)
हरियाणा के रेवाड़ी जिले के सरकारी स्कूलों से एक बेहद चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है. शिक्षा विभाग द्वारा करवाई गई जांच में जिले के 90 सरकारी स्कूलों में पीने के पानी के सैंपल फेल पाए गए हैं. कहीं पानी में जानलेवा बैक्टीरिया मिला है तो कहीं टीडीएस का स्तर मानकों से कई गुना ज्यादा निकला है. सवाल यह है कि स्वच्छ भारत और 'हर घर जल' का दावा करने वाले सिस्टम में आखिर मासूम बच्चों के हलक तक साफ पानी क्यों नहीं पहुंच पा रहा?
अगस्त और सितंबर महीने में शिक्षा विभाग की ओर से जिले के सभी 628 सरकारी स्कूलों में पीने के पानी की गुणवत्ता की जांच कराई गई थी. जब जांच रिपोर्ट सामने आई तो विभाग में हड़कंप मच गया. 628 में से 90 स्कूलों का पानी तय मानकों पर खरा नहीं उतरा. सबसे बदतर हालात बावल, रेवाड़ी और नाहड़ ब्लॉक के स्कूलों में देखने को मिले हैं. कई स्कूलों में बच्चे आज भी सीधे बोरवेल और हैंडपंप का भारी और दूषित पानी पीने के लिए मजबूर हैं. रिपोर्ट आने के बाद विभाग ने आनन-फानन में दोबारा सैंपल लेने के निर्देश तो जारी कर दिए, लेकिन सवाल यह है कि रिपोर्ट आने तक बच्चे जो जहरीला पानी पीते रहे, उसका जिम्मेदार कौन है?
बच्चे बोले स्कूल में पीने के पानी की कोई अच्छी व्यवस्था नहीं है. टंकियों में गर्म और मटमैला पानी आता है, जिसे पीकर अक्सर पेट खराब हो जाता है. वहीं कुछ बच्चों ने कहा कि उनके स्कूल में व्यवस्था ठीक है और सफाई समय पर होती है. वहीं अभिभावकों का कहना है कि बच्चों की सेहत के साथ सरेआम खिलवाड़ हो रहा है. स्कूल के प्रिंसिपल और शिक्षक तो मयूर जग और फिल्टर का सप्लाई पानी पीते हैं, लेकिन बच्चों को हैंडपंप और पुरानी सीमेंट टंकियों का पानी पिलाया जा रहा है. अगर स्टाफ वही पानी पिए, तब उन्हें टीडीएस का असली असर समझ आएगा. प्रशासन सीमेंट की टंकियां बदलवाए और हर स्कूल में फिल्टर वाटर सुनिश्चित करने के लिए कमेटी बनाए. पूर्व मंत्री जेपी दलाल ने कहा की प्रधानमंत्री जी का स्पष्ट संकल्प है कि हर नागरिक और बच्चे को स्वच्छ पेयजल मिले. स्कूलों में पानी की जांच में अगर किसी भी स्तर पर लापरवाही या कोताही बरती गई है, तो सरकार संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई करेगी.
मामले के तूल पकड़ने के बाद विभागीय अधिकारी अब री-सैंपलिंग का हवाला देकर पल्ला झाड़ते नजर आ रहे हैं. उनका कहना है कि दोबारा जांच के बाद ही स्थिति पूरी तरह साफ हो पाएगी. लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जब तक फाइलों में जांच और दोबारा जांच का खेल चलता रहेगा, तब तक मासूम बच्चे उसी दूषित पानी को पीने को मजबूर रहेंगे. अभिभावक अब सीधे तौर पर प्रशासन से मांग कर रहे हैं कि स्कूलों की पुरानी सीमेंट टंकियों को तुरंत बदला जाए और नियमित निगरानी के लिए एक स्वतंत्र कमेटी गठित हो.
शिक्षा के मंदिर में अगर बच्चों को बुनियादी जरूरत यानी साफ पीने का पानी भी नसीब न हो, तो यह पूरे प्रशासनिक अमले पर एक बड़ा सवालिया निशान है. अब देखना यह होगा कि शिक्षा विभाग की यह री-सैंपलिंग महज खानापूर्ति साबित होती है या फिर जिम्मेदार लोगों पर कोई ठोस कार्रवाई होगी, ताकि इन 90 स्कूलों के बच्चों को साफ और सुरक्षित पानी मिल सके.
(नवीन की रिपोर्ट)