Explained: दिवाली बाद दिल्ली में कराई जाएगी झमाझम बारिश.. आखिर कैसे होगी सीक्रेट आर्टिफिशियल रेन?
ये समझना जरूरी है कि सरकार की यह तैयारी क्या है. और बीच में 30 हजार मीटर की ऊंचाई पर क्या खेल हुआ है. साथ ही क्या सच में यह नकली बारिश हमारे फेफड़ों को बचा पाएगी. ये सब इसलिए भी चुपके से हो रहा है कि पिछली बार ट्रायल को लेकर काफी हल्ला मचा और कृत्रिम बारिश भी नहीं हो पाई.
दिल्ली की हवा का हाल फिर से वही हो गया है, जिसे सोचकर ही गले में खराश होने लगती है. हर साल की तरह इस बार भी दिवाली और छठ पूजा के पहले ही दिल्ली का AQI आसमान छूने लगा है. सड़कों पर इतना धुंध और स्मॉग है कि सुबह-सुबह इंडिया गेट देखना भी किसी टॉस्क से कम नहीं लग रहा.
लेकिन इस बार खबर यह है कि दिल्ली सरकार ने एक सीक्रेट प्लान तैयार किया है. अगर दिवाली और छठ के बाद पॉल्यूशन का लेवल बेकाबू होता है, तो दिल्ली में कृत्रिम वर्षा यानी आर्टिफिशियल रेन कराई जाएगी. मगर ये सब कैसे होगा?
एयरपोर्ट के पास हुए 2 सीक्रेट ट्रायल!
असल में दिवाली से ठीक पहले जब दिल्ली का AQI 'बहुत खराब' (Very Poor) से 'गंभीर' (Severe) कैटगरी में पहुंचने लगा, तो सरकार ने बैकग्राउंड में काम शुरू कर दिया. जानकारी के मुताबिक पिछले 15 दिनों के अंदर दिल्ली सरकार ने दिल्ली एयरपोर्ट के पास क्लाउड सीडिंग के दो ट्रायल पूरे कर लिए हैं. न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक दिल्ली सरकार के एक अधिकारी ने इस बात की पुष्टि की है.
इस बार सबसे खास बात यह रही कि ये ट्रायल लगभग 30,000 मीटर की ऊंचाई पर किए गए. अगर पिछले साल की बात करें तो उस समय क्लाउड सीडिंग का ट्रायल सिर्फ 10,000 मीटर की ऊंचाई पर हुआ था. इस बार तीन गुना ज्यादा ऊंचाई से बादलों को ट्रिगर करने की तैयारी है ताकि बारिश का असर ज्यादा इलाके में हो सके.
दिल्ली का AQI रेड जोन में: जहांगीरपुरी में सांस लेना दूभर
अगर आप सोच रहे हैं कि बारिश की क्या जरूरत है, तो जरा दिल्ली के ताजा आंकड़े देख लीजिए. इस समय दिल्ली का ओवरऑल AQI 367 के आसपास है, जो 'वेरी पुअर' कैटगरी में आता है.
लेकिन कुछ इलाके ऐसे हैं जहां हवा इतनी जहरीली हो चुकी है कि वहां रहना किसी चैंबर में रहने जैसा है.
जहांगीरपुरी (नॉर्थ दिल्ली): यहां AQI का स्तर 459 दर्ज किया गया, जो 'सीवियर' यानी बेहद खतरनाक है.
IIT दिल्ली और पंजाबी बाग: यहां भी AQI 445 के पार पहुंच चुका है.
इस पॉल्यूशन में सबसे खतरनाक विलेन साबित हो रहा है PM2.5, जो सीधे हमारे फेफड़ों में घुसकर जम जाता है. सुबह के वक्त विजिबिलिटी इतनी गिर गई है कि गाड़ियों की रफ्तार धीमी हो चुकी है और लोगों को आंखों में जलन और सांस लेने में तकलीफ महसूस हो रही है.
लगे हाथ आसान भाषा प्रदूषण में PM का मतलब समझ लीजिए
पीएम यानि कि Particulate Matter एक कणिकीय पदार्थ होता है. ये हवा में तैरने वाले धूल, धुएं, मिट्टी और रसायनों के अत्यंत सूक्ष्म ठोस कणों और तरल बूंदों का मिश्रण है. इन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है.
PM 10 (मोटे कण, जिनका आकार 10 माइक्रोन तक होता है और ये धूल या कंस्ट्रक्शन से पैदा होते हैं) और
PM 2.5 (बेहद महीन कण, जिनका आकार 2.5 माइक्रोन या उससे कम होता है और ये वाहनों, फैक्ट्रियों व पटाखों के धुएं से निकलते हैं.
ये कण इतने बारीक होते हैं कि मानव बाल की चौड़ाई में भी PM 2.5 के करीब 30 कण समा सकते हैं, जिसके कारण ये सांस लेते समय सीधे हमारे शरीर के अंदर प्रवेश कर जाते हैं.
अब इसे ग्राफिकल फॉर्म में समझिए कैसे नुकसान होता है-
आखिर क्या होती है कृत्रिम बारिश (Cloud Seeding)?
जब कुदरती तौर पर बारिश नहीं हो रही होती और हवा में नमी वाले बादल मौजूद होते हैं, तब बादलों पर सिल्वर आयोडाइड (Silver Iodide), सूखी बर्फ (Dry Ice) या नमक के केमिकल्स छिड़के जाते हैं. यह काम हवाई जहाजों, रॉकेट्स या जमीन पर लगी मशीनों के जरिए किया जाता है.
जब ये केमिकल्स बादलों के संपर्क में आते हैं, तो बादलों के अंदर मौजूद पानी की छोटी-छोटी बूंदें आपस में जुड़कर भारी हो जाती हैं और बारिश बनकर जमीन पर गिरने लगती हैं. इसी प्रोसेस को क्लाउड सीडिंग या आर्टिफिशियल रेन कहते हैं. इसका इस्तेमाल दुनिया भर में सूखा मिटाने, ओलावृष्टि रोकने और स्मॉग साफ करने के लिए किया जाता है.
अब सवाल यह है क्या नकली बारिश से पॉल्यूशन हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा?
ये भी सवाल लाजिमी है कि क्या यह बारिश दिल्ली के प्रदूषण का पक्का और परमानेंट इलाज है? एक्सपर्ट्स की मानें तो जवाब है - नहीं. एनवायरमेंट पर काम कर रहे एक्सपर्ट रोहिन कुमार का कहना है कि क्लाउड सीडिंग कोई परमानेंट सॉल्यूशन नहीं है. बस वही फौरी तौर पर राहत जरूर मिल सकती है..
यह सिर्फ एक इमर्जेंसी ब्रेक की तरह है. जब दिवाली के अगले दिन या किसी बेहद खराब दिन पॉल्यूशन का लेवल अचानक से क्रिटिकल हो जाए, तो बारिश करवाकर धुएं को कुछ दिनों के लिए नीचे बैठाया जा सकता है. लेकिन जब तक हम प्रदूषण के असली कारणों (जैसे गाड़ियाँ, पराली, कंस्ट्रक्शन की धूल) को बंद नहीं करेंगे, तब तक समस्या का पक्का समाधान नहीं होगा.
सुप्रीम कोर्ट का आदेश: दिवाली पर पटाखों का क्या होगा?
दिवाली से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी पटाखों को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने 7 और 8 नवंबर को दिल्ली-NCR में केवल प्रमाणित ग्रीन पटाखे (Green Crackers) चलाने की इजाजत दी है.
कोर्ट ने पटाखों का समय भी तय कर दिया है:
- सुबह: 6:00 बजे से 7:00 बजे तक
- रात: 8:00 बजे से 10:00 बजे तक
9 नवंबर से पटाखों पर फिर से पूरी तरह से बैन लग जाएगा. सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि डेटा की कमी के कारण सीधे तौर पर पटाखों को ही इकलौता जिम्मेदार मानकर पूरी तरह से बैन लगाना फिलहाल सही रास्ता नहीं है.
उधर पहले से ही दिल्ली में लागू है GRAP-2:
हवा की बिगड़ती हालत को देखते हुए 'कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट' ने पूरे दिल्ली-NCR में ग्रैप का दूसरा चरण (GRAP Stage II) लागू कर दिया है. इसके तहत कई कड़े नियम लागू हो चुके हैं:
1. धूल उड़ाने वाले कंस्ट्रक्शन और तोड़फोड़ पर रोक: सभी बड़े निर्माण कार्यों पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई है (सिर्फ जरूरी प्रोजेक्ट्स को छोड़कर).
2. डीजल जनरेटर पर बैन: इमर्जेंसी सर्विस को छोड़कर बाकी जगह डीजल जनरेटर चलाने पर रोक है.
3. सड़कों की पानी से धुलाई: सड़कों पर धूल को उड़ने से रोकने के लिए मशीनों से सफाई और पानी का छिड़काव तेज कर दिया गया है.
4. पार्किंग चार्ज दोगुना: प्राइवेट गाड़ियों के इस्तेमाल को कम करने के लिए पार्किंग फीस 2 गुना बढ़ा दी गई है.
5. पब्लिक ट्रांसपोर्ट की फ्रीक्वेंसी बढ़ी: बस और मेट्रो के चक्कर बढ़ा दिए गए हैं ताकि लोग अपनी गाड़ियों के बजाय मेट्रो और बस का इस्तेमाल करें.
6. बाहरी गाड़ियों पर सख्ती: गैर-BS-VI डीजल वाहनों की दिल्ली में एंट्री पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं.
तो क्या इस बार दिवाली के बाद साफ हवा मिलेगी?
दिल्ली सरकार के 30 हजार मीटर की ऊंचाई पर किए गए दो ट्रायल चर्चा में हैं. ऐसे में प्रशासन इस बार रिस्क लेने के मूड में नहीं है. अगर दिवाली और छठ के बाद प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा को पार करता है, तो आसमान से नकली बारिश की बौछारें देखने को मिल सकती हैं. ऐसे में प्रदूषण का लेवल कुछ कम होने की उम्मीद की जा रही है.
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