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उत्तराखंड में आ सकता है '8.1 तीव्रता' वाला 'सदी का सबसे खतरनाक' भूकंप! डेढ़ मिनट में मलबा बन जाएंगी दिल्ली की 38% इमारतें

तिब्बत में गुरुवार देर रात एक बड़ा भूकंप आया था. रिक्टर स्केल पर इस भूकंप की तीव्रता 7 थी और इसका केंद्रबिंदु तिब्बत में नाग्चु के करीब स्थित था. धरती के अंदर हुए कंपन की वजह से डरे हुए भागते नजर आए. कई वीडियोज में बड़ी बड़ी इमारतों के हिस्से एक झटके में नीचे गिर गए.

उत्तराखंड में आ सकता है '8.1 तीव्रता' वाला 'सदी का सबसे खतरनाक' भूकंप! डेढ़ मिनट में मलबा बन जाएंगी दिल्ली की 38% इमारतें
Image Credit: उत्तराखंड में भूकंप की आशंका

तिब्बत में पिछले तकरीबन 24 घंटों में भूकंप की चपेट में आने से 16 लोगों की मौत हो गई है. 46 घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया है और भूकंप प्रभावित क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जा रहा है. स्थानीय प्रशासन को आशंका है कि कई लोग अब भी, इमारतों के मलबे में दबे हो सकते हैं. इसी वजह से मलबे को धीरे धीरे हटाया जा रहा है, ताकि जिंदा बचे लोगों को सुरक्षित निकाला जा सके.

उत्तराखंड में आ सकता है FATHER OF ALL EARTHQUAKES

तिब्बत ने हिलती धरती का दंश सह लिया है, लेकिन खतरा अभी टला नहीं है. तिब्बत की एक सीमा भारत के उत्तराखंड राज्य से भी लगती है. इसी उत्तराखंड में स्थित हिमालय के पर्वतों को लेकर, एक बड़ी चेतावनी सामने आई है. भूकंप और हिमालय से जुड़े इस अलर्ट को समझने के लिए, आपको एक रिपोर्ट बेहद गौर से देखनी और समझनी चाहिए. ये ऐसा खतरा है जिसे अगर FATHER OF ALL EARTHQUAKES कहा जाए, तो गलत नहीं होगा.

यूरोपियन जियो साइंसेज़ यूनियन में पेश की गई एक रिपोर्ट में, हिमालय के नीचे हो रही हलचल का अध्ययन किया गया है. इस रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में स्थित हिमालय के नीचे, टेक्टोनिक प्लेट्स का मूवमेंट यानी हलचल बाधित गई है . भूगर्भ विज्ञान की भाषा में इस प्रक्रिया को प्लेट की लॉकिंग कहा जाता है. उत्तराखंड के तकरीबन 115 किलोमीटर लंबे हिस्से में ये प्रक्रिया हो रही है.

हालिया रिपोर्ट में चेताया गया है कि इस लॉकिंग की वजह से हिमालय की सतह के नीचे ऊर्जा जमा हो रही है. अगर ये ऊर्जा अचानक बाहर निकली तो उत्तराखंड में रिक्टर स्केल पर 8.1 की तीव्रता का भूकंप आ सकता है. इस भूकंप का असर उत्तराखंड से लेकर दिल्ली और उत्तर प्रदेश तक होगा.

टेक्टोनिक प्लेट्स क्या होती हैं?

इतने बड़े भूकंप से कितनी तबाही हो सकती है, ये बताने से पहले हम आपको आसान भाषा में इस वैज्ञानिक शब्दावली को समझा देते हैं. टेक्टोनिक प्लेट्स धरती की सतह के नीचे का वो हिस्सा होता है, जो लगातार हिलता रहता है. इस हलचल की रफ्तार उतनी ही होती है, जितनी गति से आपकी उंगली का नाखून बढ़ता.

ये प्लेट हर साल औसतन 1 से 4 सेंटीमीटर हिलती हैं, इसी वजह से धरती की सतह पर खड़ा आम आदमी, हलचल को महसूस नहीं कर पाता है. अब लॉकिंग को भी समझना जरूरी है. लॉकिंग वो स्थिति होती है जब दो टेक्टोनिक प्लेट एक दूसरे के सामने आ जाती हैं, यानी उनका मूवमेंट रुक जाता है.

विज्ञान की किताबों में आपने पढ़ा ही होगा कि धरती की सतह के नीचे मैग्मा होता है, जिसे आम भाषा में लावा भी कह देते हैं. जब टेक्टोनिक प्लेट्स हिलती हैं तो उनके नीचे मौजूद गर्म मैग्मा से ऊर्जा निकलती है. प्लेट्स की हलचल की वजह से इस ऊर्जा को निकलने का रास्ता मिलता है. अगर प्लेट्स एक दूसरे के सामने आकर रुक जाएं, तो ये ऊर्जा धरती की सतह के नीचे जमा होनी शुरु हो जाती है. जब ये ऊर्जा अचानक से बाहर निकलती है तो धरती की सतह हिलती है और भूकंप पैदा होता है.

सैकड़ों इमारतें एक झटके में ढह जाएंगी

शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड में इसी किस्म की प्रक्रिया की आशंका जताई है. रिसर्च रिपोर्ट साफ-साफ कहती है कि उत्तराखंड में पहाड़ों के नीचे इतनी ऊर्जा जमा हो जाएगी. जितनी 100 सालों में किसी टेक्टोनिक प्लेट के अंदर जमा होती है. इसी ऊर्जा की वजह से उत्तराखंड की हिमालयन बेल्ट पर, बड़े भूकंप का खतरा मंडरा रहा है. ऐसी खतरनाक स्थिति में सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं बल्कि देश के दूसरे हिस्सों को भी नुकसान होने की संभावना है.

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में इस भूकंप की आशंका जताई गई है. अगर कुमाऊं के पिथौरागढ़ या नैनीताल में ऐसा भूकंप आया, तो इस क्षेत्र के निवासियों को 10 सेकेंड के अंदर झटके महसूस होंगे . इन इलाकों में भूकंप की वजह से इमारतें गिर जाएंगी, बड़े भूस्खलन होंगे और जंगलों में आग लग जाएगी. कुमाऊं के बाद भूकंप के झटके हल्द्वानी, बरेली और मुरादाबाद जैसे शहरों में, 20 से 25 सेकेंड के अंदर भूकंप महसूस होंगे.

इन इलाकों में इमारतों को नुकसान होगा, पुल और सड़कों में बड़ी दरारें पड़ जाएंगी. जमीन के नीचे स्थित पाइपलाइंस तक तबाह हो जाएंगी. अब बात करते हैं देश की राजधानी दिल्ली की. कुमाऊं से भूकंप के झटकों को दिल्ली पहुंचने में तकरीबन 90 सेकेंड यानी डेढ़ मिनट लगेंगे. हालांकि दिल्ली तक आते आते भूकंप के झटके कुछ कमजोर पड़ेंगे, लेकिन दिल्ली के कुछ इलाकों में बड़े नुकसान की आशंका है.

उत्तराखंड में आ सकता है 8.1 की तीव्रता का भूकंप

खासकर यमुना के खादर में बने इलाकों के अंदर, भूकंप की वजह से घरों की छतें गिर सकती हैं. इसके साथ ही साथ ऊंची इमारतों की नींव तक को नुकसान पहुंच सकता है. घनी आबादी होने की वजह से दिल्ली में रेस्क्यू और रिलीफ में बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.

शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड में 8.1 की तीव्रता के भूकंप की आशंका जाहिर की है. अगर ये भूकंप कमजोर होकर भी दिल्ली तक पहुंचेगा, तब भी तीव्रता रिक्टर स्केल पर 6 से ज्यादा ही रहेगी. भगवान ना करे, ऐसी स्थिति कभी आए. लेकिन अगर ऐसी स्थिति दिल्ली में आई तो यहां की 38 प्रतिशत इमारतें खतरे में पड़ जाएंगी. यानी दिल्ली के करीब 34 लाख घरों, कारखानों को भारी नुकसान पहुंच सकता है. इस तीव्रता के भूकंप से दिल्ली और उसके नजदीकी क्षेत्रों में 10 से 11 हजार लोगों की मौत हो सकती है. साढ़े आठ लाख करोड़ रुपए की आर्थिक क्षति हो सकती है.

हम आपको बता दें, कि ये सिर्फ एक आकलन है. अगर उत्तराखंड और दिल्ली में बड़ा भूकंप आया तो नुकसान का स्तर इससे भी ज्यादा हो सकता है. बड़ी तीव्रता के भूकंप की आशंका को गंभीरता से क्यों लेना चाहिए. ये आपको स्वतंत्र भारत के इतिहास के पन्ने बता देंगे.

भारत में कब-कब आए बड़े भूकंप?

रिक्टर स्केल पर सबसे बड़ा भूकंप वर्ष 1950 में आया था. असम में आए इस भूकंप की तीव्रता 8.6 थी और इस भूकंप में तकरीबन 3300 लोगों की मौत हो गई थी. दूसरा बड़ा भूकंप वर्ष 2001 में आया था. गुजरात के भुज में रिक्टर स्केल पर 7.7 की तीव्रता का भूकंप दर्ज हुआ था. भुज में आई आपदा में तकरीबन 20 हजार लोग मारे गए थे.

रिक्टर स्केल पर तीसरा बड़ा भूकंप 2005 में आया था. कश्मीर में आए इस भूकंप की तीव्रता 7.6 थी. धरती में हुई इस हलचल की वजह से कश्मीर और PoK में लगभग 86 हजार लोगों की मौत हुई थी. हालांकि ये भी एक सच है, कि पिछले 20 सालों में इतना बड़ा नुकसान करने वाला कोई भूकंप नहीं आया है.

यूरोपियन जियो साइंसेज़ यूनियन में जो रिसर्च पेपर पेश किया गया है, उसमें हिमालय के नीचे हो रही गतिविधि का एक और चौंकाने वाला पहलू बताया गया है. इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों का अध्ययन किया गया था.

अध्ययन में सामने आया कि हिमालय के नीचे बनी टेक्टोनिक प्लेट्स का मूवमेंट, औसत से 18 मिलिमीटर प्रति वर्ष कम हो गया है . साथ ही साथ इन प्लेट्स के ऊपर उठने का सिलसिला, सालाना 4 से 6 मिलिमीटर हो गया है . प्लेट्स के ऊपर उठने का सिलसिला ये बताता है, कि आने वाले सालों में हिमालय की सतह की ऊंचाई भी बढ़ेगी .

दुनिया में बार-बार क्यों आ रहे भूकंप?

हिमालय में हो रहे बदलाव और उससे पैदा होने वाला खतरा सामने आ चुका है. अब सवाल ये है कि आखिर हिमालय के नजदीक रहने वाले लोग, इस बड़े भूकंप से कैसे बच सकते हैं. प्रकृति की प्रक्रिया को रोकने का तो कोई तरीका है नहीं, इसी वजह से इंसान को खुद को ही बदलना होगा. एक्सपर्ट्स का कहना है, इस किस्म के भूकंप से बचने का एक ही समाधान है. इमारतें बनाते वक्त सभी नियमों का पालन किया जाए, खासकर इमारतों के निर्माण में भूकंप रोधी तकनीकों का इस्तेमाल जरूर किया जाए.

इंसानों ने पहले धरती की सतह के नीचे जाकर खनन किया. फिर बड़े बड़े बांध बनाकर धरती की सतह के ऊपर भारी दबाव बना दिया. यानी इंसानी गतिविधियों ने प्रकृति के चक्र का संतुलन खराब किया. इसी का नतीजा है कि आज मानव सभ्यता बार-बार प्रकृति के रौद्र रुप की गवाह बन रही है. प्रकृति और मानव सभ्यता के रिश्ते पर, प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुंदर लाल बहुगुणा ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी.

सुंदर लाल बहुगुणा कहते थे - इंसानों को ये समझना होगा कि प्रकृति कोई ऐसी बाधा नहीं है जिसपर विजय पाई जाए. इंसानों के लिए प्रकृति मां समान है, जिसका सम्मान करना चाहिए. जब हम छोटे-छोटे फायदों के लिए नदियों और पहाड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं, तो उससे ऐसी आपदाएं पैदा होती हैं, जिन्हें रोका नहीं जा सकता.
 

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About the Author

Devinder Kumar

Devinder Kumar

अनुभवी पत्रकार और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक हैं. पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. अमर उजाला और नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने के बाद, वर्तमान में वे Zee News में कार्यरत हैं. देश-दुनिया और ब्रेकिंग न्यूज पर नजर रखते हैं. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक घटनाक्रमों और खोजपरक पत्रकारिता में विशेष पकड़ है.
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