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जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) इस समय एक अभूतपूर्व राजनीतिक संकट से जूझ रही है. पार्टी के इतिहास में यह पहली बार है जब उसे अपने ही भीतर से खुले और संगठित विद्रोह का सामना करना पड़ रहा है. कैबिनेट के विवादित विस्तार के बाद शुरू हुई यह असंतोष की चिंगारी अब एक बड़े टकराव में बदल गई है: एक तरफ बागी गुट है, तो दूसरी तरफ उमर अब्दुल्ला का खेमा. नाराज विधायकों की बंद कमरों में बैठकें, सार्वजनिक इस्तीफे और खुलकर सामने आ रहा असंतोष—इन सबने पार्टी नेतृत्व को अब तक की सबसे कमजोर स्थिति में ला खड़ा किया है.
जैसे-जैसे यह दरार गहरी होती जा रही है, पार्टी की आखिरी उम्मीद अब अनुभवी अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला पर टिकी है. वे इस विद्रोह को शांत करने के लिए खुद कश्मीर में मध्यस्थता की बातचीत करेंगे. इस तूफान के बीच डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने एकता का संदेश दिया है. उन्होंने आंतरिक मतभेदों को पार्टी का मनोबल तोड़ने नहीं दिया और एक कड़ा सार्वजनिक बयान जारी किया.
उन्होंने पार्टी की मजबूती को दोहराते हुए कहा, 'नेशनल कॉन्फ्रेंस एक एकजुट और मजबूत दीवार की तरह खड़ी है. अपने लंबे राजनीतिक इतिहास में इसने अनगिनत तूफानों का सामना किया है, कठिन परीक्षाओं से गुजरी है और कई चुनौतियों पर जीत हासिल की है. नेशनल कॉन्फ्रेंस की असली ताकत जनता के साथ उसका अटूट बंधन, जन-हितैषी नीतियां और संवैधानिक, लोकतांत्रिक तथा मौलिक अधिकारों के लिए किया गया उसका ऐतिहासिक संघर्ष है.' हालांकि, वरिष्ठ अब्दुल्ला के एकता के इस मजबूत संदेश के बावजूद, राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि बागी विधायकों और मुख्यमंत्री के नेतृत्व के बीच की खाई अभी भी बहुत गहरी है.
इस आंतरिक कलह की मुख्य वजह मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा हाल ही में किया गया कैबिनेट विस्तार है. कुछ चुनिंदा विधायकों को मंत्री बनाने और लंबे समय से पार्टी से जुड़े अनुभवी नेताओं को बाहर रखने के फैसले के कारण कई क्षेत्रों में तीखी प्रतिक्रिया हुई. इससे पार्टी के भीतर लंबे समय से पनप रहा वह गुस्सा सामने आ गया, जो फैसलों के केंद्रीकरण और पक्षपात के आरोपों को लेकर था.
बागी गुट एक एकजुट समूह के रूप में काम कर रहा है. बागी विधायकों का दावा है कि उन्हें 18 से 25 विधायकों का समर्थन हासिल है. हाल ही में हुई बैठकों में, जहां लगभग 18 विधायक व्यक्तिगत रूप से मौजूद थे और बाकी लोग ऑनलाइन जुड़े थे, इस समूह ने संरचनात्मक सुधार, कैडर में समानता और शासन-प्रशासन में अधिक परामर्श की मांग को लेकर एकजुट रहने का संकल्प लिया. मुख्यमंत्री के वफादारों और कैबिनेट सहयोगियों का कहना है कि मंत्रियों का चयन प्रशासनिक योग्यता, क्षेत्रीय संतुलन और रणनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर किया गया है. सरकार के अस्तित्व पर संकट की बातों को खारिज करते हुए, मुख्यमंत्री के करीबी लोगों का मानना है कि बातचीत शुरू होने पर आंतरिक चर्चा के जरिए सभी शिकायतों का समाधान हो जाएगा.
श्रीनगर के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी के सार्वजनिक इस्तीफे के बाद यह दरार और गहरी हो गई है. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर सीधा हमला करते हुए अपना पद छोड़ने वाले रुहुल्लाह ने उन्हें चुनौती दी कि वे अपना बोरिया-बिस्तर समेटें और इंग्लैंड की नागरिकता ले लें, क्योंकि वे उन्हें राज्य की राजनीति से बाहर कर देंगे. कैबिनेट में जगह पाने की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से परे, यह विवाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर एक गहरे वैचारिक मतभेद को दर्शाता है. एक तरफ पुराने अनुभवी नेता हैं, तो दूसरी तरफ आधुनिक प्रबंधन शैली वाली नई लीडरशिप.
इस आंतरिक कलह की भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ रही है. दो साल पहले ही बीजेपी-विरोधी लहर के दम पर भारी जनादेश पाने वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस को अब पूरे कश्मीर में जनता के भारी विरोध और ऑनलाइन ट्रोलिंग का सामना करना पड़ रहा है. मतदाता पार्टी नेतृत्व पर आरोप लगा रहे हैं कि वे शासन चलाने के अपने वादों के बजाय, सत्ता के लिए आपस में ही लड़ रहे हैं.
अब सबकी निगाहें पार्टी अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला पर टिकी हैं. बढ़ती उम्र के कारण चुनावी राजनीति और सरकार की सक्रिय भूमिकाओं से दूर होने के बावजूद, वरिष्ठ अब्दुल्ला आज भी नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए एक ऐसे भावनात्मक आधार और रणनीतिक मार्गदर्शक हैं, जिनकी बात को कोई चुनौती नहीं दे सकता. 1984 में सरकार गिरने के संकट से लेकर 1990 के दशक में आतंकवाद के चरम दौर तक-जब नेशनल कॉन्फ्रेंस के हजारों कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया था. पार्टी को इन सबसे सुरक्षित बाहर निकालने वाले फारूक अब्दुल्ला का कश्मीर आना, पार्टी के वफादारों और असंतुष्टों, दोनों के लिए एक आखिरी उम्मीद की तरह है. उन्हें लगता है कि वे ही पार्टी को पूरी तरह टूटने से बचा सकते हैं.
इस ऐतिहासिक विरासत की वजह से, असंतुष्ट विधायक हों या मुख्यमंत्री के वफादार सभी डॉ. फारूक अब्दुल्ला को ही एकमात्र ऐसा नेता मानते हैं, जिनकी बात को पार्टी के हर स्तर पर एक पक्के आदेश के रूप में माना जाता है. जैसे ही डॉ. फारूक अब्दुल्ला श्रीनगर पहुंचेंगे, नाराज विधायक और पार्टी नेता उनके साथ अहम बैठकें करने की तैयारी कर रहे हैं. अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि उनका अंतिम रुख क्या होगा.
पार्टी के भीतर उनके पूर्ण प्रभाव को रेखांकित करते हुए, नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'इस पार्टी के लिए आखिरी उम्मीद जनाब फारूक साहब हैं. उनकी बात को पार्टी के सबसे छोटे कार्यकर्ता से लेकर सबसे बड़े पदाधिकारी तक, एक आदेश की तरह माना जाता है. इसलिए, जब वे बैठक करेंगे, तो चीजें साफ हो जाएंगी.' क्या उनका कद, राजनीतिक सूझबूझ और पार्टी को एक 'मजबूत दीवार' की तरह एकजुट रखने का उनका जोर, इस गहरी दरार को पाटने के लिए काफी होगा-यह इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या उमर अब्दुल्ला की सरकार अपनी नींव को मजबूत और स्थिर कर पाती है या नहीं.