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SIR पर घिरे ज्ञानेश कुमार के बचाव में उतरा चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट में बताया- कैसे लिए गए SIR पर फैसले

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर एकतरफा फैसले लेने के आरोपों को खारिज किया है. आयोग ने कहा कि SIR से जुड़े तीनों आदेश सभी सदस्यों की सहमति से जारी किए गए थे.

Written By Arvind Singh Edited By Tahir Kamran
Published: Oct 26, 2026, 09:25 PM IST | Updated: Oct 26, 2026, 10:40 PM IST
Image Credit: Ai की मदद से बनाई गई तस्वीर
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चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर इस आरोप को खारिज किया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अकेले ही फैसले ले रहे हैं. आयोग ने कहा है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े तीनों आदेश जून 2025, अक्टूबर 2025 और मई 2026 में आयोग के सभी सदस्यों की सहमति से जारी किए गए थे. सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को नोटिस जारी किए थे. अब मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग हलफनामे दाखिल करने के बजाय संयुक्त हलफनामा दाखिल किया है.

फाइल पर दिया गया सुझाव आयोग का आधिकारिक फैसला नहीं

चुनाव आयोग ने हलफनामे में कहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त या अन्य चुनाव आयुक्तों की ओर से दूसरे आयुक्तों अथवा आयोग के किसी अधिकारी को दिया गया सुझाव, विचार या सवाल अपने-आप में आयोग का आधिकारिक निर्णय नहीं माना जा सकता. आधिकारिक निर्णय वही होगा, जो कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आयोग द्वारा लिया गया हो. आयोग ने आगे कहा कि किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले अधिकारियों और चुनाव आयुक्तों के सुझावों, विचारों तथा सवालों पर विचार किया जाता है. सभी संबंधित पहलुओं पर विचार करने के बाद आयोग के सक्षम सदस्य निर्णय लेते हैं और उसके अनुसार आदेश जारी किए जाते हैं.

ऐसे आगे बढ़ती है आयोग की फाइल

हलफनामे के मुताबिक, चुनाव आयोग की फाइल पहले एक निर्वाचन आयुक्त, फिर दूसरे निर्वाचन आयुक्त और अंत में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पास भेजी जाती है. मंजूरी मिलने के बाद निर्णय को आयोग की फाइल में दर्ज किया जाता है और संबंधित आयुक्तों के हस्ताक्षर लिए जाते हैं. इसके बाद चुनाव आयोग का सचिवालय निर्णय की सूचना जारी करता है और उसे लागू करता है.

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चुनाव आयुक्तों और कैबिनेट सचिव के बीच पत्राचार पर सफाई

चुनाव आयोग ने चुनाव आयुक्तों और कैबिनेट सचिव के बीच हुए पत्राचार को लेकर लगाए गए आरोपों को गलतफहमी पर आधारित बताया है. हलफनामे में कहा गया है कि आयोग में आंतरिक कार्य-विभाजन 23 सितंबर 2025 के पुराने ऑफिस आर्डर के मुताबिक जारी था. 28 जुलाई 2026 को चुनाव आयोग में प्रतिनियुक्ति पर तैनात अतिरिक्त सचिव स्तर के एक IAS अधिकारी ने आंतरिक कार्य-विभाजन से संबंधित ऑफिस आर्डर जारी किया. इसके अगले दिन, 29 जुलाई 2026 को दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस आदेश और संबंधित अधिकारी के आचरण के संबंध में कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखे. इसके बाद, दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से 30 जुलाई 2026 को संयुक्त निर्देश जारी किए गए. आयोग के अनुसार, इस कारण 28 जुलाई 2026 को जारी आदेश कभी लागू नहीं हुआ.

फॉर्म-6 में बदलाव नहीं,डिक्लरेशन फॉर्म अलग दस्तावेज

चुनाव आयोग ने इस आरोप को खारिज किया है कि SIR से संबंधित आदेशों के जरिए फॉर्म-6 में संशोधन किया गया था. आयोग ने कहा कि फॉर्म-6 में बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है. डिक्लेरेशन फॉर्म एक अलग दस्तावेज है. हालांकि, आयोग ने स्वीकार किया कि ऑनलाइन पोर्टल पर फॉर्म-6 और डिक्लेरेशन फॉर्मको इस तरह प्रदर्शित किया गया था कि ऐसा लग सकता था कि फॉर्म-6 में बदलाव किया गया है. इस स्थिति को स्पष्ट करने के लिए 21 अक्टूबर से ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया को दो अलग-अलग हिस्सों में बांटने की बात कही गई है. इनमें पहला फॉर्म-6 और दूसरा घोषणा-पत्र होगा.

डिक्लेरेशन फॉर्म में बदलाव से शुरू हुई मैपिंग की व्यवस्था

आयोग के अनुसार डिक्लेरेशन फॉर्म में बदलाव करके मैपिंग की व्यवस्था शुरू की गई, ताकि आवेदक अपनी या अपने माता-पिता अथवा दादा-दादी की वर्ष 2002-2003 की पुरानी मतदाता सूची में दर्ज जानकारी दे सकें. इस व्यवस्था का उद्देश्य पुराने मतदाता रिकॉर्ड से जानकारी का मिलान करना और अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने की जरूरत को कम करना था, ताकि मतदाताओं को सुविधा मिल सके.

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CEC के कामकाज पर रोक लगाने की मांग बेमानी

चुनाव आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका को सुनवाई योग्य नहीं बताया है. हलफनामे में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, जिसका पालन सुप्रीम कोर्ट के जजों को हटाने के लिए किया जाता है. आयोग ने कहा कि तीन सदस्यीय व्यवस्था का मकसद है कि मतभेद होने की स्थिति में बहुमत के आधार पर निर्णय हो. आयोग सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर ही फैसला ले सकता है. इसलिए, मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज पर रोक लगाने से आयोग की निर्णय लेने की प्रक्रिया बाधित होगी और यह कानून में निर्धारित व्यवस्था के विपरीत होगा.

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About the Author

अरविन्द सिंह ज़ी न्यूज़ में सीनियर जर्नलिस्ट हैं. पत्रकारिता में करीब दो दशक का अनुभव है. वह मुख्यत: सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्टिंग करते हैं. इसके अलावा देशभर में कोर्ट से आने वाली बड़ी ख़बरों पर भी उनकी नज़र रहती है. कानून की जटिल, तकनीकी खबरों को सरल अंदाज में पेश करना उनकी खासियत है, इन्होंने जामिया यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. 
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