)
एक कहावत है नाम में क्या रखा है. मगर कई बार नाम से ही पहचान बन जाती है. काम और नाम एक साथ ही चलते हैं. दिल्ली में एक चौराहा ऐसा है जहां नाम की ही पूरी कहानी छिपी है. करीब 40 साल तक जिस चौराहे को लोग दुर्गा चौक कहते रहे आज उसी जगह पर पहुंचकर पूछिए तो कई लोग बिना सोचे कहेंगे कि ये दुर्गा चौक नहीं मुर्गा चौक है. सरकारी कागज अब भी उसे दुर्गा चौक बताते हैं और पुराने दुकानों के नाम भी उसी पहचान को संभाले हुए हैं, लेकिन सड़क पर लोगों की जुबान ने उसका नाम बदल दिया है. आप उस जगह के लिए ऑटो लेंगे, कैब की सवारी करेंगे तो आपको मुर्गा चौक ही बताना पड़ेगा. तब आप उस जगह पहुंच पाएंगे. आखिर ये सब कैसे हुआ. क्या ये कहानी दिल्ली के बदलते मोहल्लों की एकमात्र कहानी है?
असल में ये चौराहा वेस्ट दिल्ली में उत्तम नगर के विकास नगर में मौजूद है. ये कोई छोटा-मोटा चौराहा नहीं है. यहां बाकायदा कॉलोनियां बसी हुई हैं. इसकी पहचान को लेकर अजीब सा कन्फ्यूजन है. करीब 40 साल से इस चौराहे को दुर्गा चौक कहा जाता रहा है. यहां आज भी जय दुर्गा क्लीनिक, जय दुर्गा ज्वेलर्स और जय दुर्गा मेडिकोज जैसी दुकानों के नाम इसकी पुरानी पहचान की गवाही देते हैं. लेकिन अब इसी जगह को लोग 'मुर्गा चौक' के नाम से जानने लगे हैं. नाम भी बदल गया है और लोगों की जुबान बदल गई है. साथ ही इस चौराहे पर काम भी बदल गया है.
इस चौराहे पर पहुंचने के बाद यहां की दोहरी पहचान साफ दिखती है. किसी स्थानीय व्यक्ति से रास्ता पूछिए तो वह मुर्गा चौक बता देता है. कैब बुक करनी हो तो लोग मुर्गा चौक लिख देते हैं. आसपास की कई दुकानों के पते में भी यही नाम इस्तेमाल होने लगा है. दूसरी तरफ सरकारी पहचान अब भी दुर्गा चौक की है. आधार कार्ड और वोटर कार्ड में भी इसी नाम का इस्तेमाल होता है. यहां के मौजूदा स्थानीय पार्षद ने जरूर बोर्ड पर Durga Chauk लिखवा रखा है.
इसी चौराहे के पास अपने घर में रहने वाले और MCD से रिटायर सीनियर राज बहादुर बताते हैं कि करीब 40 साल पहले इस जगह को दुर्गा चौक ही कहा जाता था. उस समय आज जैसी चिकन की दुकानों की लाइन नहीं थी. चौराहे की पहचान दुर्गा चौक के तौर पर ही थी और आसपास रहने वाले लोग इसी नाम से इसे जानते थे.
राज बहादुर के मुताबिक कुछ साल पहले यहां नसीम चिकन शॉप के नाम से पहली चिकन की दुकान खुली. इसके आसपास धीरे-धीरे चिकन की और दुकानें खुलती चली गईं. समय के साथ स्थिति ऐसी हो गई कि आज चौराहे पर चिकन की दुकानें ज्यादा दिखाई देती हैं. स्थानीय लोगों के मुताबिक इसी बदलाव के साथ लोगों की बातचीत में दुर्गा चौक के साथ मुर्गा चौक नाम भी चलने लगा.
नसीम चिकन शॉप को लेकर भी इस कहानी में एक दिलचस्प बात सामने आती है. दुकान पर काम करने वाले एक लड़के से जब पूछा गया कि यह दुकान कितनी पुरानी है और इसके खुलने के बाद इलाके में नाम कैसे बदला, तो उसने पहले बात करने से इनकार कर दिया. दोबारा पूछने पर उसका जवाब था कि उसे इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है. उसे बस इतना पता है कि दुकान काफी पुरानी है और यह जगह मुर्गा चौक के नाम से जानी जाती है.
यानी जिस दुकान को स्थानीय लोग इस बदलाव की शुरुआत से जोड़कर देखते हैं, उसकी मौजूदा पीढ़ी को भी इस नाम की पूरी कहानी नहीं मालूम है या बताना नहीं चाहता है. चौराहे की पुरानी पहचान को वहां मौजूद दुकानों के नाम से भी समझा जा सकता है. जय दुर्गा क्लीनिक, जय दुर्गा ज्वेलर्स और जय दुर्गा मेडिकोज जैसे नाम आज भी उसी पुराने नाम को अपने साथ लिए हुए हैं. ये नाम बताते हैं कि दुर्गा चौक कोई हाल में दिया गया नाम नहीं था.
इलाके में लंबे समय से कारोबार करने वाले लोगों के लिए यह नाम उनकी दुकान और इलाके दोनों की पहचान का हिस्सा रहा है. इसी चौराहे पर करीब 35 साल से क्लीनिक चला रहे डॉक्टर आरपी शर्मा भी इस बदलाव के गवाह हैं. उनका कहना है कि शुरुआत में एक चिकन की दुकान खुली और उसके बाद धीरे-धीरे ऐसी कई दुकानें आती गईं. वह इस बदलाव को अपने अंदाज में समझाते हैं, 'एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है.' उनके मुताबिक एक दुकान खुलने के बाद जिस तरह आसपास इसी तरह की और दुकानें आती गईं, उससे चौराहे की पहचान भी बदलती चली गई.
यहां चिकन दुकानदारों का कारोबार अब इस चौराहे की नई पहचान का हिस्सा बन चुका है. उनके लिए नाम बदलने की यह कहानी उतनी महत्वपूर्ण नहीं है. चिकन की दुकानों वाली लाइन में एक दुकानदार ने अपना नाम बताने से इनकार करते हुए सिर्फ इतना कहा, 'भाई, हमको बिक्री से मतलब है. आप चाहे जिस नाम से इस चौक को बुलाएं, हमें कोई लेना-देना नहीं है.'
इस एक जवाब में इस बदलाव का एक दूसरा पहलू भी दिखाई देता है. जिस नाम को लेकर स्थानीय लोगों के बीच नाराजगी बनी रहती है. कारोबार करने वाले कई लोगों के लिए उससे ज्यादा जरूरी रोज का कारोबार है.
विकास नगर के ही बी ब्लॉक से जुड़े रहे RWA के पूर्व अध्यक्ष और रियल एस्टेट का काम करने वाले सुभाष शर्मा भी इस चौराहे को उसके पुराने दौर से जानते हैं. उनके मुताबिक शुरुआत में यह दुर्गा चौक ही था. बाद में इलाके में बदलाव आया और चिकन की दुकानें बढ़ती गईं. उनका कहना है कि पहले चौराहे के आसपास कई सौ मीटर तक मुस्लिम आबादी बहुत कम थी, लेकिन समय के साथ कई मकानों के मालिक बदले और मुस्लिम परिवार भी यहां रहने आए.
उनके मुताबिक इसी दौरान चिकन की दुकानों की संख्या भी बढ़ती गई. और अब पूरे चौराहे पर चिकन शॉप ही दिखती हैं. उनका कहना है इसलिए चौराहे के उस तरह बहुत बदबू भी आती रहती हैं. हालांकि आबादी का आंकड़ा कितना बढ़ा, इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है. ये भीड़भाड़ वाला चौराहा है. उनका कहना है इसके बावजूद भी किसी का ध्यान इस तरफ नहीं जा रहा है. सुभाष शर्मा आगे चलकर बी ब्लॉक के प्रधान भी बने.
यहां एक सवाल उठता है कि आखिर किसी जगह की पहचान तय कौन करता है? सरकारी दस्तावेज या उस जगह पर रोज आने-जाने वाले लोग? इस चौराहे का मामला इस सवाल को और दिलचस्प बना देता है. तमाम कागजों में अभी भी दुर्गा चौक है. कई आधार कार्ड और वोटर कार्ड में भी यही नाम मिलता है. स्थानीय पार्षद के बोर्ड पर भी यही नाम दर्ज है. लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में जब लोग कैब बुक करते हैं, किसी को रास्ता बताते हैं या दुकान का पता बताते हैं, तो मुर्गा चौक नाम ज्यादा आसानी से इस्तेमाल होता दिखाई देता है.
यानी यह नाम किसी एक दिन आधिकारिक तौर पर बदला हुआ नहीं दिखता. यह लोगों की बातचीत से धीरे-धीरे निकला और फिर इतना आम हो गया कि दुकानों के पतों तक पहुंच गया. यही इस चौराहे की कहानी है. क्या किसी जगह की पहचान हमेशा सरकारी बोर्ड से तय नहीं होती. क्या शहर अपने हिसाब से भी जगहों के नाम रख देता है? ये बड़ा सवाल है. फिर वही नाम लोगों की रोजमर्रा की भाषा में स्थायी होता चला जाता है.
पुराने लोगों के लिए इस बदलाव को स्वीकार करना आसान नहीं है. 35-40 साल से इस जगह को दुर्गा चौक के नाम से देखने वाले लोग आज भी पुराने नाम का इस्तेमाल करते हैं. जिन लोगों ने पिछले डेढ़ दशक में इलाके को बदला हुआ देखा है, उनके लिए मुर्गा चौक ज्यादा जाना-पहचाना नाम बन चुका है. चौराहे पर दिखने वाले कई युवाओं से बात की गई तो वो मुर्गा चौक ही बताते हैं.
एक लड़के से ये पूछा गया कि ये पहले तो दुर्गा चौक था. अब मुर्गा चौक कैसे बन रहा है तो उसने जवाब दिया कि अब ज्यादातर दुकानों के पतों में मुर्गा चौक लिखा है. इसलिए सब मुर्गा चौक ही कहते हैं. उसने भी यही कहा कि कैब बुक करते समय भी लोग मुर्गा चौक का ही इस्तेमाल करते हैं. फिलहाल करीब 40 साल की पुरानी पहचान और करीब 15 साल के बदलाव के बीच आज यह चौराहा अभी दोनों नाम के साथ चल रहा है.
स्थानीय ऑनलाइन रिकॉर्ड भी इस दोहरी पहचान की पुष्टि करते हैं. BSES के एक दस्तावेज में इसी इलाके को 'Durga Chowk & Murga Chowk' के तौर पर दर्ज किया गया है. वहीं MCD की एक ऑनलाइन लिस्टिंग में 'Murga Chauk, Vikas Vihar' पता दर्ज है. यानी लोगों की जुबान से निकला नाम अब अलग-अलग सार्वजनिक रिकॉर्ड में भी दिखाई देने लगा है. इंटरनेट पर उपलब्ध अन्य स्थानीय लिस्टिंग में भी Murga Chowk Bus Stop और Murga Chowk के पते मिलते हैं. कुछ कारोबारी पते में इसे सीधे इस्तेमाल कर रहे हैं.
चौराहे के आसपास रहने वाले लोगों के लिए अब यही सबसे बड़ा कन्फ्यूजन है कि आखिर इसे कहा क्या जाए. नए लोग जो किरायेदार आते हैं वो ज्यादा कंफ्यूज रहते हैं कि दुर्गा चौक या मुर्गा चौक कहा जाए? लंबे समय से गली नंबर चार में रहने वाली मदर्स विजन की प्रिंसिपल माधुरी पांडे भी इसी सवाल की तरफ इशारा करती हैं. उनका कहना है कि आसपास की तमाम दुकानें अब अपने पते में मुर्गा चौक का नाम लिखने लगी हैं.
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि दुर्गा चौक सही है या मुर्गा चौक. सवाल यह भी है कि किसी शहर में किसी जगह की असली पहचान आखिर बनती कैसे है. इस चौराहे के मामले में जवाब दो हिस्सों में बंटा हुआ है. दस्तावेज और पुराने दुकानदार भी दुर्गा चौक कहते हैं. लेकिन लोगों की जुबान पर मुर्गा चौक है. एक ही चौराहा है, दो नाम हैं और दोनों नामों के पीछे की अपनी कहानी है. अब यहां के रहने वालों को तय करना है कि इसका सही नाम क्या है