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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और SIR के खिलाफ विपक्ष का प्रदर्शन जारी है. आज यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता सड़क पर उतरे और पटेल चौक से संसद मार्ग तक मार्च किया. राहुल गांधी आज अपने उन समर्थकों से मिले, जिन्हें 13 अक्टूबर को चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने हिरासत में लिया था. इस बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के दो बड़े नेताओं को प्रदर्शन के दौरान नियम तोड़ने के आरोप में जेल भेज दिया गया है.
यह पहली बार है जब CJP के शीर्ष दो नेताओं को जेल भेजा गया है, लेकिन उनके समर्थन में वैसी भीड़ नहीं दिखी, जिसकी उम्मीद की जा रही थी. हालांकि, राजनीतिक दलों के नेता जरूर उनके समर्थन में खड़े नजर आए. CJP के आम समर्थकों में जिस तरह की खामोशी दिख रही है, उसका मतलब क्या है? इसे समझना पार्टी के लिए जरूरी है.
कॉकरोच जनता पार्टी के नेता आशुतोष रांका और सौरव दास को दिल्ली की स्पेशल कोर्ट ने पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया. 13 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने आशुतोष, सौरव और अजिंक्य शिंदे समेत 14 लोगों को हिरासत में लिया था. आरोप था कि जंतर-मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिए जाने के बावजूद ये लोग सुरक्षा बैरिकेड्स और ताले लगे गेट को फांदकर जबरन अंदर घुस गए थे. वहां उन्होंने तिरंगा लहराया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की थी. उन पर बॉन्ड की शर्तें तोड़ने और सरकारी काम में बाधा डालने के भी आरोप हैं.
देर रात करीब 3 बजे पुलिस ने तीनों नेताओं को गिरफ्तार कर लिया और सुबह कोर्ट में पेश किया. अदालत ने अजिंक्य शिंदे को पांच हजार रुपये के मुचलके पर रिहा कर दिया. वहीं, आशुतोष रांका को पांच दिनों के लिए तिहाड़ के जेल नंबर 4 में रखा गया है, जबकि सौरव दास को जेल नंबर 2 में रखा गया है.
जब दोनों नेताओं को जेल ले जाया गया, तब तिहाड़ के आसपास CJP समर्थक कहीं नजर नहीं आए. पूर्व घोषित कार्यक्रम के तहत पार्टी के नेता 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पहुंचे थे, लेकिन वहां भी उम्मीद के मुताबिक भीड़ नहीं थी. आशुतोष रांका, सौरव दास और अजिंक्य शिंदे के अलावा CJP के सिर्फ 11 समर्थक ही वहां मौजूद थे. 14 अक्टूबर को भी पूरी तरह खामोशी रही. यह पार्टी के लिए अप्रत्याशित स्थिति है.
इसकी वजह यह है कि 81 दिन पहले जब NEET पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन हो रहा था, तब कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थन में जबरदस्त भीड़ जुटी थी. इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि जब पार्टी के बड़े नेता सड़क पर उतरेंगे या जेल जाएंगे, तो उनके समर्थक भी बड़ी संख्या में दिखाई देंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
पहली बार CJP के शीर्ष नेता जेल गए हैं, लेकिन उनके समर्थन में भीड़ नहीं दिखी. निश्चित तौर पर यह कॉकरोच जनता पार्टी के लिए चिंता का विषय होना चाहिए. पार्टी को मंथन करना चाहिए कि 81 दिनों में ऐसा क्या बदल गया कि जिन छात्रों और युवाओं के नेतृत्व का वह दावा कर रही थी, वही उससे दूर हो गए. क्या NEET पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान जो छात्र और युवा खुद को CJP से जुड़ा हुआ महसूस कर रहे थे, वे चुनाव आयोग और SIR के मुद्दे पर पार्टी से जुड़ाव महसूस नहीं कर पा रहे हैं?
कॉकरोच जनता पार्टी के लिए एक अच्छी बात यह है कि भले ही छात्रों और युवाओं की भीड़ नहीं दिखी, लेकिन राजनीतिक दलों के नेता उसके साथ खड़े हो गए. राहुल गांधी ने उस अदृश्य दीवार को तोड़ने का संकेत दिया, जिसके एक तरफ कांग्रेस और दूसरी तरफ कॉकरोच जनता पार्टी दिखाई दे रही थी.
राहुल गांधी ने आशुतोष रांका, सौरव दास या CJP का नाम लिए बिना सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया. उन्होंने लिखा कि जंतर-मंतर पर तिरंगा लहराना और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना कोई अपराध नहीं है. इसके लिए युवाओं को जेल भेजना कायरता है. विद्यार्थी, युवा, पत्रकार और इंडिया ब्लॉक के नेता भले ही अलग-अलग झंडों के साथ हों, लेकिन सबका मकसद एक है. सभी विरोध प्रदर्शन एक ही हैं. नागरिक अपने संवैधानिक अधिकारों की मांग कर रहे हैं. जंतर-मंतर भारत की जनता का है और उसे वापस लेकर रहेंगे.
राहुल गांधी के समर्थन के बाद अभिजीत दीपके ने भी जवाब दिया. समर्थन और धन्यवाद के बीच दोनों पक्षों की दूरियां कम होती दिखाई दीं. राहुल गांधी के अलावा इंडिया ब्लॉक के तमाम नेता भी CJP के समर्थन में खड़े नजर आए. इस तरह आशुतोष रांका और सौरव दास की गिरफ्तारी पर सवाल उठाए जाने लगे.
राजनीति का एक पुराना नियम है कि बिखरा हुआ आक्रोश सिर्फ शोर पैदा करता है, जबकि एकजुट विरोध बदलाव लाता है. इसी रणनीति के तहत राहुल गांधी अब CJP के साथ खड़े होने के संकेत दे रहे हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त और SIR को आधार बनाकर राहुल गांधी पूरी ताकत के साथ सरकार के खिलाफ खड़े होना चाहते हैं.
उन्होंने कहा भी है कि चुनाव आयोग के खिलाफ यह आंदोलन चाहे एक दिन चले या दो साल, वे पीछे नहीं हटेंगे. इस लंबी लड़ाई को वह रणनीति के साथ लड़ रहे हैं. इंडिया ब्लॉक के नेताओं को लंच पर बुलाना, उनके साथ बैठकर चाय पीना या फिर आगे बढ़कर CJP के साथ खड़े होने का संदेश देना, ये सभी कदम विपक्षी एकता की रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं.
इसी रणनीति के तहत राहुल गांधी ने 14 अक्टूबर को अपने उन समर्थकों को 10 जनपथ पर बुलाया, जिन्हें एक दिन पहले पुलिस ने हिरासत में लिया था. कई प्रदर्शनकारी छात्र और NSUI के कार्यकर्ता वहां पहुंचे. राहुल गांधी ने सभी से बात की और फिर उन्हें मीडिया के सामने लेकर आए. इनमें एक महिला प्रदर्शनकारी भी थीं, जिन्हें राहुल गांधी ने 'शेरनी' कहकर संबोधित किया.
हालांकि, NSUI की नेता ऋतु बराला का एक वीडियो दिल्ली पुलिस ने भी जारी किया है. इसमें ऋतु बराला एक महिला पुलिसकर्मी के साथ हाथापाई करती नजर आ रही हैं. वीडियो में वह पुलिसकर्मी को थप्पड़ मारती दिखाई देती हैं.
ऋतु बराला ने राहुल गांधी के साथ मीडिया के सामने आकर कहा कि जब पुलिस उन्हें मार रही थी, तब उनके दिल में नफरत नहीं, बल्कि प्यार था. लेकिन पुलिस के साथ उनकी हाथापाई का वीडियो सामने आने के बाद इस बयान पर सवाल उठने लगे. वीडियो में दोनों एक-दूसरे के बाल पकड़कर खींचती दिखाई देती हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि पुलिसकर्मी को थप्पड़ मारने के दौरान किस तरह के प्यार की बात की जा रही थी.
राहुल गांधी ने ऋतु बराला को शेरनी कहा, जबकि बीजेपी विपक्ष के प्रदर्शन पर ही सवाल उठा रही है. इस पूरे घटनाक्रम ने विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प को राजनीतिक बहस का मुद्दा बना दिया है.
ब्रिटेन के प्रसिद्ध लेखक जॉर्ज ऑरवेल के विचारों के मुताबिक, राजनीति सत्ता की लड़ाई है. इसमें एक पक्ष आक्रमण करता है, तो दूसरा पक्ष भी जवाबी हमला करता है. बीजेपी इस वक्त इसी रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है.
राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के नेता जिस अंदाज में सरकार पर प्रहार कर रहे हैं, बीजेपी भी उसी अंदाज में जवाब दे रही है. 12 अक्टूबर को इंडिया गठबंधन के सुप्रीम कोर्ट मार्च का एक वीडियो बीजेपी के नेता साझा कर रहे हैं. इसमें पैदल मार्च के दौरान राहुल गांधी कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को पीछे से खींचते हुए दिखाई देते हैं.
इस वीडियो को जारी करते हुए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने कहा कि एक गौरवान्वित असमिया होने के नाते उन्होंने 2015 में अपमान सहन करने से इनकार कर दिया था. उन्होंने कहा कि उन पर ईश्वर की कृपा थी. हिमंत ने डीके शिवकुमार का जिक्र करते हुए कहा कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री केवल एक व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि एक संवैधानिक पद पर हैं. वह एक गौरवशाली इतिहास, समृद्ध संस्कृति और गहरे गौरव से परिपूर्ण राज्य का चेहरा हैं. उन्होंने सवाल किया कि क्या डीके शिवकुमार इस सार्वजनिक अपमान के आगे झुकेंगे?
बीजेपी के नेता इस घटनाक्रम को राहुल गांधी के अहंकार और मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के अपमान से जोड़ रहे हैं. हालांकि, डीके शिवकुमार ने खुद इस वीडियो पर सफाई दी है. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि राहुल गांधी ने उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उन्हें वाहन में वापस जाने और सावधानी बरतने की सलाह दी थी. यही उनका रिश्ता है, जो विश्वास, स्नेह और परिवार पर आधारित है. उन्होंने कहा कि 10 सेकंड का वीडियो पूरी कहानी नहीं बता सकता.
इसके बाद डीके शिवकुमार ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ अपनी एक तस्वीर भी साझा की. कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने इस तरह अपने नेता के साथ किसी तरह की असहमति या अपमान के आरोपों को खारिज करने की कोशिश की.
इस पूरे घटनाक्रम में बीजेपी और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप का एक नया मोर्चा खुल गया है. एक तरफ राहुल गांधी पुलिस की कार्रवाई को लेकर सवाल उठा रहे हैं और प्रदर्शनकारियों के समर्थन में खड़े हो रहे हैं. दूसरी तरफ बीजेपी प्रदर्शन के दौरान हुई हाथापाई और राहुल गांधी के व्यवहार से जुड़े वीडियो साझा करके विपक्ष को घेर रही है.
दोनों पक्ष अपने-अपने दावों के समर्थन में वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं. ऐसे में यह लड़ाई केवल चुनाव आयोग और SIR तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि विरोध प्रदर्शनों के तरीके, पुलिस की कार्रवाई और विपक्षी नेताओं के आचरण को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज हो गई है