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साइबर ठगी के नए और डरावने तरीके यानी 'डिजिटल अरेस्ट' के मामलों को लेकर देश की सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस तरह के अपराधों में केवल ठग ही नहीं, बल्कि बैंक और तकनीकी कंपनियां भी जिम्मेदार हैं. सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि यदि वित्तीय संस्थानों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की तरफ से थोड़ी और सतर्कता बरती जाए, तो इस तरह के घोटालों पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है.
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए. कोर्ट ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी के मामलों में बैंक कर्मचारियों की भूमिका और उनकी निष्क्रियता भी एक बड़ा कारण है. कई बार पीड़ित के खाते से अचानक बड़ी रकम निकल जाती है, लेकिन बैंक स्तर पर समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता. कोर्ट ने सुझाव दिया है कि ऐसी मजबूत व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, जिससे पीड़ित व्यक्ति को राहत मिल सके. यदि किसी बैंक या वित्तीय संस्थान की जरूरी जांच-पड़ताल में लापरवाही सामने आती है, तो बैंक को पीड़ित को ठगी गई पूरी रकम का मुआवजा देना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख को देखते हुए अटॉर्नी जनरल ने भी अदालत को भरोसा दिलाया है कि डिजिटल अरेस्ट के मामलों में यदि किसी बैंक कर्मचारी की लापरवाही पाई जाती है, तो उसकी सीधी जवाबदेही तय की जाएगी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी. कोर्ट चाहती है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए और प्रस्तावित नियमों में इसे अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए ताकि बैंक अपनी जिम्मेदारी से पीछे न हट सकें.
डिजिटल अरेस्ट के ज्यादातर मामलों में एक बात कॉमन रही है-'वॉट्सऐप का दुरुपयोग'. कोर्ट ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि ठग आमतौर पर वॉट्सऐप कॉल या मैसेज के जरिए लोगों को अपना शिकार बनाते हैं. इसे ध्यान में रखते हुए अदालत ने कहा कि सिर्फ बैंक ही नहीं, बल्कि वॉट्सऐप जैसी कंपनियों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए. वॉट्सऐप के लिए ऐसी तकनीक या फीचर्स लाना जरूरी है जो अनजान नंबरों से आने वाली संदिग्ध कॉल पर यूजर्स को पहले ही चेतावनी दे सकें. साथ ही, किसी भी तरह की जोखिम भरी या संदिग्ध गतिविधि के प्रति लोगों को समय रहते आगाह करने की पुख्ता व्यवस्था भी बनाई जानी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट की यह सख्ती साइबर ठगी के खिलाफ लड़ाई में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है. जहां एक तरफ कोर्ट बैंकों और टेक कंपनियों को जवाबदेह बना रहा है, वहीं दूसरी तरफ आम नागरिकों के लिए भी यह समझना बेहद जरूरी है कि कोई भी सरकारी एजेंसी (जैसे पुलिस, सीबीआई, ईडी या कस्टम विभाग) वॉट्सऐप कॉल या वीडियो कॉल पर किसी को 'डिजिटल अरेस्ट' नहीं करती है.
यदि आपके पास भी ऐसा कोई धमकाने वाला या डराने वाला कॉल आता है, तो घबराएं नहीं. तुरंत सतर्क रहें, अपनी कोई भी निजी या बैंक से जुड़ी जानकारी साझा न करें और बिना देर किए साइबर क्राइम हेल्पलाइन (1930) पर इसकी शिकायत दर्ज कराएं.