एक गाना, कई मालिक और करोड़ों का कारोबार: आखिर फिल्मों में कैसे खरीदे जाते हैं Music Rights और क्यों छिड़ता है Copyright का विवाद?
Music Copyright In Bollywood: फिल्म या ट्रेलर में बजने वाला चंद सेकंड का म्यूजिक सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, बल्कि भारी-भरकम कानूनी पचड़ा भी बन सकता है. हाल ही में सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की फिल्म ‘द वन’ और पकंज त्रिपाठी की ‘द मिर्जापुर मूवी’ में गानों के इस्तेमाल पर उठे बवंडर ने साफ कर दिया कि पर्दे पर गाने का चेहरा होना और उसके राइट्स का असली मालिक होना दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं.
किसी भी बड़ी फिल्म या उसके ट्रेलर में जब कोई बैकग्राउंड म्यूजिक बजता है, तो आम लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं. सिनेमाहॉल में बैठी ऑडियंस सीटी बजाने लगती है या फिर यूट्यूब पर बार-बार उस चंद मिनच या सेकंड की धुन को रीप्ले करके सुना जाता है. आम आदमी की नजर में ये महज 20 या 30 सेकंड का एंटरटेनमेंट होता है, लेकिन फिल्मी पर्दे के पीछे काम करने वाले फिल्ममेकर, म्यूजिक सुपरवाइजर और वकीलों की फौज के लिए ये छोटा सा हिस्सा कागजी समझौतों, कॉपीराइट कानूनों और लाइसेंस की एक बेहद लंबी और उलझी हुई चेन होती है.
अगर ये कानूनी चेन किसी एक जगह से भी जरा सी ढीली पड़ जाए या टूट जाए, तो महज कुछ सेकंड का म्यूजिक करोड़ों के बजट वाली पूरी फिल्म को कानूनी पचड़े और बदनामी के चौराहे पर लाकर खड़ा कर देता है. हाल के दिनों में बॉलीवुड के गलियारों से इसकी दो बड़ी मिसालें देखने को मिली. एक तरफ सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की आने वाली एडवेंचर फिल्म ‘द वन’ के टीजर-ट्रेलर में इस्तेमाल हुए ‘अयि गिरिनन्दिनि नंदिनी मेधनी’ ट्रैक को लेकर बड़ा बखेड़ा खड़ा हुआ. वहीं, दूसरा बखेड़ा ‘द मिर्जापुर मूवी’ के टीजर में 'शूरवीर' गाने को लेकर हुआ.
इन विवादों ने खड़े किए कई बड़े सवाल
इस गाने के सिंगर और कंपोजर रपेरिया बालम ने खुलेआम सोशल मीडिया पर ‘द मिर्जापुर मूवी’ के मेकर्स के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. इन दोनों ही मामलों ने फिल्म और म्यूजिक इंडस्ट्री के पुराने, लेकिन बेहद पेचीदा सवालों को फिर चर्चा में ला दिया. आखिर किसी बने-बनाए गाने का असली मालिक कौन होता है? क्या जिसने गाना गाया या धुन बनाई, वही उसका सर्वेसर्वा है? सबसे बड़ा सवाल ये कि किसी फिल्म या विज्ञापन में उस गाने को यूज करने से पहले कानूनी तौर पर किसकी चौखट पर जाकर इजाजत मांगनी पड़ती है? चलिए इन सवालों के जवाब जानते हैं.
The Vvaan में क्या हुआ था और कैसे सुलझा मामला?
पूरे विवाद की शुरुआत 20 सितंबर 2026 को हुई थी. संगीतकार और वोकलिस्ट सरगम वैश ने सार्वजनिक तौर पर एक गंभीर आरोप लगाया. उनका कहना था कि ‘द वन’ के ऑफिशियल ट्रेलर में उनकी बनाई और गाई गई ‘अयि गिरिनन्दिनि नंदिनी मेधनी’ की रिकॉर्डिंग बिना उनकी किसी परमिशन के इस्तेमाल कर ली गई है.
यहां ध्यान देने वाली सबसे जरूरी बात ये थी कि सरगम वैश की आपत्ति किसी धुन की कॉपी या लिरिक्स से मिलती-जुलती लाइन को लेकर नहीं थी. उपलब्ध रिपोर्ट्स और बयानों के मुताबिक, उनका सीधा दावा था कि ट्रेलर में लगभग 25 सेकंड तक उन्हीं का ओरिजिनल मास्टर ऑडियो, उनका साउंड प्रोडक्शन और उनके खुद के वोकल्स हूबहू इस्तेमाल किए गए हैं.
सरगम वैश ने निर्माताओं के सामने दो टूक बात रखी. उन्होंने कहा कि या तो इस ऑडियो को फौरन ट्रेलर से हटाया जाए, या फिर मेकर्स ये साफ करें कि उन्होंने किस लीगल आधार पर इस ट्रैक का लाइसेंस लिया है. उन्होंने ये भी पब्लिक किया कि ये खास रिकॉर्डिंग पहले से ही एक बड़े और प्रतिष्ठित म्यूजिक लेबल के साथ उनके ऑफिशियल करार का हिस्सा थी.
हालांकि, इंटरनेट पर शुरू हुई ये तनातनी बहुत लंबी नहीं खिंची. 22 सितंबर की मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिल्म की निर्माता कंपनी ‘बालाजी मोशन पिक्चर्स’ की लीगल टीम ने तुरंत हरकत में आते हुए खुद सरगम वैश से सीधा संपर्क किया. दोनों पक्षों के बीच बातचीत हुई और निर्माताओं ने जरूरी ‘सिंक राइट्स’ हासिल कर लिए. इसके बाद ये मामला पूरी तरह सुलझा हुआ ऐलान कर दिया गया.
इस पूरे घटनाक्रम को अगर कानूनी नजरिए से देखें, तो इसे सिरे से चोरी का ठप्पा लगाना बिल्कुल सही नहीं होगा. जमीनी हकीकत ये थी कि कलाकार ने पहले अनऑथराइज्ड इस्तेमाल का दावा किया, मेकर्स ने अपनी कानूनी टीम के जरिए जरूरी अधिकार और अनुमतियां पूरी कीं और आखिरकार मामला बिना किसी लंबी अदालती जंग के आपसी सहमति से निपट गया.
‘सिंक राइट्स’ आखिर किस चिड़िया का नाम है?
इस पूरे मामले में जिस शब्द की सबसे ज्यादा चर्चा हुई, वो है ‘सिंक राइट्स’ यानी सिंक्रोनाइजेशन राइट्स. सीधी और आसान भाषा में कहें तो जब भी किसी पहले से रिकॉर्ड म्यूजिक या गाने को किसी विजुअल यानी वीडियो, फिल्म, सीरीज, विज्ञापन या प्रमोशनल ट्रेलर के साथ जोड़ा या मिलाया जाता है, तो कानूनन उसे ‘सिंक्रोनाइजेशन’ कहा जाता है.
वीडियो और ऑडियो के इस तालमेल के लिए जो कानूनी परमिशन ली जाती है, वही सिंक लाइसेंस कहलाती है. अब यहां पेच ये फंसता है कि आपको कौन सा लाइसेंस लेना होगा? ये पूरी तरह इस बात पर तय होता है कि आप कर क्या रहे हैं? क्या आप किसी कलाकार की पहले से तैयार मूल साउंड रिकॉर्डिंग इस्तेमाल कर रहे हैं?
या फिर आप सिर्फ उसकी धुन और शब्दों का इस्तेमाल करके अपनी नई रिकॉर्डिंग तैयार करवा रहे हैं? भारतीय कॉपीराइट कानून में ‘म्यूजिकल वर्क’ यानी धुन, ‘लिरिकल वर्क’ यानी शब्द और ‘साउंड रिकॉर्डिंग’ यानी स्टूडियो में तैयार फाइनल ऑडियो को तीन अलग-अलग कैटेगरीज में बांटा गया है. तीनों के अधिकार और उनके मालिक अलग हो सकते हैं.
Mirzapur मूवी पर भी हुआ विवाद, लेकिन निकली अलग कहानी
सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की ‘द वन’ के मामले से पहले पकंज त्रिपाठी की ‘द मिर्जापुर मूवी’ को लेकर भी इसी तरह का विवाद खड़ा हुआ था, लेकिन ये मामला ‘द वन’ से कहीं ज्यादा पेचीदा और चौंकाने वाला था, क्योंकि यहां कलाकार का आरोप और कानूनी सच्चाई दो अलग-अलग पटरियों पर दौड़ती नजर आईं. मशहूर राजस्थानी कंपोजर और सिंगर रपेरिया बालम, जिनका असली नाम अशोक बिश्नोई है, ने खुलकर नाराजगी जताई.
उन्होंने आरोप लगाया कि ‘मिर्जापुर मूवी’ के मेकर्स ने उनका फेमस ट्रैक ‘शूरवीर’ उनसे पूछे बिना इस्तेमाल किया है. रपेरिया बालम का आरोप सिर्फ परमिशन न लिए जाने का नहीं था, बल्कि उनकी आपत्ति इमोशनल भी थी. उनका कहना था कि उन्होंने ये गाना वीरता के प्रतीक महाराणा प्रताप को समर्पित करते हुए पूरी श्रद्धा से बनाया था. जबकि फिल्म मेकर्स ने इस पवित्र गाने को पर्दे पर खूंखार गैंगस्टर्स और विलेन्स की गुंडागर्दी के लिए इस्तेमाल किया.
सोशल मीडिया पर जैसे ही ये बयान आया, लोगों ने फिल्म मेकर्स को घेरना शुरू कर दिया, लेकिन ठीक इसके बाद संबंधित म्यूजिक लेबल ‘ट्रूपर रिकॉर्ड्स’ का आधिकारिक बयान सामने आया और पूरे खेल का पासा ही पलट गया. ट्रूपर रिकॉर्ड्स ने साफ-साफ कहा कि ‘शूरवीर’ गाने को फिल्म में इस्तेमाल करने के लिए निर्माता कंपनी ‘एक्सेल एंटरटेनमेंट’ को बाकायदा आधिकारिक तौर पर लाइसेंस दिया गया था.
लेबल ने ये भी साफ किया कि उन्होंने गाने के क्रेडिट्स में रपेरिया बालम को बतौर सिंगर और कंपोजर पूरा मान-सम्मान और क्रेडिट भी दिया है. यानी पब्लिकली अविलेबल डॉक्यूमेंट और बयानों के आधार पर, ये मामला बिना परमिशन गाना चुराने का बिल्कुल नहीं था. फिल्म मेकर्स ने अपनी तरफ से संबंधित रिकॉर्ड लेबल से पूरा पैसा देकर और एग्रीमेंट करके गाना लिया था.
आखिर एक गाने पर Copyright किसका होता है?
‘मिर्जापुर मूवी’ का ये मामला म्यूजिक इंडस्ट्री के एक बहुत बड़े सच को बेपर्दा करता है, जिस कलाकार ने रात-दिन एक करके गाना कंपोज किया या अपनी जादुई आवाज में उसे गाया, कतई जरूरी नहीं कि उस गाने को किसी फिल्म या कमर्शियल प्रोजेक्ट में बेचने का लीगल राइट्स उस वक्त उसके अपने हाथ में हो. जब कोई इंडिपेंडेंट आर्टिस्ट किसी म्यूजिक कंपनी या रिकॉर्ड लेबल के साथ काम करता है, तो दोनों के बीच एक लंबा-चौड़ा लीगल कॉन्ट्रैक्ट साइन होता है.
इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत कलाकार अक्सर अपनी रिकॉर्डिंग के कमर्शियल दोहन, लाइसेंसिंग और डिस्ट्रीब्यूशन के राइट्स उस रिकॉर्ड लेबल को असाइन यानी ट्रांसफर कर देता है. ऐसे में जब कोई तीसरा पक्ष या फिल्ममेकर उस गाने को अपनी फिल्म में लगाना चाहता है, तो वो कानूनी तौर पर उस रिकॉर्ड लेबल के पास जाता है, जिसके पास उस गाने के कमर्शियल राइट्स होते हैं. लेबल के पास अगर कॉन्ट्रैक्ट के तहत राइट्स बेचने का अधिकार है, तो वो लीगल तौर पर फिल्ममेकर को लाइसेंस जारी कर देता है.
इस पूरे प्रोसेस में कई बार ऐसा होता है कि गाने के ओरिजनल सिंगर और म्यूजिक कंपोजर को इस डील की भनक तक नहीं लगती, क्योंकि लेबल कानूनी तौर पर अकेले ही ये फैसला लेने के लिए आर्थोराइज होता है. भारतीय कॉपीराइट अधिनियम की धारा 17, 18 और 19 इसी ओनरशिप, असाइनमेंट और उसके नियमों को विस्तार से तय करती हैं. धारा 17 ये बताती है कि किसी काम का पहला मालिक कौन होगा, जबकि धारा 18 और 19 असाइनमेंट का प्रोसेस और शर्तों को कानूनी रूप देती हैं.
किसी भी गाने के Rights कैसे खरीदे जाते हैं?
यहीं पर सबसे ज्यादा भ्रम पैदा होता है. आम लोगों को लगता है कि एक गाना मतलब एक कॉपीराइट, लेकिन कानूनी चश्मे से देखें तो ये ढांचा कई परतों में बंटा होता है. एक तैयार रिकॉर्डेड गाने के अंदर कम से कम तीन अलग-अलग कॉपीराइट इंटरेस्ट जुड़े होते हैं.
- पहला होता है ‘कंपोजिशन’ यानी म्यूजिक कंपोजर की तैयार की गई धुन.
- दूसरा होता है ‘लिरिक्स’ यानी लिरिसिस्ट के लिखे गए बोल.
- तीसरा होता है ‘साउंड रिकॉर्डिंग’ यानी वो आखिरी मास्टर ट्रैक जो स्टूडियो में इंस्ट्रूमेंट्स और आवाज को मिक्स करके बनाया गया है.
इंडियन कॉपीराइट लॉ के तहत म्यूजिकल वर्क और साउंड रिकॉर्डिंग दोनों अलग-अलग चीजें हैं. साउंड रिकॉर्डिंग के मामले में कानून आमतौर पर उस रिकॉर्डिंग को तैयार करने वाले प्रोड्यूसर या लेबल को ही कानूनी तौर पर उसका ‘ऑथर’ यानी प्रोड्यूसर मानता है. इसके अलावा गाने में अपनी आवाज देने वाले सिंगर्स के लिए कानून में ‘परफॉर्मर्स राइट्स’ का अलग से प्रोविशन किया गया है.
इसको एक सीधे से उदाहरण से समझिए. मान लेते हैं कि मिस्टर A नेएक शानदार धुन बनाई, मिस्टर B ने उसके लिए बेहतरीन बोल लिखे और मिस C ने उसे अपनी खूबसूरत आवाज में गाया. अब एक म्यूजिक कंपनी ने लाखों रुपये खर्च करके स्टूडियो, म्यूजिशियन और साउंड इंजीनियर की मदद से उस गाने की फाइनल रिकॉर्डिंग तैयार की.
अब अगर कोई बड़ा डायरेक्टर उस तैयार ऑडियो को अपनी फिल्म के सीन में लगाना चाहता है, तो वो सिर्फ मिस C को फोन करके हां नहीं करवा सकता. उसे ये पूरी कानूनी पड़ताल करनी होगी कि म्यूजिक, लिरिक्स और उस फाइनल मास्टर रिकॉर्डिंग के राइट्स असल में किसके पास सिक्योर हैं. इसी जांच-पड़ताल को लीगल भाषा में ‘राइट्स क्लीयरेंस’ कहा जाता है.
सीधी सी बात ये है कि किसी गाने का मशहूर सिंगर होना और उस रिकॉर्डिंग का कानूनी कॉपीराइट मालिक होना दो बिल्कुल अलग चीजें हैं. ठीक इसी तरह, किसी धुन को बनाने वाला कंपोजर भी हमेशा उस फाइनल ऑडियो का मालिक हो, ये जरूरी नहीं है. अगर उसने अपने राइट्स किसी कंपनी को बेच रखे हैं, तो फैसले का हक उस कंपनी का हो जाता है.
कौन-कौन सी धारा के तहत खरीदे जाते हैं Rights?
अक्सर फिल्मी गलियारों की खबरों में ये काफी सुनने को मिलता है फलां डायरेक्टर ने फलां गाने के राइट्स खरीद लिए, लेकिन तकनीकी तौर पर हर बार पूरा कॉपीराइट खरीदा नहीं जाता. ज्यादातर मामलों में फिल्ममेकर को सिर्फ एक लिमिटेड लाइसेंस दिया जाता है. इंडियन कॉपीराइट एक्ट की धारा 30 कॉपीराइट के मालिक को लाइसेंस देने का कानूनी अधिकार देती है.
वहीं, धारा 18 और 19 पूरी तरह से अधिकारों के असाइनमेंट यानी ट्रांसफर से जुड़ी हैं. इसलिए पूरा अधिकार अपने नाम करवा लेना और सिर्फ अपनी फिल्म में इस्तेमाल करने का लिमिटेड लाइसेंस, दोनों में जमीन-आसमान का फर्क होता है. फिल्म की लीगल टीम जब किसी पुराने या मशहूर गाने को अपनी फिल्म में शामिल करना चाहती है, तो सबसे पहले उस गाने की जन्मकुंडली निकाली जाती है.
ये देखा जाता है कि मास्टर किसके पास है और कंपोजिशन के राइट्स कौन संभाल रहा है. इसके बाद टेबल पर बैठकर लंबी बातचीत होती है. इस बातचीत में एक-एक बारीकी तय की जाती है. गाना फिल्म में पूरा बजेगा या बैकग्राउंड में सिर्फ 10 सेकंड का टुकड़ा चलेगा? गाना सिर्फ मेन सिनेमाहॉल वाली फिल्म में रहेगा या उसका इस्तेमाल टीजर, ट्रेलर और टीवी प्रोमो में भी किया जाएगा? क्या ये अधिकार सिर्फ थिएटर के लिए हैं या कल को जब फिल्म ओटीटी और टीवी चैनल पर आएगी, तब भी लागू रहेंगे?
इतना ही नहीं, लाइसेंस सिर्फ भारत के लिए है या पूरी दुनिया के लिए और ये कितने सालों तक वैध रहेगा, ये सब कुछ एग्रीमेंट में लिखा जाता है. भारतीय कानून के तहत असाइनमेंट या लाइसेंस में समय सीमा, इलाका और अधिकारों का दायरा साफ-साफ दर्ज होना कानूनी रूप से जरूरी है. यही वजह है कि ‘द वन’ वाले मामले में ट्रेलर का पेंच फंसा था.
किसी गाने को पूरी फिल्म में लगाने के राइट्स लेना अलग बात हो सकती है, लेकिन उसी गाने को ट्रेलर या प्रमोशनल कैंपेन में इस्तेमाल करने के लिए अलग से राइट्स की जरूरत पड़ सकती है. जब सरगम वैश के साथ मेकर्स की लीगल टीम ने सिंक राइट्स का एग्रीमेंट पूरा किया, तभी जाकर वो ट्रेलर कानूनी तौर से सिक्योर हो पाया.
IPRS जैसी संस्थाओं का क्या रोल होता है?
म्यूजिक राइट्स की जब भी बात होती है, तो एक नाम सामने आता है IPRS यानी ‘द इंडियन परफॉर्मिंग राइट सोसाइटी’. IPRS भारत सरकार की ओर से रिकोर्गेनाइसड और कॉपीराइट एक्ट के तहत रजिस्टर्ड एक ऐसी संस्था है, जो देश भर के सिंगर, म्यूजिक कंपोजर, लिरिसिस्ट और म्यूजिक पब्लिशर्स के राइट्स और उनकी रॉयल्टी की देखरेख करती है.
इस संस्था की वेबसाइट बताती है कि इसका मेन काम म्यूजिक का इस्तेमाल करने वालों से तय फीस लेकर संगीत बनाने वाले असली कलाकारों तक उनकी सही रॉयल्टी पहुंचाना है, लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं है कि अगर किसी फिल्ममेकर ने IPRS से एक नॉर्मल लाइसेंस ले लिया, तो उसे दुनिया के किसी भी गाने को अपनी फिल्म में बेधड़क इस्तेमाल करने की खुली छूट मिल गई.
कौन सा अधिकार किससे क्लियर करवाना है, ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप गाने का क्या इस्तेमाल कर रहे हैं? अगर आप किसी का ओरिजिनल मास्टर ट्रैक अपनी फिल्म के विजुअल पर चिपका रहे हैं, तो सिर्फ परफॉर्मिंग राइट्स से काम नहीं चलेगा. आपको उस मास्टर रिकॉर्डिंग के मालिक यानी उस म्यूजिक कंपनी से भी अलग से मास्टर राइट्स और सिंक लाइसेंस लेना ही पड़ेगा. यही वजह है कि बड़े प्रोडक्शन हाउस हमेशा तजुर्बेकार एंटरटेनमेंट लॉयर्स की मदद से ‘चेन ऑफ टाइटल’ की एक-एक कड़ी खंगालते हैं.
क्या पुराने भजन या लोकगीत कॉपीराइट फ्री होते हैं?
अक्सर लोगों में और कई बार नए फिल्ममेकर्स में भी ये बहुत भारी गलतफहमी देखी जाती है कि अगर कोई भजन सालों पुराना है या कोई लोकगीत पीढ़ियों से गाया जा रहा है, तो उसे उठाकर कोई भी अपनी फिल्म में डाल सकता है. कानूनन ये सच है कि सालों पहले लिखे गए किसी पारंपरिक भजन, मंत्र या श्लोक के मूल शब्दों पर आज किसी का कॉपीराइट नहीं बचा है. वे पब्लिक डोमेन में आ चुके हैं.
लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं है कि आज के किसी मॉडर्न आर्टिस्ट की ओर से स्टूडियो में रिकॉर्ड किया गया उसका नया वर्जन भी पूरी तरह फ्री हो गया. अगर किसी कलाकार ने उस सालों पुराने भजन में अपने नए शब्द, नया म्यूजिक जोड़ा है और अपनी आवाज में लाखों रुपये खर्च करके एक नई साउंड रिकॉर्डिंग बनाई है, तो उस नई रिकॉर्डिंग पर उस कलाकार या उसके लेबल का पूरा कॉपीराइट होता है.
कॉपीराइट एक्ट किसी भी म्यूजिकल वर्क के नए अरेंजमेंट को एक स्वतंत्र काम के तौर पर प्रोटेक्शन देता है. ‘द वन’ मामले में यही बारीक कानूनी अंतर सबसे अहम था. ‘अयि गिरिनन्दिनि नंदिनी मेधनी’ ओरिजनल तौर से सदियों पुराना महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र है. सरगम वैश ने कभी ये दावा नहीं किया कि उस स्तोत्र के शब्दों की मालकिन वे हैं. उनका पूरा विरोध इस बात पर था कि बिना उसे पूछे इस्तेमाल किए गए उस स्तोत्र को उन्होंने गाकर और नए म्यूजिक के साथ मेहनत से तैयार किया था.
इतने बड़े-बड़े प्रोडक्शन हाउस से चूक कैसे हो जाती है?
सवाल उठता है कि जब बड़े-बड़े बैनर्स के पास वकीलों की पूरी फौज होती है, तो फिर ऐसी नौबत ही क्यों आती है कि रिलीज के बाद विवाद हो? इसके पीछे तीन बड़े कारण होते हैं.
पहला मालिकाना हक की बेहद उलझी हुई चेन: आज के दौर में एक गाना किसी एक कमरे में नहीं बनता. धुन किसी लड़के ने अपने बेडरूम में बनाई, वोकल्स किसी दूसरे शहर में रिकॉर्ड हुए, पैसे किसी छोटे प्रोड्यूसर ने लगाए, डिस्ट्रीब्यूशन का जिम्मा किसी तीसरे लेबल ने लिया और पब्लिशिंग राइट्स किसी विदेशी कंपनी के पास चले गए. जब किसी गाने के हकदार इतने टुकड़ों में बंटे हों, तो आखिर परमिशन किससे लेनी है, इसमें अक्सर चूक हो जाती है.
दूसरा लाइसेंस के दायरे की अधूरी समझ: कई बार प्रोडक्शन हाउस को लगता है कि उन्होंने गाना इस्तेमाल करने की इजाजत ले ली है, लेकिन कागजों में ये साफ नहीं होता कि वे इजाजत सिर्फ फिल्म के लिए थी या यूट्यूब ट्रेलर और सोशल मीडिया रील्स के लिए भी. जरा सी कानूनी भाषा का फेरबदल पूरे मामले को अदालत के दरवाजे पर पहुंचा देता है.
तीसरा आपसी बातचीत की कमी: इसका सबसे सटीक उदाहरण ‘मिर्जापुर मूवी’ का मामला है. जहां कलाकार सोशल मीडिया पर लाइव आकर कहता है कि मुझसे तो किसी ने पूछा ही नहीं, लेकिन बाद में पता चलता है कि जिस म्यूजिक लेबल के पास उस गाने के राइट्स थे, उसने फिल्म मेकर्स के साथ बाकायदा एग्रीमेंट करके पैसे ले लिए थे. कलाकार और उसके पुराने लेबल के बीच अगर बातचीत का अभाव हो, तो ऐसी अनकंफर्टेबल सिचुएशन सरेआम पैदा हो जाती हैं.
रीमेक, कवर और ओरिजिनल रिकॉर्डिंग में अंतर
अगर कोई फिल्ममेकर किसी पुराने गाने की वही ओरिजिनल रिकॉर्डिंग उठाना चाहता है, तो उसे उस मास्टर रिकॉर्डिंग के मालिक से परमिशन लेनी होगी, लेकिन मान लीजिए कि फिल्ममेकर पुराना मास्टर इस्तेमाल नहीं करना चाहता, बल्कि उसी गाने को किसी नए सिंगर से अपनी धुन पर दोबारा गवाना चाहता है, तब क्या होगा?
ऐसी सिचुएशन में आपको पुराने मास्टर के राइट्स नहीं चाहिए, लेकिन उस गाने के ओरिजनल लिरिक्स लिखने वाले गीतकार और धुन बनाने वाले कंपोजर से ‘अंडरलाइंग राइट्स’ की परमिशन लेनी जरूरी होगी. आप ये कहकर नहीं बच सकते कि ये तो मेरी नई आवाज है. इसके अलावा इंडियन कॉपीराइट एक्ट की धारा 31C कवर वर्जन्स के लिए एक खास कानूनी व्यवस्था देती है.
इस व्यवस्था को ‘स्टैच्यूटरी लाइसेंस’ कहा जाता है. इसका सीधा मतलब ये है कि देश का कानून किसी को भी सिर्फ ये कहकर छूट नहीं देता कि मैंने खुद गा लिया है, इसलिए अब मुझे किसी से पूछने की जरूरत नहीं है. कानून की नजर में रीमेक, कवर वर्जन, सैंपलिंग और रीक्रिएशन चारों अलग-अलग चीजें हैं और चारों के लिए क्लीयरेंस के नियम अलग हैं.
कोई भी गाना Official कैसे बनता है?
अक्सर सोशल मीडिया पर लोग पूछते हैं कि किसी गाने के ऑफिशियल होने का क्या मतलब है? क्या सरकार उस पर कोई खास मुहर लगाती है?
इंडस्ट्री में ऑफिशियल का मतलब सिर्फ इतना होता है कि वो गाना कानूनी तौर से पूरी तरह राइट्स की जांच-पड़ताल के बाद रिलीज किया गया है. जब गाना तैयार होता है, तो गीतकार, कंपोजर, सिंगर और लेबल के बीच पक्के कागजात बनते हैं. रॉयल्टी का हिस्सा तय होता है. इसके बाद मास्टर रिकॉर्डिंग तैयार होकर कानूनी कॉन्ट्रैक्ट के तहत यूट्यूब और स्पॉटिफाई जैसे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर भेजी जाती है.
भारतीय कानून में अपने गाने को सिक्योर रखने के लिए कॉपीराइट ऑफिस का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट होना जरूरी शर्त नहीं है. जैसे ही कोई ओरिजनल क्रिएटिविटी किसी रूप में रिकॉर्ड हो जाती है, कानूनन उस पर तुरंत कॉपीराइट लागू हो जाता है. हालांकि, कानूनी सुरक्षा को और पुख्ता करने के लिए कॉपीराइट ऑफिस की वेबसाइट पर ई-फाइलिंग और फॉर्म 14 के जरिए रजिस्ट्रेशन की सुविधा भी मौजूद है.
इसलिए यूट्यूब पर किसी गाने का खुला पड़ा होना इस बात की गारंटी नहीं है कि कोई भी डायरेक्टर उसे मुफ्त का माल समझकर अपनी फिल्म में लगा ले. ठीक इसी तरह, किसी गाने का सिंगर होना इस बात की गारंटी नहीं है कि उस गाने के सारे लीगल राइट्स हमेशा उसी के पास सुरक्षित हैं.