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Blog: दिल्ली में प्रदूषण से जंग या आम आदमी पर पाबंदियों का बोझ?

दिल्ली सरकार की शीतकालीन प्रदूषण कार्ययोजना रोकथाम से ज्यादा पाबंदियों पर निर्भर नजर आती है. ग्रैप का मकसद आपात स्थितियों से निपटना था, न कि स्थायी समाधान बनना था.

Written By Amit Singh
Published: Oct 22, 2026, 03:43 PM IST | Updated: Oct 22, 2026, 03:48 PM IST
Image Credit: Delhi Pollution File Photo from ZEE Media Archive
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अक्टूबर ढलते ही दिल्ली की सुबहें बदलने लगती हैं. हवा भारी हो जाती है और आसमान पर मटमैली परत चढ़ने लगती है. बुजुर्ग खांसते हैं. बच्चे आंखें मलते हैं. फिर वही पुराना सवाल लौट आता है. इस साल हमने अलग क्या किया?

अच्छी खबर यह कि इस साल दिल्ली सरकार का प्लान आ गया है. जाड़े के जहरीले धुएं से निपटने की कार्ययोजना घोषित हो चुकी है. पहली नजर में यह राहत जैसा लगता है. लेकिन परतें खोलिए तो तस्वीर बदल जाती है.

इस योजना में रोकथाम कम है. रोक-टोक ज्यादा है. प्रदूषण पर लगाम कसने के बजाय शहर की रफ्तार पर लगाम कस दी गई है.

पाबंदी का बोझ आम आदमी पर

योजना का मिजाज सीधा है. हालात बिगड़ें तो काम-काज थाम दो. नवंबर से जनवरी तक प्रदूषण बढ़ने पर दफ्तरों को आधी क्षमता पर चलाने का निर्देश इसी सोच से निकला है. यानी धुआं हटाने की जिम्मेदारी सरकार के हाथ से फिसलकर नागरिक की झोली में आ गिरी है.

यह सच है कि गाड़ियां हवा बिगाड़ती हैं. दिल्ली की सड़कों पर कार और स्कूटर-बाइक का हुजूम प्रदूषण की बड़ी वजह है. इसे कोई नकार नहीं सकता है. लेकिन रोज दफ्तर जाने वाला आदमी क्या करे? उसके सामने रास्ता कौन सा है?

बस हर जगह के लिए पर्याप्त नहीं है. मेट्रो हर मोहल्ले तक पहुंचती नहीं है. साइकिल चलाने को सुरक्षित लेन नहीं है. पैदल चलने को ढंग का फुटपाथ नहीं है.

ऐसे में निजी वाहन छोड़ने की सलाह महज उपदेश बनकर रह जाती है. कायदे से पहले विकल्प खड़े किए जाते, फिर पाबंदी लगती है. लेकिन यहां क्रम उलट दिया गया है.

तीन महीने की यह बंदिश कागज पर सख्त दिखती है. मगर इसका असर उसी पर पड़ेगा जो पहले से तंग विकल्पों में जी रहा है. यानी आम आदमी पर.

गौरतलब है कि जब पूरा ढांचा कमजोर हो तब आदेश से आदतें नहीं बदलतीं. बदलाव के लिए पहले सुविधा चाहिए. लोग नियम तब मानते हैं, जब मानने का कोई सीधा रास्ता उनके सामने हो.

ग्रैप का असली मकसद क्या था

पहले ग्रैप यानी ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान पर बात कर लेते हैं. आज इसे ऐसे पेश किया जाता है कि मानो यही प्रदूषण की दवा हो. लेकिन इसकी असल कहानी अलग है.

बात 2016 की है. तब एनसीआर के लिए पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम एवं नियंत्रण) प्राधिकरण, यानी ईपीसीए, काम करता था. उसकी जवाबदेही सीधे देश की सबसे बड़ी अदालत के प्रति थी.

इसी संस्था ने स्मॉग के आपातकाल से निपटने का यह ढांचा अदालत के सामने रखा था. बता दें कि दिसंबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने एमसी मेहता बनाम भारत संघ मामले में दिल्ली-एनसीआर के लिए प्रदूषण नियंत्रण योजना को मंजूरी दी थी.

12 जनवरी 2017 को केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इसे आधिकारिक तौर पर अधिसूचित कर लागू कर दिया था.

इसमें 'ग्रेडेड' शब्द यूं ही नहीं जुड़ा था. हवा जितनी बिगड़ती है, पाबंदियां उतनी कड़ी होती जातीं हैं.

ध्यान दीजिए, यह इमरजेंसी ब्रेक था. गाड़ी चलाने का तरीका नहीं था. इसे जमीनी कार्रवाई की जगह लेने के लिए कभी नहीं गढ़ा गया था.

उसी दौर में ईपीसीए ने एक और मसला उठाया. राजधानी को पार कर दूसरे राज्यों तक जाने वाले ट्रक और भारी व्यावसायिक वाहन शहर की हवा में खूब जहर घोलते थे. अदालत ने ऐसी गाड़ियों की एंट्री पर प्रदूषण टैक्स ठोक दिया.

साथ ही केंद्र पर दबाव डाला कि वैकल्पिक बाईपास एक्सप्रेसवे का काम तेज करे. अगले दो साल में और भी कड़े फैसले आए. बीएस-6 ईंधन और वाहन तकनीक को जल्दी अपनाना उन्हीं में शामिल था.

तब सोच साफ थी. संकट के दिनों में रोक लगाई जाएगी. बाकी दिनों में प्रदूषण के रोकथाम पर काम किया जाएगा.

अदालत को कीमत पता थी

ग्रैप को मंजूरी देते वक्त अदालत के सामने इसके नफे-नुकसान साफ थे. उसे पता था कि पाबंदियों का झटका किस-किस पर पड़ेगा. स्कूल बंद हों तो बच्चों की पढ़ाई का नुकसान होता है. यह फैसला हल्के में लेने लायक नहीं था.

इसीलिए केंद्र ने 2017 में जो मूल ग्रैप अधिसूचित किया, उसमें स्कूलों की छुट्टी आखिरी पायदान पर रखी गई. यह कदम तभी उठता, जब हवा की गुणवत्ता 'गंभीर' दर्जे में फिसल जाए.

भारी वाहनों की एंट्री रोकने और निजी गाड़ियों के चलने पर बंदिश लगाने का अधिकार भी सरकारों के पास था. लेकिन शर्त एक ही थी. इनका इस्तेमाल तभी हो, जब कोई चारा न बचे.

बाकी दिनों में सरकारों का काम ठोस कदम उठाना था. ऐसे कदम, जिनसे अगली सर्दी में इन आपातकालीन नुस्खों की जरूरत ही न पड़े.

एक सोच और थी. आम लोगों की असुविधा सरकारों के लिए अलार्म का काम करे. जब शहर ठहरता है तो नेताओं और अफसरों पर साल भर मेहनत का दबाव बनता है.

ठहरा हुआ शहर किसी सरकार की उपलब्धि नहीं होता है. वह उसकी चूक का सबूत होता है.

सरकार का खोखलापन

सरकार चाहे तो कह दे कि वह इसी रास्ते पर है. कागज पर ऐसा दावा चमकदार भी लगेगा. मगर कसौटी कागज नहीं, जमीन होती है.

और जमीन पर वह जिद नजर नहीं आती जो इस पूरे इलाके की हवा सुधारने के लिए जरूरी है. कदम अधूरे मन से उठाये लगते हैं. सरकार का इरादा कमजोर दिखता है.

हम ऐसा क्यों कह रहे हैं. एक-दो उदाहरण से समझाते हैं.

सड़कों पर गाड़ियों का सैलाब

आज भी दिल्ली की सड़कों पर गाड़ियों का सैलाब नजर आता है. इसे रोकने के लिए सरकार को सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करने की समयबद्ध योजना बनानी चाहिए थी. खास बात यह कि इसके दायरे में सिर्फ दिल्ली नहीं, पूरा एनसीआर को लाना था.

अब हालात देखिए. विभिन्न रिपोर्ट्स और परिवहन विभाग के अनुसार, दिल्ली को सुचारू परिवहन और भीड़ कम करने के लिए अब करीब 11,000 बसों की जरूरत है. राजधानी में अभी सिर्फ 6,840 बसें चल रही हैं.

एनसीआर के दूसरे शहरों की हालत और पतली है. वहां आपसी कनेक्टिविटी लगभग नदारद है. साधनों के बीच तालमेल भी नहीं है.

दिल्ली सरकार बस बेड़े को बिजली पर लाना चाहती है. यह इरादा तारीफ के काबिल है. मगर सिर्फ बेड़ा बदलने से काम नहीं चलेगा.

बसें तब भरेंगी, जब लोगों को भरोसा हो. उन्हें लगे कि बस दफ्तर समय पर पहुंचा देगी. घर के पास से मिलेगी और रास्ते में दगा नहीं देगी.

इसी भरोसे के दम पर कोई अपनी कार की चाबी दराज में रखता है. वह भरोसा बनाने की योजना कहां है?

फैक्ट्रियों की चिमनियां

दिल्ली के भीतर और आसपास की बिना मंजूरी वाली बस्तियों में चलने वाली फैक्ट्रियां प्रदूषण का बड़ा स्रोत हैं. इन्हें कोयला छोड़ने के लिए कहा गया है. आदेश निकल गया सो फर्ज पूरा मान लिया गया. अमल की कोशिश नाम भर की है.

यहां भी वही तर्क लागू होता है. छोटे कारखाने वाले से कोयला छुड़वाना है तो उसे विकल्प चाहिए. उसे सस्ती बिजली या प्राकृतिक गैस उपलब्ध कराई जाय. विकल्प हाथ में हो तो सख्ती जायज है. न हो तो आदेश फाइलों में बना रहता है और चिमनी धुआं उगलती रहती है.

सूची और लंबी खींची जा सकती है. लेकिन शिकायत की जड़ एक ही है. प्रदूषण का ग्राफ नीचे लाने के लिए बड़े पैमाने पर काम नहीं हो रहा.

जो हो रहा है, उसमें सख्ती कम है और समय-सीमा का तो जिक्र ही नहीं है. इसी वजह से यह योजना पढ़कर उम्मीद कम और झुंझलाहट ज्यादा होती है.

हर साल सर्दी आएगी. हर साल धुआं भी आएगा. सवाल यह नहीं कि सरकार कितनी बार शहर को रोक सकती है. सवाल यह है कि वह कितने सालों तक शहर को रोके बिना दिल्ली को सांस लेने दे सकती है.

इसे भी पढ़ें- दिल्ली-NCR में GRAP-1 लागू; प्रदूषण पर लगाम की तैयारी, जानिए किन गतिविधियों पर रहेगी रोक

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About the Author

अमित सिंह देश के वरिष्ठ पत्रकारों और डिजिटल मीडिया संपादकों में शामिल हैं. राजनीति, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक नीति और सामाजिक मुद्दों पर लेखन का उन्हें 18 वर्षों से अधिक का अनुभव है. अपने लंबे पत्रकारिता करियर में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विषयों की रिपोर्टिंग, विश्लेषण और संपादकीय नेतृत्व किया है. उनकी पहचान तथ्यों पर आधारित, संतुलित और गहन विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. वर्तमान में अमित सिंह Zee News की हिंदी वेबसाइट के संपादक हैं. इस भूमिका में वे संपादकीय दिशा तय करने, विशेष कवरेज की रणनीति बनाने और डिजिटल न्यूज़रूम के संचालन का नेतृत्व करते हैं.पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए अमित को देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक Ramnath Goenka Excellence in Journalism Awards से सम्मानित किया जा चुका है. यह सम्मान उनकी पेशेवर विश्वसनीयता, खोजी दृष्टि और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर प्रभावशाली पत्रकारिता का प्रमाण है.अमित ने अपने करियर के दौरान भारत के अग्रणी मीडिया संस्थानों The Wire, Tehelka, Dainik Jagran, Hindustan और Aaj Tak में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में कार्य किया है. उन्हें प्रिंट, टेलीविजन और डिजिटल तीनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है. आप अमित सिंह से सीधे amit.singh@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं.
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