साल 2015 से पहले जब भी तेलुगु सिनेमा की बात होती थी, तो हिंदी बेल्ट या बाकी राज्यों के लोग इसे सिर्फ टीवी पर डब की गई एक्शन फिल्मों के तौर पर ही देखते थे. दोपहर के वक्त टीवी चालू करो और कोई न कोई तेलुगु हीरो हवा में गाड़ियां उड़ाता हुआ दिख ही जाता था. लोग तेलुगु सिनेमा की फिल्मों को एंटरटेनमेंट के तौर पर तो देखते थे, लेकिन कोई इसे भारतीय सिनेमा का चेहरा नहीं मानता था. फिर अचानक एक दिन इतिहास बदला. साल 2015 में एसएस राजामौली के डायरेक्शन में बनी ‘बाहुबली: द बिगिनिंग’ रिलीज हुई और उसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया.
फिल्म ने साबित कर दिया कि साउथ इंडिया का सिनेमा सिर्फ लोकल ऑडियंस के लिए नहीं है, बल्कि ये पूरे देश और दुनिया के बॉक्स ऑफिस पर राज कर सकता है. ‘बाहुबली’ के बाद तो जैसे एक नया दरवाजा ही खुल गया और साउथ सिनेमा के एक नए दौर की शुरुआत हुई. इसके बाद ‘बाहुबली 2’, ‘RRR’, ‘पुष्पा: द राइज’, ‘हनुमान’ और ‘कल्कि 2898 एडी’ जैसी फिल्मों ने तेलुगु सिनेमा को वो पहचान और रुतबा दिया, जिसकी कल्पना शायद कभी किसी ने नहीं की थी. टॉलीवुड देखते ही देखते भारतीय फिल्म इंडस्ट्री का सबसे बड़ा और सबसे ताकतवर सेंटर बन गया.

जैसा कि सभी जानते हैं कि हर एक सिक्के के दो पहलू होते हैं और तेलुगु सिनेमा के लिए सिक्के का दूसरा पहलू बहुत कड़वा निकला. जिस इंडस्ट्री ने पूरे देश को बताया कि उसके कंटेंट और सोच में कितना दम है, वही इंडस्ट्री अचानक अपने ही घर में संघर्ष करने लगी. हालात ऐसे हो गए कि वो अपनी ही लोकल ऑडियंस को टीवी स्क्रीन और मोबाइल से खींचकर सिनेमाघरों तक लाने के लिए तरसने लगी. आज तेलुगु सिनेमा का सबसे अजीब और उलझा हुआ सफर बन चुका है, जो इंडस्ट्री कल तक हर शुक्रवार को नए भरोसे के साथ मैदान में उतरती थी, वो आज अपने ही बनाए बड़े बजट और भव्यता के जाल में फंसती नजर आ रही है.
इस पूरे संकट में पहली और सबसे बड़ी दिक्कत कभी भी डायरेक्टर्स या प्रोड्यूसर्स की सोच नहीं थी. असल परेशानी ये थी कि इंडस्ट्री ने जितनी तेजी से अपने सपनों को बड़ा किया, उस रफ्तार से अपने काम करने के तरीकों और तकनीकी ढांचे को नहीं सुधारा. ये बिल्कुल वैसा ही था जैसे कोई शहर आबादी के मामले में तो चार गुना बढ़ जाए, लेकिन वहां की सड़कें, पानी के आने-जाने और बिजली का ढांचा पुराना ही रहे.
हाल ही में रिलीज हुई तेलुगु फिल्म ‘एपिक: फर्स्ट सेमेस्टर’ के प्री-रिलीज इवेंट में विजय देवरकोंडा ने इस मुद्दे को बहुत बेबाकी से सबके सामने रखा. उन्होंने इंडस्ट्री के मौजूदा दौर को ‘ऑपरेशन टीएफआई’ (तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री) का नाम दिया. विजय देवरकोंडा ने सीधे शब्दों में कहा कि डायरेक्टर्स अब बहुत बड़ी कहानियां सोच रहे हैं.
प्रोड्यूसर्स उन पर खुलकर पैसे लगा रहे हैं और एक्टर्स भी अपनी पूरी जान झोंक रहे हैं, लेकिन उन्होंने असली मर्ज पर उंगली रखते हुए साफ कहा, ‘सिनेमा हमारे एम्बिशियंस के साथ बहुत आगे निकल चुका है, लेकिन हम अपनी तकनीकी टीमों, बुनियादी ढांचे और काम करने की क्षमता में बहुत पीछे छूट गए हैं’.

देवरकोंडा का ये बयान असल में पूरी तेलुगु इंडस्ट्री के दर्द का सबसे सटीक आईना है, जिसका सीधा मतलब ये निकलता है कि टॉलीवुड सपने बहुत बड़े देख रहा है, इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन उसका प्रोडक्शन सिस्टम उस तेजी से तैयार नहीं हो पाया है, जो आज के समय में कई भाषाओं में एक साथ रिलीज होने वाली और भारी-भरकम VFX वाली फिल्मों के लिए जरूरी होता है.
अगर आप पिछले दो-तीन सालों के तेलुगु फिल्म कैलेंडर को उठाकर देखें, तो आपको ये बात खुद-ब-खुद समझ आ जाएगी कि जो अपनी तय तारीख पर बिना किसी देरी या बिना किसी ड्रामे के रिलीज हुई हो. सिनेमाघरों में टिकट खरीदकर पॉपकॉर्न खाने वाली आम ऑडियंस से पूछिए, वो भी बता देगा कि हर बड़ी फिल्म की रिलीज डेट अब एक मजाक बनकर रह गई है.
‘देवरा: पार्ट 1’, ‘पुष्पा 2: द रूल’, ‘गेम चेंजर’, ‘विश्वंभरा’, ‘दे कॉल हिम ओजी’, ‘द राजा साब’, ‘द पैराडाइज’, ‘ड्रैगन’ और ‘स्वयंभू’ इन सभी फिल्मों की रिलीज डेट बार-बार टली और नए पोस्टर जारी करने पड़े. साउथ सुपरस्टार नानी की फिल्म ‘द पैराडाइज’ का किस्सा इस पूरी सच्चाई को साफ बयां करता है. खुद नानी ने माना कि फिल्म बनने में उम्मीद से कहीं ज्यादा वक्त लग गया.
अपने एक इंटरव्यू में नानी ने खुलकर कहा कि कुछ हालात ऐसे बने जो हमारे हाथ में नहीं थे, लेकिन साथ ही उन्होंने ये भी माना, ‘मुझे लगता है कि हम टाइम मैनेजमेंट में मात खा गए’. भारी भरकम बजट, VFX का फैला हुआ काम और लचर प्लानिंग यही वो तीन वजहें हैं, जो हर फिल्म को लेट कर रही हैं. जब भी किसी फिल्म की रिलीज टलती है, तो वो सिर्फ पोस्टर पर तारीख बदलना भर नहीं होता.
तारीख आगे बढ़ने का मतलब होता है हर दिन ब्याज का बढ़ना, बजट का कई गुना बढ़ जाना और प्रोड्यूसर पर लगातार दबाव का बढ़ता जाना. ऐसे में कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि इंडस्ट्री बड़ी-बड़ी फिल्मों का ऐलान करने में तो माहिर हो चुकी है, लेकिन उन्हें वक्त पर खत्म कैसे किया जाए, ये फॉर्मूला वो अब भी सीख रही है.
अपने एक इंटरव्यू में जाने-माने प्रोड्यूसर सुधाकर चेरुकुरी ने इस पर बेहद सादगी से तंज सकते हुए कहा, ‘मुझे अब इसकी आदत हो गई है. मैं अब ये सारा दबाव झेलने का आदी हो चुका हूं’. एक्टर्स कमियों के लिए टेक्निकल फ्रेमवर्क की तरफ इशारा करते हैं, तो वहीं प्रोड्यूसर्स काम में होने वाली देरी को कोसते हैं. हकीकत ये है कि हर कोई एक ही भंवर में फंसा हुआ है.
जैसे-जैसे तेलुगु सिनेमा पूरे देश में मशहूर हुआ, वैसे-वैसे अपनी ही लोकल ऑडियंस से उसका नाता थोड़ा कमजोर होता गया. हर फिल्ममेकर बस इसी होड़ में लग गया कि फिल्म बाकी राज्यों में कैसे हिट कराई जाए. इसका नतीजा ये हुआ कि फिल्मों में दिखावा और तड़क-भड़क तो बढ़ गया, लेकिन उनका असली एहसास कहीं खो गया.
मेकर्स ने स्क्रीन को चमकाने के लिए भारी-भरकम सेट्स, फिक्शनल दुनिया, खूंखार विलेन और हद से ज्यादा एक्शन तो भर दिया, मगर इस चक्कर में वो दिल को छू लेने वाली कहानियां पीछे छूट गईं, जो ऑडियंस को अट्रैक्ट करती थीं. एक आम तेलुगु परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी सीधी-सादी फिल्में ढूंढना बहुत मुश्किल हो गया.
इसी बीच लोगों को एक नया और बेहद सस्ता रास्ता मिल गया अब फिल्म के ओटीटी पर रिलीज होने का इंतजार करना. ये सच है कि सिर्फ पैन इंडिया के पागलपन ने लोगों को थिएटर्स से दूर नहीं किया. COVID 19 ने लोगों को घर बैठकर फिल्में देखने की आदत डाल दी. इसके बाद थिएटर्स में टिकटों के दाम आसमान छूने लगे, खाने-पीने का सामान महंगा हो गया. अब दर्शक बहुत सोच-समझकर फैसला करने लगे कि कौन सी फिल्म देखने के लिए वे थिएटर जाएं.

जब हर फिल्म अपने आप को ‘बाहुबली’ साबित करने में लग गई, तो ज्यादातर फिल्में एवरेज साबित होने लगीं. ऐसे में ऑडियंस ने थिएटर्स की बजाय चार हफ्ते बाद घर पर ही रिमोट दबाना ज्यादा बेहतर समझा. यही वजह है कि इंडस्ट्री का मिडल-टियर यानी मिडल बजट का सिनेमा तेजी से सिमटने लगा. तेलुगु सिनेमा को ‘पुष्पा’ और ‘कल्कि’ जैसी फिल्मों की जरूरत जरूर है, लेकिन उसे ऐसी फिल्मों की भी जरूरत है, जो 300 करोड़ की न हों और जिन्हें बनने में तीन-चार साल न लगें.
अगर हर कोई सिर्फ 2 हजार करोड़ का सपना देखेगा, तो वो बीच का स्पेस पूरी तरह से खत्म हो जाएगा. साथ ही तेलुगु सिनेमा में इन दिनों एक बहुत खतरनाक और अजीब बीमारी देखने को मिल रही है, जिसे ‘लास्ट मिनट कल्चर’ कहा जा सकता है. मार्केट तय है, बड़े-बड़े स्टार्स फाइनल हैं, पैसों की भी कोई कमी नहीं है, लेकिन इसके बावजूद घड़ी की सुई हमेशा जीत जाती है.
फिल्मों की शूटिंग उस वक्त भी चलती रहती है, जब फिल्म की रिलीज में सिर्फ 15-20 दिन बचे होते हैं. आखिरी हफ्ते में आकर अचानक कह दिया जाता है कि पोस्ट-प्रोडक्शन पूरा नहीं हुआ, इसलिए फिल्म पोस्टपोन की जा रही है. नानी की फिल्म ‘द पैराडाइज’ इसका सबसे ताजा उदाहरण बनकर सामने आई.
अपने इंटरव्यू में नानी ने इस बारे में बात करते हुए कहा कि इस फिल्म का कोई बड़ा ट्रेलर रिलीज नहीं किया जाएगा. वजह ये थी कि आखिरी वक्त में भी कई अलग-अलग टीमें फुटेज पर काम कर रही थीं और समय बिल्कुल नहीं बचा था. कुछ ऐसा ही नजारा तब देखने को मिला जब प्रोड्यूसर नागा वामसी ने ‘एपिक: फर्स्ट सेमेस्टर’ के प्री-रिलीज इवेंट में मंच से ये कह दिया कि फिल्म के हीरो और डायरेक्टर ने आखिरी पलों तक विदेशी रिलीज के लिए फिल्म की जरूरी डिजिटल कॉपी तैयार करके नहीं दी.
जब काम इस तरह हड़बड़ी में होगा, तो उसका असर फिल्म की क्वालिटी पर पड़ना तय है. हालांकि, वक्त के साथ इंडस्ट्री को अपनी कमियां दिखाई दे रही हैं और ये कहना अभी जल्दबाजी होगी कि तेलुगु सिनेमा ने अपनी सारी गलतियां सुधार ली हैं या सब कुछ ठीक हो चुका है, क्योंकि कुछ समय पहले प्रभास की आने वाली पीरियड फिल्म ‘फौजी’ के साथ ऐसा ही कुछ देखने को मिला, जिसे हनु राघवपुडी बना रहे हैं.
इसकी रिलीज भी लंबे समय से चल रहे प्रोडक्शन के चलते आगे खिसक गई है, लेकिन एक बहुत बड़ा बदलाव भी देखने को मिला. पहले जहां इंडस्ट्री अपनी कमियों पर पर्दा डालती थी, वहीं अब बड़े-बड़े स्टार्स और मेकर्स मंच से अपनी नाकामी कबूल कर रहे हैं.

अब सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या हर साउथ फिल्म का पैन इंडिया होना जरूरी है? शायद इस पूरे मामले पर सबसे समझदारी भरी बात नानी ने कही. अपनी फिल्म ‘द पैराडाइज’ को लेकर उन्होंने साफ तौर पर कहा, ‘हम इसे पैन इंडिया फिल्म नहीं कहना चाहते. ये शब्द अब बहुत घिस चुका है. हम तेलुगु के साथ इसे बाकी भाषाओं में रिलीज कर रहे हैं, लेकिन तेलुगु ऑडियंस ही हमारा पहली और सबसे बड़ी टारगेट हैं’.
नानी का ये बयान असल में पूरी इंडस्ट्री को कान खोलकर सुननी चाहिए. तेलुगु सिनेमा पहले ही खुद को पूरी दुनिया में साबित कर चुका है. अब उसे खुद पर ध्यान देना चाहिए. इंडस्ट्री को समझना चाहिए कि हर छोटी-बड़ी फिल्म को जबरन ‘पैन इंडिया’ का ठप्पा लगाकर बेचने की कोई जरूरत नहीं है. अगर कोई फिल्म अपनी पूरी आत्मा से तेलुगु है, अपने घर की ऑडियंस को पसंद आ रही है, तो वो अपने आप ही बाकी भाषाओं की ऑडियंस को भी पसंद आएगी.
इसके लिए अलग कुछ जोड़ने-तोड़ने की जरूरत ही नहीं है. तेलुगु सिनेमा को अपने सपनों को छोटा करने की कोई जरूरत नहीं है. उसे बस उन सपनों को सच करने वाली मशीनों, तकनीकों और तौर-तरीकों को मजबूत करना होगा. ‘पैन इंडिया’ के दौर ने इंडस्ट्री को ये सिखाया कि उसकी फिल्में कितनी दूर तक जा सकती हैं.