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सेंसर बोर्ड की 'रेड टेप': जब नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली फिल्म को कहा गया 'भड़काऊ', महेश भट्ट और आशा पारेख के बीच छिड़ी बड़ी जंग

Asha Parekh 84th Birthday: हिंदी सिनेमा की दिग्गज एक्ट्रेस आशा पारेख आज अपना 84वां जन्मदिन मना रही हैं. 60 और 70 के दशक में 'कटी पतंग', 'तीसरी मंजिल', 'आन मिलो सजना' और 'कारवां' जैसी सदाबहार फिल्मों से करोड़ों दिलों पर राज करने वाली आशा जी को दुनिया एक बेहतरीन अदाकारा के रूप में जानती है. लेकिन उनके करियर का एक ऐसा पड़ाव भी रहा, जब वो परदे के पीछे यानी सेंट्रल फिल्म सर्टिफिकेशन बोर्ड (CBFC) की पहली महिला प्रमुख बनीं.

सेंसर बोर्ड की 'रेड टेप': जब नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली फिल्म को कहा गया 'भड़काऊ', महेश भट्ट और आशा पारेख के बीच छिड़ी बड़ी जंग
Image Credit: आशा पारेख का 84वां जन्मदिन

अपनी दिलकश अदाकारी और एवरग्रीन गानों से कई सालों तक बॉलीवुड पर राज करने वाली दिग्गज अदाकारा आशा पारेख आज 84 साल की हो गई हैं. 60 और 70 के दशक में बॉक्स ऑफिस पर बैक-टू-बैक सुपरहिट फिल्में देकर 'हिट गर्ल' का टैग हासिल करने वाली आशा जी ने न केवल बड़े परदे पर ही कमाल नहीं दिखाया, बल्कि कैमरे के पीछे भी अपनी एक अलग छाप छोड़ी. देश की पहली महिला सेंसर बोर्ड चीफ बनकर उन्होंने जिस बेबाकी और निडरता से देश के सिनेमा की बागडोर संभाली और एक मजबूत पहचान बनाई. लेकिन यही वो समय था, जब फिल्ममेकर महेश भट्ट के साथ उनका एक बड़ा विवाद हो गया.

महेश भट्ट की गिनती हमेशा से उन निर्देशकों में होती है, जो परदे पर कोई बुनावट करने के बजाए अपनी ही जिंदगी की कड़वी सच्चाई उतार देते हैं. 'अर्थ', 'डैडी' और 'वो लम्हे' की तरह साल 1998 में आई उनकी फिल्म 'जख्म' भी कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि उनकी अपनी असलियत थी. एक हिंदू पिता और मुस्लिम मां की संतान होने के नाते उन्होंने बचपन से जो पहचान की उलझन और सामाजिक खींचतान देखी थी, उसे फिल्म का रूप दिया. लेकिन जब ये फिल्म बनकर तैयार हुई, तो देश का माहौल और राजनीतिक संतुलन काफी अलग थे, जिसके चलते इसे सेंसर बोर्ड की कड़ी नजर से गुजरना पड़ा.

आशा पारेख की एक सलाह से भड़क उठे निर्देशक

फिल्म जब सेंसरशिप के लिए पहुंची, तब आशा पारेख CBFC की कमान संभाल रही थीं. उस दौर के माहौल ध्यान में रखते हुए हुए बोर्ड काफी सावधानी बरत रहा था. हाल ही में एक इंटरव्यू में महेश भट्ट ने उस दौर को याद करते हुए बताया कि आशा पारेख ने बेहद सावधानी दिखाते हुए एक सुझाव दिया था. उन्होंने कहा था कि विवाद से बचने के लिए क्यों न इस फिल्म को मुंबई में बाल ठाकरे या दिल्ली में एल.के. आडवाणी को दिखाकर पहले ही मंजूरी ले ली जाए. मगर महेश भट्ट को ये बात बिल्कुल रास नहीं आई. उनका मानना था कि किसी फिल्म को नेताओं के थपेड़ों से नहीं, बल्कि कानूनन बनी कमेटी के नियमों से जांचा जाना चाहिए.

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तीन महीने की बातचीत और कई समझौते

आशा पारेख की उस सलाह से महेश भट्ट काफी परेशान हुए, लेकिन फिल्म को अटकाकर रखना भी मुमकिन नहीं था. आखिरकार मामला होम मिनिस्ट्री तक पहुंचा और करीब 3 महीने तक बैठकों का दौर चलता रहा. भट्ट ने बताया था कि उनकी टीम ने समझाया कि, जब बात इतनी आगे बढ़ चुकी है, तो थोड़ा-बहुत समझौता कर लेना ही समझदारी है. आखिर में कुछ कट्स और बदलावों के बाद फिल्म को हरी झंडी मिली. हालांकि, इस पूरी खींचतान और देरी का असर ये हुआ कि रिलीज के समय फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई बड़ा कमाल नहीं दिखा सकी और बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा कमाई नहीं कर पाई.

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समय की कसौटी पर खरी उतरी 'कल्ट फिल्म'

उस समय 'जख्म' थिएटर्स में बहुत बड़ी कमाई न कर पाई हो, लेकिन समय बीतने के साथ इसने लोगों के दिलों में एक अलग जगह बनाई. महेश भट्ट का मानना है कि जो कहानी सच्ची होती है, वो समय के साथ सोने की तरह निखरती है. आज ये फिल्म एक 'कल्ट क्लासिक' मानी जाती है और इसके राइट्स अब भी उनकी बेटी पूजा भट्ट को अच्छी कमाई करा रहे हैं. अजय देवगन को इस फिल्म के लिए नेशनल अवॉर्ड भी मिला, जो ये साबित करता है कि फिल्म की नीयत और कहानी में कोई कमी नहीं थी.

लोगों को आज भी पसंद आती हैं ये फिल्में

जब महेश भट्ट से पूछा जाता है कि उनकी ऑडियंस को पुरानी फिल्में आज भी लोगों को क्यों झकझोरती हैं, तो उनका सीधा जवाब होता है कि उन्होंने इंसानी जिंदगी के उन छिपे हुए दर्द को छुआ है, जो कभी खत्म नहीं होते. 'जख्म' में उठाई गई धार्मिक और सामाजिक पहचान की समास्या जितनी साल 1998 में सही थीं, उतनी ही आज भी हैं. ठीक वैसे ही जैसे 'अर्थ' में पति-पत्नी के रिश्ते की सच्चाई या 'सारांश' में बुजुर्गों के अकेलेपन का दर्द हमेशा जिंदा रहने वाला टॉपिक है. सालों बाद भी सेंसरशिप की कहानी वही

Asha parekh

सेंसरशिप और निर्देशकों की जंग आज भी जारी

आज आशा पारेख के जन्मदिन पर उनके उस साहसी और सख्त रवैये को आज भी याद किया जाता है, जिसने ये दिखाया कि सेंसर चीफ की कुर्सी कितनी चुनौतियों से भरी होती है. 'जख्म' के विवाद को लगभग तीन दशक बीत चुके हैं, लेकिन हिंदी सिनेमा में सेंसर बोर्ड और फिल्ममेकर्स की ये खींचतान आज भी थमी नहीं है. हाल के दिनों में भी कई फिल्मों को सर्टिफिकेट पाने के लिए महीनों चक्कर काटने पड़े हैं, जो दिखाता है कि सिनेमा और सेंसरशिप का ये पुराना रिश्ता आज भी वैसा ही है. 

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About the Author

Jyoti Rajput

Jyoti Rajput

ज्योति सिंह राजपूत जी न्यूज में सब एडिटर हैं और पिछले 1 साल से ज्यादा से डिजिटल मीडिया में काम कर रही हैं. दैनिक जागरण प्रिंट और सहारा न्यूज नेटवर्क में ट्रेनिंग लेने के बाद अब Zee News में काम कर रही हैं. कुछ समय तक लाइफस्टाइल की खबरों में काम करने के बाद अब एंटरटेनमेंट में काम कर रही हैं. वहीं हॉलीवुड की खबरों और फिल्मों पर पैनी नजर रखती हैं. उन्होंने पंडित माखनलाल चतुर्वेदी नेशनल यूनिवर्सिटी (MCU) से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर डिग्री हासिल की है. आप Jyoti.Rajput@India.com पर सीधे ईमेल कर इनसे जुड़ सकते हैं.
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