंपरिक स्वरूप पूरी तरह बदल गया है. अब पहले जैसी संगठित गैंगवार तो देखने को नहीं मिलती, लेकिन 'बाबा सिद्दीकी हत्याकांड' जैसी हाल की वारदातों ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या लॉरेंस बिश्नोई गैंग मुंबई में अपना नया ठिकाना बनाने की कोशिश कर रहा है?
हालांकि, मुंबई पुलिस का तरीका अब 1990 के दशक जैसा नहीं रहा. आज आधुनिक तकनीक, डिजिटल सर्विलांस और सटीक खुफिया नेटवर्क के जरिए अपराध पर तुरंत नकेल कसी जाती है. रही बात लॉरेंस गैंग की, तो सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को भड़काकर वारदात कराना उनकी रणनीति हो सकती है, लेकिन सिर्फ कुछ बड़ी घटनाओं के आधार पर उन्हें डी-कंपनी जितना शक्तिशाली या स्थापित मान लेना सही नहीं होगा. आज की मजबूत पुलिसिंग के दौर में किसी भी गैंग के लिए 90 के दशक जैसा समानांतर तंत्र खड़ा करना लगभग नामुमकिन है.
जब कोई सरगना जेल चला जाता है, तो उसका साम्राज्य खत्म नहीं होता. जेल से ही वह अपना नेटवर्क चलाता है. लॉरेंस बिश्नोई जैसे अपराधियों के मामलों में, विदेश में बैठे सहयोगी उसके गैंग को मजबूत बनाते हैं और विदेशों से ही रंगदारी व हमले के निर्देश मिलते हैं. जांच एजेंसियों ने पाया है कि जेल के अंदर से ही पर्चियों, फोन कॉल और इंटरनेट के जरिए गुर्गों तक संदेश पहुंचाए जाते हैं, जिससे आसानी से वारदातों को अंजाम दिया जाता है.
आज के दौर में मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इस खेल को पूरी तरह बदल दिया है. अब जेल के भीतर से वीडियो कॉल और सोशल मीडिया के जरिए आसानी से धमकियां दी जाती हैं. सरगना के पकड़े जाने से गैंग का अंत नहीं होता, बल्कि उसके खास गुर्गे और सहयोगी अलग-अलग हिस्सों में बंटकर अपना आपराधिक नेटवर्क स्वतंत्र रूप से चलाना जारी रखते हैं.
1990 के दशक की तुलना में आज दाऊद इब्राहिम जैसा विशाल और संगठित आपराधिक नेटवर्क खड़ा करना बेहद कठिन हो चुका है. पहले राज्यों की पुलिस के बीच तालमेल और आधुनिक तकनीक की कमी का फायदा उठाकर अपराधी आसानी से बच निकलते थे. आज डिजिटल सबूत (जैसे कॉल रिकॉर्ड, लोकेशन डेटा) और ट्रांसपेरेंट फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन की निगरानी से अवैध पैसों को छिपाना नामुमकिन सा हो गया है. इंटरपोल और अंतरराष्ट्रीय प्रत्यर्पण संधियों के कारण विदेश भागकर भी अपराधी सुरक्षित नहीं हैं.
सोशल मीडिया भले ही गिरोहों को नए लड़कों (शूटरों) को ऑनलाइन बरगलाकर भर्ती करने में मदद करता है, लेकिन यही उनके खिलाफ जांच एजेंसियों के लिए सबसे मजबूत सबूत भी बन जाता है. पहले शूटर स्थानीय संपर्कों से भर्ती होते थे, जबकि अब साइबर दुनिया इसका माध्यम है. अवैध वसूली का पैसा अब केवल बेनामी संपत्ति या सोने में ही नहीं, बल्कि शेल कंपनियों और शैडो फाइनेंस में भी इन्वेस्ट करने की कोशिश की जाती है, जिसे पुलिस और वित्तीय एजेंसियां तुरंत ट्रैक कर लेती हैं.