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क्या है दक्षिण अफ्रीका की बोमा पद्धति? जिससे बिना चोट पहुंचाए पकड़ी जा रहीं नीलगायें, उज्जैन में 150 का रेस्क्यू

मध्य प्रदेश के उज्जैन में दक्षिण अफ्रीका की एक पद्धति के जरिए खास रेस्क्यू अभियान चलाया जा रह है. इस अभियान में लगभग 150 नीलगायों को रेस्क्यू किया गया है.

क्या है दक्षिण अफ्रीका की बोमा पद्धति? जिससे बिना चोट पहुंचाए पकड़ी जा रहीं नीलगायें, उज्जैन में 150 का रेस्क्यू
Image Credit: ZEE CREATIVE

उज्जैन में किसानों के लिए बहुत बड़ी राहत की खबर है. खेतों में खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाने वाली नीलगाय को अब सुरक्षित तरीके से दूसरी जगह पर पहुंचाया जा रहा है. इसके लिए वन विभाग ने दक्षिण अफ्रीका की बोमा पद्धति से खास रेस्क्यू अभियान चलाया जा रहा है. इस अभियान में अब तक उज्जैन से करीब 150 नीलगाय को सुरक्षित पकड़ा जा चुका है. खास बात यह है कि पूरे अभियान में किसी भी वन्यजीव को चोट नहीं आई है.

सीएफओ किरण बिसेन ने बताया कि बोमा पद्धति से वन्यजीवों को पकड़कर दूसरी जगह पहुंचाने का यह बेहद सफल प्रयास रहा है. उज्जैन में नीलगाय के कारण किसान लंबे समय से परेशान थे. ये झुंड खेतों में घुसकर खड़ी फसल को काफी नुकसान पहुंचाते हैं. ऐसे में इस अभियान से किसानों और वन्यजीवों, दोनों को फायदा होगा.

बड़े फनल की तरह घेराबंदी

उन्होंने बताया कि इस तकनीक में एक बड़े फनल की तरह घेराबंदी की जाती है. इसे पर्दों और हरे पेड़-पौधों से इस तरह ढका जाता है कि जानवरों को इसका पता नहीं चलता है. हेलीकॉप्टर की मदद से नीलगाय को बिना परेशान किए उनकी सामान्य गति से फनल की ओर लाया जाता है. इसके बाद वे रैंप के जरिए सीधे ट्रक में पहुंच जाते हैं. इस अभियान में कुल 13 ट्रकों की मदद ली गई है. इनमें 10 ट्रक टाइगर रिजर्व क्षेत्रों से और 3 ट्रक महाराष्ट्र वन विभाग से लाए गए हैं.

150 नीलगाय को किया रेस्क्यू

किरण बिसेन ने आगे बताया कि उज्जैन में अब तक करीब 150 नीलगाय का रेस्क्यू किया गया है. वहीं, पूरे उज्जैन सर्कल में शाजापुर से 1506 कृष्णमृग (ब्लैकबक) और उज्जैन सहित अन्य क्षेत्रों से कुल 232 नीलगाय का रेस्क्यू किया गया है. इन वन्यजीवों को गांधी सागर, कूनो और रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व जैसे क्षेत्रों में छोड़ा गया है.

अभियान की सबसे बड़ी सफलता

उन्होंने बताया कि इस अभियान की सबसे बड़ी सफलता यह है कि किसी भी जानवर को चोट नहीं पहुंची. न ही किसी वन्यजीव की जान को खतरा हुआ और न ही कैप्चर मायोपैथी जैसी समस्या सामने आई. यानी जानवरों को पकड़ने के दौरान तनाव के कारण होने वाली गंभीर शारीरिक परेशानी भी नहीं हुई.

कब हुई थी इसकी शुरुआत?

इस अभियान की शुरुआत 8 अक्टूबर से हुई थी. पहले शाजापुर में कृष्णमृग का रेस्क्यू किया गया. इसके बाद उज्जैन में नीलगाय को पकड़ने का काम शुरू हुआ. अब 4 नवंबर को अभियान का आखिरी दिन रहेगा. वन विभाग को उम्मीद है, कि आखिरी दिन भी अच्छी संख्या में नीलगाय का सुरक्षित रेस्क्यू किया जा सकेगा. इस अभियान से उम्मीद है, कि किसानों को फसलों से नुकसान से राहत मिलेगी. साथ ही वन्यजीवों को भी बिना किसी नुकसान के उनके लिए तय सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकेगा.

बोमा पद्धति क्या है?

दरअसल, यह बोमा पद्धति दक्षिण अफ्रीका की एक तकनीक है. इसके तहत वन्यजीवों को बिना चोट पहुंचाए सुरक्षित तरीके से पकड़ा जाता है. इसके बाद उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है. इस तकनीक में बड़े फनल यानी कीम के आकार की घेराबंदी बनाई जाती है, जिसे पर्दों और पेड़-पौधों से ढंक दिया जाता है. इसके बाद वन्यजीवों को धीरे-धीरे इस घेरे की तरफ लाया जाता है, जहां पर रैंप के जरिए ट्रक में पहुंचाए जाते हैं.

(रिपोर्टः अनिमेष सिंह, उज्जैन)
 

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Manish Kushawah

Manish Kushawah

मनीष कुशवाह डिजिटल पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी और डिजिटल मीडिया में 5 वर्षों से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News (MP-CG) की डिजिटल टीम में सब-एडिटर के रूप में काम कर रहे हैं. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की राजनीति, क्राइम, कृषि व्यवस्था और ग्रामीण (हाइपरलोकल) सरोकारों से जुड़ी खबरों की गहराई से कवरेज करना उनकी एक्सपर्टीज है.नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन (NIMC) से पत्रकारिता में डिप्लोमा पूरा करने के बाद मनीष ने मीडिया जगत में अपना सफर शुरू किया. ज़ी न्यूज़ से पहले उन्होंने News18 Hindi (Local18), इंडिया न्यूज़ और जनता टीवी जैसे प्रमुख समाचार चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में काम किया है. इस दौरान उन्होंने न्यूज़ प्लानिंग, कंटेंट आइडिएशन और डेस्क मैनेजमेंट की अहम जिम्मेदारियां संभाली हैं. वे खबरों की प्रामाणिकता और ग्राउंड रियलिटी को प्राथमिकता देते हैं, ताकि पाठकों तक सटीक और भरोसेमंद जानकारी पहुंचे.मनीष कुशवाह से आप Manish2.Kumar@india.com पर ईमेल के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा, एक्स (ट्विटर) और फेसबुक के जरिए भी उनसे सीधा संवाद कर सकते हैं.
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