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सपनों का शहर कहलाने वाला फ्रांस आज सुलग रहा है. वजह एक नहीं बल्कि कई हैं. एक तरफ छात्र क्लासरूम छोड़कर सड़कों पर नारे लगा रहे हैं. दूसरी तरफ किसान ने गांव से निकलकर सड़कों पर उतर चुके हैं. बढ़ती महंगाई से आम आदमी का बजट गड़बड़ा चुका है. देश की रीढ़ कहलाने वाले युवाओं के मन में AI के डर से नौकरी जाने का खौफ है. इन सबका गुस्सा एक साथ फूट पड़ा है, जिसे संभालना सरकार के लिए भारी पड़ रहा है. आइए जानते हैं कि प्रदर्शन की चिंगारी कैसे भड़की...
दरअसल, फ्रांसीसी अखबार 'ले मोंद' की रिपोर्ट बताती है कि आखिर फ्रांस क्यों सुलग रहा है. रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में बिगड़ती अर्थव्यवस्था, मौसम की मार, लचर सरकारी सुविधाओं ने मिलकर लोगों का जीना मुहाल कर दिया है. यही वजह है कि यह गुस्सा किसी एक तबके तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के हर कोने में फूट रहा है. इसी का नतीजा है कि लोग सड़कों पर हैं. हम 5 बड़ी वजहें जान लेते हैं.
🚨 student protest in France are ongoing: today, approximately 500 schools have suspended classes. The French Ministry of the Interior stated that it was unable to guarantee safety at these schools. More than twenty schools have been burned or looted during the protests. For almost a month, students have been demanding improvements to their learning conditions due to a shortage of teachers, overcrowded classrooms, a heavy workload, and the condition of the school buildings.
— Aleksey The Great 🇷🇺🎖 (@aleksthgrt) October 5, 2026

फ्रांस में छात्र स्कूलों में बढ़ती भीड़, जर्जर इमारतों और शिक्षकों की कमी का विरोध कर रहे हैं. सितंबर में यह आंदोलन शुरू हुआ था, जो अब पूरे देश में फैल चुका है. छात्रों का आरोप है कि शिक्षा पर भारी भरकम बजट खर्च होने के बाद भी आज सरकारी स्कूलों की हालत खस्ता है. क्लासरूम्स में छत से पानी टपकता है, बैठने के लिए पर्याप्त कुर्सियां नहीं हैं. टीचर्स की भारी कमी है, जिसके चलते एक-एक क्लास में 30 से 36 बच्चे ठूंसे गए हैं.
बता दें कि फ्रांस में माध्यमिक स्तर पर फ्रेंच भाषा की एक कक्षा में औसतन 29 विद्यार्थी होते हैं, लेकिन अब हालात ये हैं कि शहरी स्कूलों में एक क्लास में 36 या उससे छात्रों को ठूंसा जा रहा है.
रिपोर्ट बताती है कि फ्रांस हाईस्कूल की पढ़ाई पर विकसित देशों (OECD) के औसत से करीब 28 फीसदी ज्यादा पैसा खर्च करता है. इसके बाद भी वहां न तो स्कूलों के हाल सुधरे हैं, न पर्याप्त शिक्षक हैं और न ही जरूरी संसाधन मिल पा रहे हैं. ऐसे में सवाल उठा है कि जब इतना पैसा खर्च होता है तो छात्रों को अच्छी शिक्षा क्यों नहीं मिल पा रही?
दूसरी बड़ी वजह किसानों का गुस्सा है, जो इस वक्त दोहरे संकट से जूझ रहे हैं. भयंकर सूखा, बेहिसाब गर्मी और बदलते मौसम के चलते किसानों की लागत तक नहीं निकल रही. दूसरी तरफ खाद, बीज और डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं. यही वजह है कि किसानों को अब घर चलाना मुश्किल हो चुका है.
तीसरी वजह बढ़ती महंगाई है. आम आदमी के लिए घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है. बिजली-गैस के दाम बढ़ रहे हैं. रोजमर्रा के सामान की आसमान छूती कीमतों ने लोगों की जेब ढीली कर दी है. इससे बचत तो दूर की बात बच्चों की बढ़ाई और फ्यूचर प्लानिंग के लिए आम आदमी के हाथ में कुछ नहीं बच पा रहा. यही वजह है कि लोगों का गुस्सा सीधे सरकार की नीतियों, लचर सुविधाओं और सत्ता में बैठे नेताओं पर फूट पड़ा है.
फ्रांस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते दखल ने नौकरीपेशा लोगों के मन में यह डर पैदा कर दिया कि उनकी नौकरी छिन जाएगी, जबकि दूसरी तरफ देश पर बढ़ते राष्ट्रीय कर्ज और सीमित बजट के चलते सरकार के पास इन समस्याओं को सुलझाने के लिए पर्याप्त फंड नहीं भी नहीं बचा है. कुछ नौकरियों की मांग घटने या रोजगार के स्वरूप में बदलाव आने की आशंका भी है.
स्थानीय रिपोर्ट्स बताती हैं कि फ्रांस की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं ठप होने लगी हैं. अस्पतालों में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ पर काम का भारी बोझ है. जरूरी संसाधनों की किल्लत देखी गई है. इसी वजह से आम आदमी को इलाज के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है. संसाधनों की कमी और कामकाज की परिस्थितियों को लेकर कर्मचारियों का असंतोष भी सामने आया है.
पूरे देश में हो रहे प्रदर्शनों ने मैक्रों सरकार की नींद उड़ा दी है. अधिकारियों का कहना है कि पिछले हफ्ते से जारी इस बवाल में दर्जनों लोग घायल हुए हैं. अब तक 5,000 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है. इनमें ज्यादातर नाबालिंग बच्चे शामिल हैं. फ्रांस पुलिस की प्रवक्ता अगाथे फौकॉल्ट ने बताया कि इन झड़पों में 600 से ज्यादा पुलिसवाले भी जख्मी हुए हैं.