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दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव फिर चर्चा में है. तारीखों का ऐलान पहले ही हो चुका है. विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से जारी शेड्यूल के मुताबिक 10 सितंबर को नामांकन की आखिरी तारीख होगी, 18 सितंबर 2026 को वोटिंग होगी और 19 सितंबर को मतगणना के बाद नतीजे आएंगे. दिन की कक्षाओं वाले छात्रों के लिए वोटिंग सुबह 8:30 से दोपहर 1 बजे तक और शाम की कक्षाओं वालों के लिए दोपहर 3 बजे से शाम 7:30 बजे तक होगी. इसी कड़ी में हम इस चुनाव के इतिहास से जुड़ी मजेदार रोचक जानकारियों की चर्चा कर रहे हैं. अभी तक डीयू चुनाव के इतिहास में सिर्फ 11 महिलाएं ही अध्यक्ष बन पाई हैं.
असल में डेढ़ लाख से ज्यादा छात्रों और 90 से अधिक कॉलेजों वाला दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ देश के सबसे बड़े छात्रसंघों में गिना जाता है. इस कैंपस की राजनीति ने कई बार ऐसे संकेत दिए कि यहां के लीडर्स आगे चलकर राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका में होते हैं. अरुण जेटली जैसे नाम उदाहरण हैं. मगर क्या कारण है कि इस छात्रसंघ के 70 से ज्यादा साल के इतिहास में अध्यक्ष पद पर अब तक सिर्फ 11 महिलाएं ही पहुंच पाई हैं. वो महिलाएं कौन कौन हैं.
डूसू की पहली महिला अध्यक्ष बनने का किस्सा भी दिलचस्प है. 1989-90 में अंजू सचदेवा ने यह मुकाम हासिल किया था. वे शुरू में ABVP से टिकट चाहती थीं. मगर पार्टी ने उनकी दावेदारी कमजोर मानकर टिकट देने से इनकार कर दिया. इसके बाद अंजू ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और ABVP के ही प्रत्याशी को हराकर अध्यक्ष पद जीत लिया.
इसके बाद के सालों में कई और महिलाओं ने यह कुर्सी संभाली. 1993-94 में मोनिका अरोरा अध्यक्ष बनीं. वो पहले सचिव रह चुकी थीं और बाद में सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने लगीं. 1994-95 में NSUI से शालू मलिक अध्यक्ष चुनी गईं, जिन्होंने बाद में MCD चुनाव भी लड़ा. 1995-96 में सेंट स्टीफेंस कॉलेज की अलका लांबा NSUI से अध्यक्ष बनीं. जिन्होंने आगे चलकर दिल्ली विधानसभा चुनाव भी लड़ा. अलका लांबा आज दिल्ली कांग्रेस की बड़ी नाम हैं और महिला बिग्रेड की अगुआ भी हैं.
इसके बाद साल आया 1996-97 का जब डूसू अध्यक्ष बनने वाली महिला ने आज के दौर में अपनी पहचान बनाई है. रेखा गुप्ता जो फिलहाल दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं. वे ABVP से जुड़ी थीं और डूसू अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने छात्र हितों से जुड़े मुद्दे उठाए. अध्यक्ष पद के बाद उन्होंने 2007 में पीतमपुरा से पार्षद का चुनाव जीता और धीरे-धीरे बीजेपी में आगे बढ़ती गईं.
2000 के दशक में भी कुछ महिलाओं ने डूसू अध्यक्ष पद जीता. 1999-2000 में ऋतु वर्मा और 2001-02 में नीतू वर्मा अध्यक्ष बनीं. दोनों ने अध्यक्ष रहते हुए ही निगम पार्षद का चुनाव भी जीत लिया था. 2005-06 में रागिनी नायक अध्यक्ष चुनी गईं. रागिनी नायक भी इस समय दिल्ली कांग्रेस के बड़े चेहरों में शुमार हैं. 2006-07 में अमृता धवन, 2007-08 में अमृता बहरी के नेतृत्व में NSUI ने जीत दर्ज की. इसके एक साल बाद 2008-09 में ABVP की नुपुर शर्मा ने NSUI की सोनिया सप्रा को हराकर अध्यक्ष पद जीता.
नुपुर शर्मा डूसू की आखिरी महिला अध्यक्ष हैं. यानी पिछले 17 साल से कोई महिला यह पद नहीं जीत पाई है. महिलाओं की यह कम भागीदारी सिर्फ इत्तेफाक नहीं है. दिल्ली हाईकोर्ट में इस मुद्दे पर एक याचिका भी दायर हो चुकी है. जिसमें डूसू चुनावों में महिलाओं को 50% आरक्षण देने की मांग की गई थी. याचिकाकर्ता का कहना था कि डूसू चुनाव पैसे और ताकत से बुरी प्रभावित होते हैं, जिसका सीधा नुकसान महिला उम्मीदवारों की भागीदारी को होता है.
उनका मानना है कि प्रचार में बड़े खर्च, गाड़ियों के काफिले और भीड़ जुटाने जैसी चीजें ज्यादातर पुरुष उम्मीदवारों के पक्ष में जाती हैं. इसके अलावा छात्र संगठन भी अक्सर अध्यक्ष पद के लिए पुरुष उम्मीदवारों को ही प्राथमिकता देते हैं. जबकि महिलाओं को संयुक्त सचिव जैसे पदों पर ज्यादा उतारा जाता है.

फिलहाल अब सबकी निगाहें 18 सितंबर 2026 पर टिकी हैं. 2025 के चुनाव में भी दो प्रमुख छात्र संगठनों ने अध्यक्ष पद के लिए महिला उम्मीदवार उतारी थीं. लेकिन जीत नहीं मिल सकी थी. देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस बार 17 साल का यह सूखा टूटेगा और क्या डूसू को 12वीं महिला अध्यक्ष मिलेगी.