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कार्तिक सुब्बाराज की फिल्म 'डोरोथी', जिसमें कीर्ति सुरेश, सनंथ और ऋषिकांत प्रमुख भूमिकाओं में हैं, 25 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई. फिल्म तमिलनाडु के शुरुआती 1990 के दशक के एक गांव की है, जो दो बचपन के दोस्तों कार्थी और सुब्बू के आसपास घूमती है. जाति, हिंसा, दोस्ती, प्रेम और मर्दानगी की कठोर सामाजिक सोच इस कहानी का आधार है. फिल्म की ओरिजनल कहानी के मुताबिक, दोनों दोस्तों की जिंदगी में डोरोथी का आना उनके पुराने विश्वास और रिश्ते को बदल देता है. खास बात ये है कि रिलीज से पहले इस फिल्म को लेकर माहौल काफी अलग था. 'डोरोथी' का वर्ल्ड प्रीमियर टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हुआ, जहां इसे स्टैंडिंग ओवेशन मिलने की खबरें सामने आईं.
लेकिन इंडिया में रिलीज के बाद सोशल मीडिया पर तस्वीर एकदम एक जैसी नहीं रही. एक तरफ लोगों ने इसके ग्रामीण ट्रीटमेंट, एक्टिंग, तनाव पैदा करने वाले सीक्वेंस और निर्देशन की तारीफ कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ LGBTQ+ से जुड़े हिस्सों को लेकर कुछ यूजर्स ने आपत्ति जताई और फिल्म के बायकॉट करने की मांग तक कर दी. यहीं से सवाल खड़ा हो जाता है कि जब हिंदी सिनेमा में 'कपूर एंड सन्स', 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा', 'शुभ मंगल, ज्यादा सावधान' और 'बधाई दो' जैसी फिल्मों ने LGBTQ+ टॉपिक को मेनस्ट्रीम की बातचीत का हिस्सा बनाया, तो 'डोरोथी' को लेकर ये रिएक्शन क्यों देखने को मिल रहा है?.
ये सिर्फ कहना ही आसान है कि बॉलीवुड ने LGBTQ+ कहानियों को तुरंत स्वीकार कर लिया, लेकिन हिस्ट्री थोड़ा अलग है. हिंदी सिनेमा में इस मुद्दे का सफर काफी लंबा और उतार-चढ़ाव वाला रहा है. दीपा मेहता की 'फायर' जैसी फिल्म ने साल 1990 में ही लैसबियन जैसे टॉपिक को सामने रखा था. उस दौर में ऐसी कहानी को लेकर काफी विवाद हुआ. यानी हिंदी सिनेमा ने भी सीधे और आसान तरीके से ऐसी कहानियों को स्वीकार नहीं किया था. बीच में कई ऐसे पड़ाव आए जहां LGBTQ+ किरदारों को मजाक, स्टीरियोटाइप या कॉमिक रीलीफ के तौर पर दिखाया गया.

साल 2008 में 'दोस्ताना' रिलीज हुई. फिल्म ने गे आइडेंटिटी को मेनस्ट्रीम कॉमर्शियल सिनेमा में जगह तो दी, लेकिन उसका तरीका पूरी तरह गंभीर नहीं थ. Vogue India ने भी इस तरह की रिप्रजेंटेशन की बाउंड्री और स्टीरियोटाइप की ओर इशारा किया है. इसके बाद 'कपूर एंड सन्स' जैसी फिल्मों ने तस्वीर बदली. यहां LGBTQ+ पहचान कहानी का सिर्फ मजाक नहीं थी, बल्कि परिवार, प्यार और छिपी पहचान का हिस्सा थी. सोनम कपूर की फिल्म'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा' ने लैसबियन रिलेशनशिप को फैमिली और सोसायटी के सामने रखा, जबकि 'शुभ मंगल ज्यादा सावधान' ने गे रिलेशनशिप को कॉमेडी और फैमिली ड्रामा के साथ मेनस्ट्रीम ऑडियंस तक पहुंचाया.

हिंदी ऑडियंस ने भी ये बदलाव एक दिन में स्वीकार नहीं किया. पहले रिप्रजेंटेशन आया, फिर उस पर बहस हुई, फिर अलग-अलग टॉपिक में LGBTQ+ कहानियां आईं और धीरे-धीरे ऐसी फिल्मों के लिए एक ऑडियंस ग्रुप रेडी हुआ. इसलिए 'डोरोथी' के मामले में भी शायद असली सवाल ये नहीं है कि साउथ LGBTQ+ कहानी को स्वीकार करता है या नहीं. ज्यादा सही सवाल ये है कि क्या ऑडियंस कहानी के भीतर उस रिप्रजेंटेशन को किस रूप में देखना चाहते हैं और फिल्म उन्हें किस इमोशनल नजरिए से वो कहानी दिखा रही है?
'डोरोथी' को सिर्फ LGBTQ+ फिल्म समझना शायद इसकी पूरी कहानी को छोटा कर देना होगा. फिल्म की दुनिया को कास्ट, वायलेंस, पुरानी सोच, लव और पुरुषों को अपनी भावनाएं दबाने के लिए सिखाए जाने जैसे टॉपिक से जोड़ा गया है. कार्थी और सुब्बू की दोस्ती ऐसी दुनिया में पनपती है, जहां जातिगत पहचान, सामाजिक दबाव और मर्दानगी के तय किए गए नियम व्यक्ति की जिंदगी पर असर डालते हैं. ऐसे माहौल में डोरोथी का किरदार सिर्फ एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि उस दुनिया के सामने खड़े एक अलग सोच के रूप में भी सामने आती है.

फिल्म का LGBTQ+ टॉपिक इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि सोशल मीडिया पर सामने आए रिएक्शन में आपत्ति LGBTQ+ टॉपिक पर ही नहीं, बल्कि फिल्म केडायलॉग और उसके रिप्रजेंटेशन के तरीके पर भी जताई गई है. कुछ यूजर्स ने आरोप लगाया कि सेंसिटिव टॉपिक को जिस तरह पेश किया गया, वो उन्हें थोपे जाने जैसा महसूस हुआ और कुछ ने इसी आधार पर बायतॉट की अपील की. ये सोशल मीडिया पर शो किए गए एक ग्रुप का मानना है, इसे पूरी तमिल ऑडियंस की राय मानना सही नहीं होगा.
अब आते हैं उस तुलना पर, जिसने इस पूरी बहस को ज्यादा दिलचस्प बना दिया है. हिंदी सिनेमा का फायदा ये रहा है कि LGBTQ+ टॉपिक पर अलग-अलग तरह की फिल्में पहले से बनती रही हैं. कभी गंभीर ड्रामा, कभी फैमिली एंटरटेनर, कभी कॉमेडी और कभी कॉमिंग-ऑफ-ऐज कहानी. इस वजह से ऑडियंस को इस तरह की कहानियों के कई रूप देखने को मिले. 'कपूर एंड सन्स' में फैमिली के भीतर आइडेंटिटी का स्ट्रगल है. 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा' में प्यार और फैमिली द्वारा स्वीकार करने का सवाल है. तो वहीं 'शुभ मंगल ज्यादा सावधान' ने इसी टॉपिक को हल्के-फुल्के अंदाज में बड़े कॉमर्शियल प्लेटफॉर्म में रखा. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हिंदी ऑडियंस हर LGBTQ+ कहानी को बिना सवाल किए स्वीकार करता है.

असल में ऑडियंस किसी भी कहानी पर अलग-अलग रिएक्शन दे सकती है. कोई रिप्रजेंटेशन की तारीफ कर सकता है, कोई कहानी की ट्रोलिंग कर सकता है और कोई दोनों चीजों को अलग-अलग देख सकता है. 'डोरोथी' के शुरुआती सोशल मीडिया रिएक्शन्स भी यही दिखाते हैं. जब ऑडियंस किसी फिल्म को फैमिली ड्रामा समझकर देखने जाए और बाद में उसमें एक ऐसा टॉपिक सामने आए जिसकी उसने उम्मीद नहीं की थी, तो उसका रिएक्शन अलग हो सकता है. 'डोरोथी' को लेकर कुछ रिएक्शन में इंटरवल के बाद टोन बदलने की बात भी सामने आई है. कुछ लोगों ने पहले हिस्से को स्लो-बर्न रूरल ड्रामा बताया, जबकि बाद के हिस्से को ज्यादा इंटेंस और अलग दिशा में जाने वाला माना.
सोशल मीडिया पर कुछ बायकॉट्स मैसेज जरूर दिखाई दे रहे हैं, लेकिन उनसे ये निष्कर्ष निकालना कि साउथ की ऑडियंस LGBTQ+ कहानियों को स्वीकार नहीं करती, सिर्फ कुछ रिएक्शन से साबित नहीं होता. आखिर फिल्म के बारे में पॉजिटिव रिएक्शन भी सामने आए हैं और टिकटिंग प्लेटफॉर्म पर शुरुआती यूजर इंटरेस्ट और रेंटिंग्स भी पूरी तरह एकतरफा तस्वीर नहीं दिखाती है. सिनेमा हॉल में फिल्म देखने वाले हर व्यक्ति की राय एक्स पर नहीं आती है.

इसके अलावा तमिल सिनेमा खुद सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर काफी लंबे समय से बहस करता आया है. जाति, वर्ग, धर्म, लैंगिकता, लगातार चली आ रही सत्ता और सामाजिक पहचान जैसे मुद्दे वहां नए नहीं हैं. इसलिए LGBTQ+ रिप्रजेंटेशन पर रिएक्शन को पूरे साउथ की सोच नहीं मान सकते. हां, 'डोरोथी' की परिस्थिति में एक खास बात जरूर है कि फिल्म का नरेटिव रूरल तमिलनाडु के उस सच्चाी से जुड़ा है जहां मर्दानगी, जाति और हिंसा कहानी के अहम हिस्से हैं. ऐसे में जेंडर और सैक्सुअलैटी की सोच को चुनौती देने वाला कोई भी फैक कहानी के सामाजिक कॉन्फिक्ट को और तीखा बना सकता है.
आज किसी फिल्म की चर्चा सिर्फ थिएटर के बाहर नहीं होती है. रिलीज के कुछ घंटे बाद ही एक्स, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फिल्म के लिए पॉजिटिव और नेगेटव हजारों पोस्ट आने लगती हैं. 'डोरोथी' के साथ भी यही हुआ. कुछ लोगों ने इसकी असली और दमदार कहानी और परफोर्मेंस की तारीफ की, जबकि कुछ ने LGBTQ+ एलिमेंट्स को लेकर नाराजगी जताई. यहां एक दिलचस्प बदलाव दिखाई देता है. पहले किसी फिल्म को लेकर विरोध अखबारों, टीवी डिबेट्स या थिएटर के बाहर प्रोटेस्ट के जरिए सामने आता था. अब एक हैशटैग कुछ घंटों में फिल्म की पूरी ऑनलाइन इमेज बदल सकता है.
सिनेमा जब समाज केअनकंर्फेटेबल हिस्सों को पर्दे पर लाता है, तो हर ऑडियंस का रिस्पॉन्स एक जैसा नहीं होता. कोई उसमें अपनी जिंदगी देखता है, कोई नई चीज सीखता है, कोई असहमत होता है और कोई फिल्म को पूरी तरह रिजेक्ट कर देता है. आज के समाज में फिल्म की ट्रोलिंग और उससे असहमति दोनों होना तय हैं. लेकिन किसी टॉपिक को सिर्फ इसलिए रिजेक्ट कर देना कि वो हमारी जानी-पहचानी दुनिया से अलग है, ये सही नहीं है.

'डोरोथी' की असली कहानी शायद सिर्फ कार्थी, सुब्बू और डोरोथी की कहानी नहीं है. ये उस समाज की कहानी भी है जो अपनी बनाई हुई नॉर्मल की डेफिनेशन से बाहर निकलने वाली चीजों को देखकर अनकंर्फेटेबल होता है और यही वजह है कि 'डोरोथी' पर चल रही बहस को सिर्फ बायकॉट बनाम सपोर्ट्स की लड़ाई की तरह देखने के बजाय एक बड़े सवाल की तरह देखना चाहिए. क्या इंडियन सिनेमा अब इतनी जगह बना चुका है कि अलग-अलग तरह की पहचान, प्रेम और रिश्तों की कहानियां बिना किसी एक तय खांचे में फिट हुए अपनी बात कह सकें?