)
अपनी दिलकश अदाकारी और एवरग्रीन गानों से कई सालों तक बॉलीवुड पर राज करने वाली दिग्गज अदाकारा आशा पारेख आज 84 साल की हो गई हैं. 60 और 70 के दशक में बॉक्स ऑफिस पर बैक-टू-बैक सुपरहिट फिल्में देकर 'हिट गर्ल' का टैग हासिल करने वाली आशा जी ने न केवल बड़े परदे पर ही कमाल नहीं दिखाया, बल्कि कैमरे के पीछे भी अपनी एक अलग छाप छोड़ी. देश की पहली महिला सेंसर बोर्ड चीफ बनकर उन्होंने जिस बेबाकी और निडरता से देश के सिनेमा की बागडोर संभाली और एक मजबूत पहचान बनाई. लेकिन यही वो समय था, जब फिल्ममेकर महेश भट्ट के साथ उनका एक बड़ा विवाद हो गया.
महेश भट्ट की गिनती हमेशा से उन निर्देशकों में होती है, जो परदे पर कोई बुनावट करने के बजाए अपनी ही जिंदगी की कड़वी सच्चाई उतार देते हैं. 'अर्थ', 'डैडी' और 'वो लम्हे' की तरह साल 1998 में आई उनकी फिल्म 'जख्म' भी कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि उनकी अपनी असलियत थी. एक हिंदू पिता और मुस्लिम मां की संतान होने के नाते उन्होंने बचपन से जो पहचान की उलझन और सामाजिक खींचतान देखी थी, उसे फिल्म का रूप दिया. लेकिन जब ये फिल्म बनकर तैयार हुई, तो देश का माहौल और राजनीतिक संतुलन काफी अलग थे, जिसके चलते इसे सेंसर बोर्ड की कड़ी नजर से गुजरना पड़ा.
फिल्म जब सेंसरशिप के लिए पहुंची, तब आशा पारेख CBFC की कमान संभाल रही थीं. उस दौर के माहौल ध्यान में रखते हुए हुए बोर्ड काफी सावधानी बरत रहा था. हाल ही में एक इंटरव्यू में महेश भट्ट ने उस दौर को याद करते हुए बताया कि आशा पारेख ने बेहद सावधानी दिखाते हुए एक सुझाव दिया था. उन्होंने कहा था कि विवाद से बचने के लिए क्यों न इस फिल्म को मुंबई में बाल ठाकरे या दिल्ली में एल.के. आडवाणी को दिखाकर पहले ही मंजूरी ले ली जाए. मगर महेश भट्ट को ये बात बिल्कुल रास नहीं आई. उनका मानना था कि किसी फिल्म को नेताओं के थपेड़ों से नहीं, बल्कि कानूनन बनी कमेटी के नियमों से जांचा जाना चाहिए.

आशा पारेख की उस सलाह से महेश भट्ट काफी परेशान हुए, लेकिन फिल्म को अटकाकर रखना भी मुमकिन नहीं था. आखिरकार मामला होम मिनिस्ट्री तक पहुंचा और करीब 3 महीने तक बैठकों का दौर चलता रहा. भट्ट ने बताया था कि उनकी टीम ने समझाया कि, जब बात इतनी आगे बढ़ चुकी है, तो थोड़ा-बहुत समझौता कर लेना ही समझदारी है. आखिर में कुछ कट्स और बदलावों के बाद फिल्म को हरी झंडी मिली. हालांकि, इस पूरी खींचतान और देरी का असर ये हुआ कि रिलीज के समय फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई बड़ा कमाल नहीं दिखा सकी और बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा कमाई नहीं कर पाई.

उस समय 'जख्म' थिएटर्स में बहुत बड़ी कमाई न कर पाई हो, लेकिन समय बीतने के साथ इसने लोगों के दिलों में एक अलग जगह बनाई. महेश भट्ट का मानना है कि जो कहानी सच्ची होती है, वो समय के साथ सोने की तरह निखरती है. आज ये फिल्म एक 'कल्ट क्लासिक' मानी जाती है और इसके राइट्स अब भी उनकी बेटी पूजा भट्ट को अच्छी कमाई करा रहे हैं. अजय देवगन को इस फिल्म के लिए नेशनल अवॉर्ड भी मिला, जो ये साबित करता है कि फिल्म की नीयत और कहानी में कोई कमी नहीं थी.

जब महेश भट्ट से पूछा जाता है कि उनकी ऑडियंस को पुरानी फिल्में आज भी लोगों को क्यों झकझोरती हैं, तो उनका सीधा जवाब होता है कि उन्होंने इंसानी जिंदगी के उन छिपे हुए दर्द को छुआ है, जो कभी खत्म नहीं होते. 'जख्म' में उठाई गई धार्मिक और सामाजिक पहचान की समास्या जितनी साल 1998 में सही थीं, उतनी ही आज भी हैं. ठीक वैसे ही जैसे 'अर्थ' में पति-पत्नी के रिश्ते की सच्चाई या 'सारांश' में बुजुर्गों के अकेलेपन का दर्द हमेशा जिंदा रहने वाला टॉपिक है. सालों बाद भी सेंसरशिप की कहानी वही

आज आशा पारेख के जन्मदिन पर उनके उस साहसी और सख्त रवैये को आज भी याद किया जाता है, जिसने ये दिखाया कि सेंसर चीफ की कुर्सी कितनी चुनौतियों से भरी होती है. 'जख्म' के विवाद को लगभग तीन दशक बीत चुके हैं, लेकिन हिंदी सिनेमा में सेंसर बोर्ड और फिल्ममेकर्स की ये खींचतान आज भी थमी नहीं है. हाल के दिनों में भी कई फिल्मों को सर्टिफिकेट पाने के लिए महीनों चक्कर काटने पड़े हैं, जो दिखाता है कि सिनेमा और सेंसरशिप का ये पुराना रिश्ता आज भी वैसा ही है.