आज के टाइम में मनोरंजन का तरीका थोड़ा बदल गया है. अपनी बिजी लाइफ में लोग आजकल मिनी या माइक्रो ड्रामा को खूब पसंद कर रहे हैं. ये मनोरंजन का सबसे पॉपुलर जरिया बन गए हैं. खासतौर पर अपने छोटे और क्रिस्पी फॉर्मेट की वजह से ऑडियंस को अपनी तरफ खींच लेते हैं. एक तरफ जहां, फिल्म की लंबाई दो से ढाई घंटे की होती है और सीरीज के भी कई एपिसोड्स होते हैं. ऐसे में माइक्रो ड्रामा का एक एपिसोड मु्श्किल से दो-तीन मिनट का होता है. जो कोई भी अपने खाली समय में कहीं भी देख सकता है.
माइक्रो-ड्रामा की सबसे खास बात ये है कि छोटी-छोटी कहानियां में भी इतने ट्विस्ट होते हैं, जो दर्शकों को बांधे रखते हैं. इनकी कहानियां बेहद रोमांचक होती हैं, जिससे दर्शकों को हर बार कुछ नया अनुभव होता है. साथ ही माइक्रो ड्रामा लागत के लिहाज से भी इंडस्ट्री के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है. इतना ही नहीं, इंडस्ट्री भी हर दिन बड़ी होती जा रही है.
माइक्रो ड्रामा क्या होता है और ट्रेडिशनल OTT से कितना अलग है?

बता दें कि माइक्रो ड्रामा रील्स वाले फॉर्मेट का कंटेंट है. इसमें रील्स स्टैंडअलोन वीडियो हैं, जिनका कोई बैकग्राउंड स्टोरी और नैरेटिव स्ट्रक्चर नहीं होता. इसके साथ ही माइक्रो ड्रामा एक कंटेंट सीरीज है, जिसमें लगभग दो-तीन मिनट के वर्टिकल फ्रेम वाले एपिसोड होते हैं. एक माइक्रो ड्रामा में नॉर्मली 50-60 एपिसोड होते हैं.
हालांकि, रील्स और इसमें काफी फर्क है और वो सिर्फ ड्यूरेशन का नहीं है. आसान भाषा में समझाएं तो जब एक फिल्म में कहानी को सांस लेने की जगह मिलती है. ओटीटी पर किसी कहानी को कई एपिसोड में धीरे-धीरे दिखाया जाता है. लेकिन माइक्रो-ड्रामा में कहानी को बेहद तेजी से आगे बढ़ाना पड़ता है. इसमें बस कुछ सेकेंड में स्टोरी का इंट्रो, इमोशन और ट्विस्ट को दिखाया जाता है.
1-3 मिनट के एपिसोड वाली कहानी लोगों को क्यों रोक रही है?
इसके पीछे की एक वजह ये भी है कि आज कल लोगों के पास स्मार्टफोन होता है. लोग अपने मनोरंजन के लिए अच्छा ऑप्शन हैं. जैसे अगर आप कोई फिल्म देखते हैं तो उसमें कम से कम 2 घंटे लगते हैं. लेकिन जब आप कभी मेट्रो में बैठते हैं, या ऑफिस में टी ब्रेक लेते हैं तो बस कुछ मिनटों में आप मोबाइल खोल कर कहानी देखना शुरू कर देते हैं.
वहीं, अगर इसे थोडा इनडेप्थ में समझें तो भारत में माइक्रो-ड्रामा कंजप्शन के लिए स्मार्टफोन के साथ-साथ सस्ता डेटा और डिजिटल पेमेंट जैसे और भी अहम फैक्टर है. Lumikai की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में भारत का माइक्रो-ड्रामा का मार्केट लगभग 300 मिलियन के पार गया था. वहीं, फाइनेंसियल इयर की 2026 की रिपोर्ट भी इस केटेगरी को तेजी से बढ़ता हुआ बाजार बताती है.
माइक्रो ड्रामा मार्केट की बात करें तो चीन इसमें टॉप पर है. चीन की इंडस्ट्री पर नजर रखने वाली iMedia Research की रिपोर्ट की मानें तो चीन का माइक्रो ड्रामा मार्केट साल 2023 में लगभग 5.3 अरब अमेरिकी डॉलर (₹44,000 करोड़) का था. इस रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि यह बाजार 2027 तक लगभग 14 अरब अमेरिकी डॉलर यानी ₹1.16 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा. वहीं, अगर इन नंबर पर गौर करें तो, दूसरे नंबर पर भारत भी इस क्षेत्र में तेजी से उभर रहा है. भारत में भी 90 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट कनेक्शन और मोबाइल-फर्स्ट यूजर बेस के चलते माइक्रो-ड्रामा कंटेंट की मांग बढ़ रही है.
कहां से हुई माइक्रो-ड्रामा की शुरुआत?
सबसे पहले जब चीन में कोरोना महामारी फैली, उसी दौरान माइक्रो-ड्रामा की पॉपुलैरिटी तेजी से बढ़ गई. उस दौरान कई ऐसे ऐप आए, जिससे कई ड्रामे वायरल हुए. उसी दौरान कई प्लेटफॉर्म ने शुरू के कुछ एपिसोड को फ्री में करके आगे पेड कर दिया. साल 2024 तक 660 मिलियन से ज्यादा लोग चीन में माइक्रो ड्रामा देखा. सिर्फ चीन में तब 50.4 बिलियन युआन यानी लगभग 7.02 बिलियन अमेरिकी डॉलर की कमाई दर्ज हुई है. फिर चीन इंडस्ट्री से शुरू हुआ शो बॉक्स ऑफिस कमाई से भी ज्यादा पॉपुलर होने लगा. धीरे-धीरे, यह सफलता वैश्विक स्तर पर भी फैलने लगी.
बिजनेस स्टैण्डर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2024 में चीन में माइक्रो ड्रामा से ऐड और पेड़ रेवेन्यू लगभग $7 बिलियन यानी 700 करोड़ रहा और 830 मिलियन से ज्यादा लोग इस तरह की कंटेंट को कंज्यूम कर रहे थे.
कम बजट, ज्यादा एपिसोड… लेकिन कमाई कैसे?

माइक्रो ड्रामा के शुरुआती एपिसोड फ्री में देखने को मिलते हैं. वहीं, फिर बाद के एपिसोड्स को देखने के लिए आपको पैसे देने पड़ते हैं. कई अलग-अलग माइको ड्रामा ऐप ने अपना सब्सक्रिप्शन मॉडल शुरू किया है. ऐसे में वो उसी हिसाबस से पेमेंट चार्ज करते हैं. इसके अलावा कई ऐप ऐसे हैं, जिनपर देखने के लिए दर्शकों को पैसे देकर क्वाइन खरीदना पड़ता है. कुछ ऐप्स में अगर आप उनके शो का क्लिप सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर करते हैं तो बदले में आपको क्वाइन मिलते हैं. यहां ये समझना बहुत जरुरी है कि OTT से इसका बिजनेस मॉडल बिलकुल अलग है. इसी वजह से माइक्रो-ड्रामा को कंटेंट बिजनेस के साथ-साथ माइक्रो पेमेंट बिजनेस के तौर पर भी देखा जा रहा है.
सितंबर 2026 में आए रेडसीर के एनालिसिस में बताया गया कि भारत में लगभग 40 मिलियन यूजर्स कम से कम एक बार तो माइक्रो ड्रामा के लिए पेमेंट कर चुके हैं. इस रिपोर्ट में यह बताया गया है कि इसमें सिर्फ सब्सक्रिप्शन बढ़ाने में नहीं, बल्कि ऐड और जैसे मॉडल को भी साथ लेकर चलना हो सकता है. फिलहाल, इसको सीधे तौर पर टीवी या ओटीटी का रीप्लेसमेंट कहना जल्दबाजी होगी. इसकी बड़ी वजह माइक्रो-ड्रामा का व्यूइंग बिहेवियर अलग है. मेटा और ओमैक्स की 2026 की स्टडी के मुताबिक, 89 फीसदी व्यूअर ने माइक्रो ड्रामा को सोशल फीड पर देखा है.
भारत में कौन हैं माइक्रो ड्रामा के नामी प्लेटफॉर्म्स?
शेयरचैट के दो शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म मोज टीवी और क्विक टीवी लगभग 2-3 साल पहले से माइक्रो ड्रामा कंटेंट डेवलप करने पर काम कर रहे थे. वहीं, कुकू एफएम ने 2025 की शुरुआत में अपना माइक्रो ड्रामा प्लेटफॉर्म कुकू टीवी लॉन्च किया है. इस साल की शुरुआत में ही अमेजन एम एक्स प्लेयर ने एम एक्स फटाफट के नाम से वर्टिकल फॉर्मेट में माइक्रो ड्रामा पेश करने शुरू किए हैं. इसके अलावा टीवी के आइकॉनिक शोज के लिए जानी जाने वाली एकता कपूर की कंपनी बालाजी टेलीफिल्म्स ने भी इस साल अपने प्लेटफॉर्म ALTT पर माइक्रो ड्रामा को डेडिकेटेड एक नया सेगमेंट शुरू किया है जिसका नाम कटिंग (कtingg) है.
इन सबके अलावा भारत में क्विक टीवी, फ्लिक टीवी, स्टोरी टीवी, वर्टिकल टीवी और रील सागा (ReelSaga) जैसे कई माइक्रो ड्रामा ऐप भारत में तेजी से पॉपुलर हो रहे हैं. इन प्लेटफॉर्म्स पर हिंदी के साथ-साथ तेलुगू, तमिल, मलयालम, गुजराती, पंजाबी, हरियाणवी जैसी रीजनल भाषाओं में भी कंटेंट मौजूद है.
भारत में इसका बाजार क्यों तेजी से बन रहा है?

इन प्लेटफॉर्म पर आने वाले शोज में टीवी और फिल्म इंडस्ट्री के चहेते सितारे नजर आ रहे हैं. फाइनेंसियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले 5 सालों में भारत का माइक्रो ड्रामा मार्केट 5 बिलियन डॉलर का हो जाएगा. इस प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए 68 प्रतिशत लोग छोटे शहरों से आ रहे हैं. इन शोज की लोकप्रियता सबसे ज्यादा महिलाओं के बीच में बढ़ रही है. माइक्रो ड्रामा की लोकप्रियता को देखते हुए बहुत जल्द बड़े- बड़े चैनल्स और ओटीटी प्लेटफॉर्मस भी इस मार्केट में उतरेंगे.
वहीं, ड्रामाबॉक्स का ऐप स्टोर रेवेन्यू जहां ईयर ऑन ईयर 2550% बढ़ा, वहीं शॉर्टमैक्स की ग्रोथ 3888% बढ़ी है. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुतबिक, चीन में हर साल 5000 से ज्यादा माइक्रो ड्रामा सीरीज बन रही हैं. ऐड सेल्स और यूजर्स के खर्च से, चीन में माइक्रो ड्रामा इंडस्ट्री का रेवेन्यू लगभग 7 बिलियन डॉलर हो चुका है. बता दें कि ये चीन के थिएट्रिकल बॉक्स ऑफिस से कहीं ज्यादा है.
माइक्रोड्रामा की 68% ऑडियंस छोटे शहरों से, जिसमें 40% दर्शक सिर्फ महिलाएं
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, भारत में हर महीने करीब 4 करोड़ यूजर माइक्रो-ड्रामा देखते हैं. इसमें लगभग 68 प्रतिशत ऑडियंस टियर-2/टियर-3 शहरों से आती है. इन जगहों पर सिनेमाघर कम, टीवी कमजोर और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म की पहुंच सीमित रहती है. इसमें लगभग 40 प्रतिशत दर्शक महिलाएं हैं. इसमें अब बड़े प्रोड्यूसर भी निवेश कर रहे हैं.
मुकेश अंबानी की कंपनी जियोस्टार ने ‘तड़का’ नाम से प्लेटफॉर्म लॉन्च किया है, जिस पर 100 से ज्यादा शोज हैं. जी एंटरटेनमेंट और बालाजी टेलीफिल्म्स भी इस फॉर्मेट में उतर चुके हैं. कई कंपनियां अब एआई की मदद से इसे 1 हजार प्रति माह तक ले जाने की योजना बना रही हैं. माइक्रो-ड्रामा फिल्ममेकर के मुताबिक माइक्रो-ड्रामा का पूरा सीजन बनाना ओटीटी सीरीज के मुकाबले 70-90% सस्ता पड़ता है.
शूटिंग 3-4 दिन में हो जाती है. लागत करीब 15 हजार से 20 हजार रुपए प्रति मिनट कंटेंट बताई गई है. पूरा सीजन 10-15 लाख रुपए में बन जाता है, जिसे 20 से 50 रुपए महीने की सब्सक्रिप्शन से उठाया जाता है.