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'जेल भेजेंगे तब समझ आएगी...' बोरीवली बस स्टैंड मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, BMC कमिश्नर की सैलरी रोकी, जुर्माना भी लगाया

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी करना बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के कमिश्नर को भारी पड़ गया है. कोर्ट के निर्देशों का पालन न करने और मराठी अनुवाद का बहाना बनाने पर सुप्रीम कोर्ट के जज कड़ी नाराजगी जताई.

'जेल भेजेंगे तब समझ आएगी...' बोरीवली बस स्टैंड मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, BMC कमिश्नर की सैलरी रोकी, जुर्माना भी लगाया
Image Credit: SC के आदेश की अनदेखी BMC को पड़ी भारी! कमिश्नर की सैलरी पर लगी रोक, मराठी ट्रांसलेशन का बहाना बनाया तो भड़क गए जज

मुंबई के बोरीवली इलाके में बृहन्मुंबई इलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट (BEST) के बस स्टेशन के लिए तय जमीन से अतिक्रमण हटाने में लापरवाही बरतना बृहन्मुंबई नगर पालिका (BMC) के अधिकारियों को भारी पड़ गया है. सुप्रीम कोर्ट ने बीएमसी की ढिलाई पर सख्त रुख अपनाते हुए बीएमसी कमिश्नर और उनके संबंधित कर्मचारियों के वेतन भुगतान पर रोक लगा दी है. इसके साथ ही, अदालत का समय बर्बाद करने और काम में देरी के लिए बीएमसी पर 5 लाख रुपये का जुर्माना (कॉस्ट) भी ठोका है.

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने बीएमसी कमिश्नर को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना करने के लिए उनके खिलाफ अवमानना (Contempt of Court) की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए.

'जेल भेजेंगे, तभी समझ आएगी आदेश की कीमत'

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नगर निगम के अधिकारियों की नीयत पर तीखे सवाल उठाए. मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या बीएमसी के अधिकारी अवैध कब्जा करने वालों के साथ मिले हुए हैं?

सीजेआई ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा, "क्या अधिकारियों का यह रवैया उनकी सीधी मिलीभगत को नहीं दर्शाता? जब हम इन अधिकारियों को जेल भेजेंगे, तभी उन्हें समझ आएगा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की क्या अहमियत होती है. क्या वे आदेश मानकर हम पर कोई अहसान कर रहे हैं?" पीठ ने स्पष्ट किया कि यह सर्वोच्च अदालत के निर्देशों का जानबूझकर किया गया उल्लंघन है, जिसमें अतिक्रमणकारियों को प्रश्रय देने की बू आती है. अदालत ने चेतावनी दी कि यदि जरूरत पड़ी तो इन सख्त टिप्पणियों को औपचारिक आदेश का हिस्सा भी बनाया जाएगा.

1 दिसंबर तक सैलरी पर लगी रोक

मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि बीएमसी सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेश पर अमल किए बिना अतिरिक्त राहत या समय मांगने की हकदार नहीं है. उन्होंने कहा कि नियम बहुत सीधा है—पहले आदेश का पूरी तरह पालन कीजिए, उसके बाद ही किसी प्रकार की राहत के लिए अर्जी दाखिल कीजिए.

जस्टिस बागची ने बीएमसी के वकील को मुखातिब होते हुए कहा, 'आपको 1 दिसंबर 2026 तक वेतन नहीं मिलेगा. उस तारीख से पहले अदालत के आदेश को जमीन पर लागू कीजिए. जब काम पूरा हो जाए, तब कोर्ट आकर अपनी सैलरी की मांग कीजिएगा.' पीठ ने साफ कर दिया कि जब तक अवमानना नोटिस का संतोषजनक निपटारा नहीं हो जाता, तब तक कमिश्नर और उनकी टीम की तनख्वाह जारी नहीं की जाएगी.

मराठी अनुवाद की दलील पर भड़का कोर्ट

कार्रवाई न करने के पीछे बीएमसी की ओर से अजीब तर्क दिया गया कि स्थानीय अफसरों को अतिक्रमण हटाने से पहले संबंधित मराठी कागजातों का अंग्रेजी में अनुवाद कराने की जरूरत थी. इस बहाने पर सुप्रीम कोर्ट बुरी तरह भड़क गया.

जस्टिस बागची ने सवाल उठाया कि हलफनामा जमा करने वाले अधिकारी डॉ. तांबे हैं, तो क्या अदालत यह मानकर चले कि एक स्थानीय अधिकारी को मराठी भाषा समझ में नहीं आती? इसके अलावा बीएमसी ने काम पूरा करने के लिए 30 दिनों का अतिरिक्त समय मांगा, जिसे पीठ ने तुरंत खारिज कर दिया. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने दोटूक कहा, "हम एक दिन की मोहलत भी नहीं देंगे. आवेदन खारिज किया जाता है. अगर बीएमसी अधिकारियों को रात-रात भर बैठकर फैसले करने पड़ें, तो वे करें. उन्हें पता चलना चाहिए कि सरकारी काम कैसे किया जाता है."

जानिए क्या है पूरा विवाद?

यह पूरा मामला मुंबई के बोरीवली में सार्वजनिक हित के लिए बनने वाले BEST बस स्टेशन की जमीन से जुड़ा है. इस कीमती जमीन को लेकर बीएमसी और एक प्राइवेट बिल्डर/डेवलपर के बीच सालों से कानूनी लड़ाई चल रही थी.

13 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले का निपटारा करते हुए निजी डेवलपर को आदेश दिया था कि वह प्रशासनिक भवन समेत पूरे भूखंड का खाली और शांतिपूर्ण कब्जा तुरंत बीएमसी को सौंप दे. अदालत ने बीएमसी को तीन महीने की मोहलत दी थी कि वह जमीन का कब्जा ले, कानून के मुताबिक बाकी बचे अतिक्रमणों को हटाए और बस डिपो को आम जनता के लिए चालू करे.

लेकिन 13 नवंबर 2025 की तय समय सीमा बीत जाने के बाद भी बीएमसी जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराने में नाकाम रही, जिस पर कोर्ट ने गहरा असंतोष व्यक्त किया था. तब सुप्रीम कोर्ट ने बीएमसी कमिश्नर को व्यक्तिगत हलफनामा दायर कर कब्जेदारों की सूची, बेदखली नोटिस और कानूनी दावों की पूरी जानकारी देने को कहा था. इसके बावजूद कोई ठोस प्रगति न होने पर अब अदालत ने सीधे कमिश्नर की जवाबदेही तय करते हुए सैलरी रोकने और अवमानना चलाने का कड़ा फैसला सुनाया है.

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About the Author

Ravindra Pratap Singh

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रवींद्र प्रताप सिंह ने साल 2015 में जागरण.कॉम से डिजिटल मीडिया में कदम रखा मौजूदा समय वो ज़ी न्यूज डिजिटल में चीफ सब एडिटर हैं. अगस्त 2025 में उन्होंने ज़ी न्यूज ज्वाइन किया है. रवींद्र देश और दुनिया की खबरों के अलावा खेलों में क्रिकेट जगत और क्राइम की खबरों पर बेहतरीन पकड़ रखते हैं. इसके पहले रवींद्र रिपब्लिक भारत में इवनिंग शिफ्ट के इंचार्ज रहे और शाम की शिफ्ट संभालते हुए होम पेज की जिम्मेदारी रवींद्र के ऊपर थी. उससे पहले रवींद्र ने जनसत्ता और न्यूज नेशन में भी शाम की शिफ्ट और होम पेज की जिम्मेदारी बखूबी निभाई. इसके पहले रवींद्र ने 5 सालों तक पी7 और लाइव इंडिया जैसे न्यूज चैनलों में काम किया था. रवींद्र आकाशवाणी में काम करने का अनुभव रखते. अवध यूनिवर्सिटी से मॉस कम्युनिकेशन से पोस्ट ग्रेजुएट रवींद्र पिछले डेढ़ दशक से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं. आप रवींद्र से जुड़ने के लिए Ravindra.Singh@India.com पर मेल कर सकते हैं या फिर फेसबुक पर संपर्क करने के लिए https://www.facebook.com/pintu.singh.397 और एक्स पर https://x.com/rs66533 रवींद्र से संपर्क किया जा सकता है. 
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