)
अब हम, डॉनल्ड ट्रंप के अभिन्न मित्र बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य का DNA टेस्ट करेंगे. मित्रों, कल इजरायल में आम चुनाव है. कल वहां नई सरकार चुनने के लिए वोटिंग होगी. इजरायल क्षेत्रफल के हिसाब से दुनिया का 150वां देश है. लगभग 1 करोड़ की जनसंख्या वाला इजरायल आबादी के हिसाब से 98वें स्थान पर आता है. फिर भी पूरी दुनिया की निगाहें इजरायल पर होने वाले चुनाव पर हैं.
क्योंकि इजरायल के चुनाव में जो कुछ दांव पर लगा है..उसका असर सारी दुनिया पर पड़ने वाला है . आज आपको जानना चाहिए...1996 में पहली बार इजरायल के प्रधानमंत्री बने और पिछले 30 सालों में 20 साल इजरायल की सत्ता संभालने वाले बेंजामिन नेतन्याहू की जीत और हार गाजा और ईरान में चल रही उथल पुथल को कितना बदल सकती है.
आज आपको ये भी समझना चाहिए इस बार चुनाव में नेतन्याहू को जो नेता कड़ी टक्कर दे रहे हैं . वो कौन हैं...उनकी जीत का इजरायल पर क्या असर पड़ेगा ? क्या चेहरा बदलने से इजरायल के तेवर भी बदल जाएंगे . मित्रों...दुनिया में इजरायल का सबसे बड़ा साझेदार अमेरिका है . अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने इस चुनाव में खुलकर बेंजामिन नेतन्याहू का समर्थन कर दिया है . आज आपको जानना चाहिए इजरायल के लोगों पर इसका क्या असर पड रहा है . लेकिन सबसे पहले समझिए इजरायल में चुनाव कैसे होते हैं ? और भारत में होने वाले चुनाव से ये कैसे अलग हैं?
इजरायल में कैसे होते हैं चुनाव?
इजरायल में सरकार बनाने वाले चुनाव भारत की तरह अलग अलग लोकसभा सीट के आधार पर नहीं होते..बल्कि पूरा देश मिलकर एक बड़ा निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है. और आसान भाषा में समझें तो जिस तरह भारत में 543 लोकसभा सीटों पर चुनाव होते हैं...हर लोकसभा सीट पर उस क्षेत्र की जनता अलग अलग पार्टी के प्रत्याशियों में से अपने पसंद के प्रत्याशी को वोट देती है . ऐसा इजरायल में नहीं होता. इजरायल का नागरिक किसी व्यक्ति या उम्मीदवार को वोट नहीं देता, बल्कि वह राजनीतिक दलों और उसकी सूची को वोट देता है.
इजरायल में हर पार्टी चुनाव से पहले अपने उम्मीदवारों की एक वरीयता सूची जारी करती है. जिसमें सबसे महत्वपूर्ण उम्मीदवार सबसे ऊपर और कम महत्वपूर्ण उम्मीदवार नीचे होते हैं. चुनाव में जिस पार्टी को जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं, उसके हिसाब से संसद में उस पार्टी की सीटें तय होती हैं.
इजरायल में कल होने वाले चुनाव पर विशेष कवरेज के लिए जी न्यूज की टीम भी इजरायल में मौजूद है . आज आपको कल होने वाले चुनाव की तैयारियों पर हमारी ग्राउंड रिपोर्ट बहुत ध्यान से देखनी चाहिए. जी मीडिया संवाददाता ने बताया इजरायल में चुनाव के बाद गठबंधन के विकल्प भी तलाश किए जा रहे हैं. इजरायल में सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी या गठबंधन को 61 सीटें हासिल करनी होती हैं . लेकिन इजरायल के निर्माण के बाद से यानी 1948 से आज तक किसी भी एक राजनीतिक दल ने संसद की 120 सीटों में से 61 सीटों का स्पष्ट बहुमत अकेले हासिल नहीं किया है. इसीलिए इजरायल में हमेशा गठबंधन सरकार बनती है . आज आपको ये भी समझना चाहिए, इजरायल में किसी पार्टी को बहुमत क्यों नहीं मिलता?
इसकी सबसे बड़ी वजह है...इजरायल में जितने प्रतिशत वोट, उतनी सीटें वाला नियम चलता है. भारत या ब्रिटेन की तरह यहां ऐसा नहीं होता कि कुछ प्रतिशत ज्यादा वोट पाने पर कोई पार्टी भारी बहुमत हासिल कर ले. यहां हर पार्टी को उसकी लोकप्रियता के हिसाब से बिल्कुल सटीक अनुपात में सीटें मिलती हैं, इसलिए किसी एक पार्टी के लिए अकेले दम पर बहुमत पाना लगभग नामुमकिन है. इसके अलावा इजरायली समाज मुख्य रूप से चार अलग-अलग सोच वाले समूहों में बंटा हुआ है. इसमें पहले धर्मनिरपेक्ष यहूदी और दूसरे कट्टर धार्मिक यहूदी हैं जिसमें प्रार्थना करने वाले हारेदी समुदाय के लोग आते हैं.
इसके अलावा तीसरे राष्ट्र की संस्कृति, सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को सबसे ऊपर रखने वाले दक्षिणपंथी राष्ट्रावादी और चौथे इजरायली अरब नागरिक हैं. ये सभी समूह अपनी पसंद की अलग-अलग पार्टियों को वोट देते हैं, जिससे वोट कई हिस्सों में बंट जाते हैं और किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिल पाता. आज आपको ये भी समझना चाहिए..इजरायल ने ये चुनाव प्रणाली क्यों अपनाई...मित्रों 1948 में जब इजरायल का निर्माण हुआ तो दुनिया भर की अलग अलग संस्कृतियों से यहूदी इजरायल पहुंचे. अलग-अलग संस्कृतियों के इन्हीं यहूदियों को जोड़ने और हर छोटे समूह को संसद में आवाज देने के लिए इस प्रणाली को अपनाया गया ताकि कोई खुद को अकेला और उपेक्षित न समझे .
यानी इजरायल की प्रणाली यह सुनिश्चित करती है कि देश के हर छोटे राजनीतिक विचार चाहे वह धुर-दक्षिणपंथी हो या फिलिस्तीनी मूल के इजरायली नागरिकों की अरब पार्टी...सभी को संसद में प्रतिनिधित्व मिले . इसके अलावा यूरोप में हिटलर की तानाशाही को देखते हुए नेता चाहते थे कि ताकत किसी एक व्यक्ति या पार्टी के हाथ में न सिमटे, बल्कि बंटी रहे. लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इजरायल में सरकारें हमेशा बैसाखियों पर टिकी होती हैं और ब्लैकमेलिंग का शिकार रहती हैं, जिससे राजनीतिक अस्थिरता का खतरा हमेशा बना रहता है. आज आपको ये भी समझना चाहिए इजरायल में सरकार कैसे बनती है ?
1 नवंबर 2022 को हुए चुनाव में नेतन्याहू की दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी 32 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी. इसके बाद उन्होंने शास और यूनाइटेड तोराह जूडिज्म, जैसी पार्टियों के साथ गठबंधन करके 64 सीटों के समर्थन के साथ सरकार बनाई थी. यह इजरायल के इतिहास की सबसे कट्टर राइट-विंग सरकार मानी गई. जिसने 1988 के बाद पहली बार चार साल का कार्यकाल पूरा किया . लेकिन इस बार सर्वे में नेतन्याहू की पार्टी पीछे चल रही है . आज आपको इजरायल में बेंजामिन नेतन्याहू के सामने खड़ी चुनौतियों के बारे में भी जानना चाहिए .
DNA मित्रो, इजरायल का परिणाम बताएगा कि ट्रंप के करीबी बेंजामिन नेतन्याहू की वापसी होती है या नहीं. लेकिन लैटिन अमेरिकी देश ब्राजील में ट्रंप ने जिस उम्मीदवार का साथ दिया, उसकी चुनाव में हार हो गई और ट्रंप के सबसे बड़े विरोधियों में से एक ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा जीत गए. उन्होंने चौथी बार राष्ट्रपति का चुनाव जीता है.
लूला दा सिल्वा यानी वो नेता जो इस वक़्त दुनिया में ट्रंप के ख़िलाफ़ सबसे मुखर चेहरों में से एक हैं. जिनको हराने के लिए ट्रंप प्रशासन ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया. लेकिन तमाम विरोधों के बावजूद ब्राज़ील की जनता ने लूला को ही चुना. वो भी उस हालात में, जब चुनाव के पहले दौर में वो पीछे रह गए थे. आखिर लूला ब्राजील के बाजीगर कैसे बने? ट्रंप का मिशन ब्राज़ील क्यों नाकाम हो गया? और सवाल ये भी कि क्या ट्रंप के साथ रहना हार की गारंटी है? इन सवालों को डिकोड करने से पहले आपको ब्राजील के नतीजे देखने चाहिए.
ब्राजील के चुनाव में लूला ने अप्रत्याशित ढंग से वापसी करते हुए अपने विरोधी फ्लावियो बोल्सोनारो को हराया. लूला को क़रीब 52% वोट मिले जबकि उनके विरोधी को 48%. वोट की बात करें तो लूला को 6 करोड़ 43 लाख मतदाताओं ने पसंद किया जबकि उनके विरोधी को 5 करोड़ 98 लाख लोगों ने वोट दिया. यानी क़रीब 45 लाख मतों के अंतर से लूला ये चुनाव जीतने में कामयाब रहे. मित्रो, इसे अप्रत्याशित क्यों कहा जा रहा है, अब आपको ये भी समझना चाहिए.
अंतिम राउंड के नतीजों से पहले अक्टूबर के पहले हफ़्ते में पहले दौर की वोटिंग हुई थी. उस चुनाव में लूला पीछे रह गए थे. फ्लावियो को पहले चरण में 47% वोट मिले थे जबकि लूला को 45% मतदाताओं ने पसंद किया. ब्राजील के चुनावी कानून के मुताबिक, पहले चरण में अगर किसी भी उम्मीदवार को 50% से कम मत मिलते हैं तो सबसे ज्यादा वोट पाने वाले 2 उम्मीदवारों के बीच दूसरे चरण में मुक़ाबला होता है. इसी वजह से ब्राजील का ये चुनाव 2 चरणों में हुआ. 1989 में ब्राजील में नए संविधान के तहत राष्ट्रपति चुनाव शुरू हुए थे. उसके बाद ये पहली बार हुआ, जब पहले राउंड में दूसरे नंबर पर रहने वाला उम्मीदवार आखिरी दौर में जीतकर राष्ट्रपति बना.
मित्रों, पहले चरण में हार के बाद भी 80 साल के लूला ने हिम्मत नहीं हारी. लूला ने चुनाव में ट्रंप विरोधी भावनाओं को पूरी तरह भुनाया. ट्रंप के दबाव के बीच उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ब्राजील को अपने फैसले खुद लेने चाहिए. इसके अलावा लूला ने महंगाई से परेशान जनता को राहत देने के लिए कई वादे किए. दूसरे दौर के मतदान से ठीक पहले, ब्राजील सरकार ने देश में ईंधन की क़ीमतें कम कर दीं. इससे लोगों को राहत का संदेश मिला. दूसरी तरफ़ लूला के विरोधी ने ट्रंप के साथ करीबी संबंध बनाने का वादा किया. ट्रंप की नीतियों से परेशान लोगों को ये पसंद नहीं आया. यही वजह है कि 20 दिन में ही लूला ने ब्राजील की चुनावी बाजी पलट दी.
लूला की जीत कैसे बनी ट्रंप प्रशासन की हार?
मित्रो, लूला की जीत ट्रंप प्रशासन की हार कैसे है. ये जानने से पहले आपको पता होना चाहिए कि नतीजों पर लूला के विरोधी का क्या कहना है. जीत के लिए आश्वस्त नज़र आ रहे फ्लावियो बोल्सोनारो ने नतीजों के बाद इसे मानने से इनकार कर दिया है. उन्होंने ये चुनाव रद्द करने की मांग की है. इसके लिए वो क़ानूनी मदद भी ले रहे हैं. लूला के विरोधी उम्मीदवार इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि मतदान के दौरान चुनाव का समय क्यों बढ़ाया गया. रविवार को चुनाव के दौरान वोटिंग का समय 2 घंटे बढ़ाया गया था. ये फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट के एक जज के आदेश पर दिया गया क्योंकि कुछ शहरों में ट्रांसपोर्ट की समस्या थी. इसके लिए लूला ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था.
माना जा रहा है कि इस फ़ैसले से ग़रीब और श्रमिक वर्ग के लोगों ने बड़ी संख्या में मतदान किया जिसका फ़ायदा लूला को मिला. लेकिन विरोधियों का कहना है कि जिस जज ने वोटिंग का समय बढ़ाने का फ़ैसला दिया था, सुप्रीम कोर्ट में उसकी नियुक्ति लूला ने ही की थी. इस आधार पर चुनाव के दूसरे चरण को रद्द करने की मांग की जा रही है. यानी ब्राज़ील में विपक्ष के नेता सुप्रीम कोर्ट पर सवाल उठा रहे हैं.
मित्रों, 2022 के चुनाव के बाद भी ऐसे हालात बने थे. उस वक़्त फ्लावियो बोल्सोनारो के पिता और तत्कालीन राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो ने अपनी हार मानने से इनकार कर दिया था. उनके समर्थकों ने ब्राज़ील की संसद, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति भवन पर हमले किए. बाद में उन्हें सैन्य तख्तापलट की साज़िश के आरोप में 27 साल क़ैद की सज़ा सुनाई गई. सज़ा होने की वजह से ही जायर बोल्सोनारो की जगह इस बार उनके बेटे चुनाव लड़ रहे थे.
अपने पिता की तरह फ्लावियो ने भी चुनाव परिणाम को खारिज कर दिया है. लेकिन ब्राज़ील की राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकारों का मानना है कि चुनाव रद्द करने के उनके प्रयास सफल नहीं होंगे. इसकी वजह ये है कि लूला की अपने विरोधी पर बढ़त बहुत ज़्यादा है. हालांकि इससे ब्राज़ील की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल ज़रूर उठेंगे.
मित्रों, ये चुनाव ब्राज़ील के लूला विरोधियों के साथ-साथ ट्रंप प्रशासन के लिए भी बड़ा झटका है. ट्रंप और लूला- एक दूसरे के कट्टर विरोधी हैं. अपने क़रीबी जायर बोल्सोनारो को सज़ा मिलने के बाद ट्रंप ने लूला पर दबाव बनाना शुरू कर दिया. इसी के तहत पिछले साल ब्राजील पर 50% टैरिफ लगा दिया था. ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ हटाने के बदले लूला सरकार के सामने जेल में बंद बोल्सोनारो को रिहा करने की शर्त रखी. चुनाव से कुछ सप्ताह पहले ट्रंप प्रशासन ने ब्राज़ील के चुनावी सिस्टम की जांच के बहाने अपने अधिकारियों को भेजने का प्रयास किया. लेकिन ब्राज़ील ने अमेरिकी अधिकारियों को इसकी इजाजत नहीं दी.
ट्रंप को उम्मीद थी कि लूला की हार के साथ ही लैटिन अमेरिका का सबसे बड़ा देश उनके हिसाब से चलने लगेगा. यही वजह है कि अपनी पसंद की सरकार बनाने के लिए उन्होंने पूरी कोशिश की. लेकिन अब नतीजों से साफ तौर पर पता चलता है कि ट्रंप के इन फैसलों का उल्टा असर हुआ. ब्राज़ील के लोगों ने ट्रंप की दखलंदाजी को अपने संप्रभुता पर हमले की तरह माना और एक बार फिर लूला को राष्ट्रपति चुनाव में जीत दिलाई.
मित्रो, हाल के दिनों में हंगरी के बाद ब्राजील दूसरा ऐसा देश है जहां जनता ने ट्रंप के क़रीबी को चुनाव में मात दी. हंगरी में तो अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे डी वेंस ने ट्रंप के समर्थक विक्टर ओरबान के लिए रैली भी की थी. लेकिन इसके बावजूद विक्टर की हार हुई. और अब लूला पहले दौर में पिछड़ने के बाद भी चुनाव जीत गए. ये जीत उनकी ग़रीब समर्थक नीतियों की तो है ही. साथ ही इसके जरिए ब्राजील के लोगों ने ट्रंप के ख़िलाफ़ भी अपनी नाराज़गी जताई है. मित्रों, लूला की जीत के बाद ट्रंप अभी तक ख़ामोश हैं. यहां तक कि उन्होंने लूला को जीत की बधाई भी नहीं दी है. लेकिन भारत, रूस, कनाडा और फ्रांस समेत कई देशों ने लूला को जीत पर शुभकामनाएं दी हैं. पीएम मोदी ने अपने बधाई संदेश में भारत-ब्राजील की दोस्ती और मज़बूत करने पर जोर दिया है.