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टाटा और विवाद, आमतौर पर ये दो शब्द एक साथ सुनाई नहीं देते. टाटा नाम भारत में सिर्फ एक कारोबारी समूह की पहचान नहीं है. नमक से लेकर सॉफ्टवेयर, कार से लेकर विमान और स्टील से लेकर होटल तक फैला यह समूह करोड़ों भारतीयों के लिए भरोसे, परोपकार और कारोबारी साख का पर्याय रहा है.
टाटा के नाम के साथ भरोसा अपने आप जुड़ जाता है, लेकिन इन दिनों 268 अरब डॉलर की ये कंपनी सत्ता और ताकत की आजमाइश का अखाड़ा बनी हुई है. रतन टाटा के निधन के बाद नेतृत्व, कॉरपोरेट गवर्नेंस और टाटा संस के भविष्य की चुनौतियां अब बोर्ड रूम से निकलकर बाहर आ रही है. विवाद को सुलझाने के लिए कभी सरकार को दखल देना पड़ा, तो अब आंतरिक विरोध 'गैर-कानूनी' लहजे तक पहुंच चुका है.
सितंबर 2026 में मुंबई के बॉम्बे हाउस से जो खबरें निकल रही हैं वे इस स्थापित तस्वीर से बिल्कुल अलग हैं. टाटा समूह के भीतर इस समय दो बड़े सवाल एक-दूसरे से जुड़ गए हैं.
पहला, टाटा संस की कमान आगे किसके हाथ में होगी? दूसरा, क्या टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट होना पड़ेगा?
17 सितंबर को टाटा संस के बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन को पांच साल का एक और कार्यकाल देने का फैसला किया. उसी बैठक में कंपनी ने भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई के नियमों के मुताबिक टाटा संस की संभावित लिस्टिंग की दिशा में कदम बढ़ाने पर भी सहमति जताई.
लेकिन टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने दोनों फैसलों का विरोध किया. यही वह बिंदु है जहां कारोबारी विवाद अब सीधे गवर्नेंस और अधिकारों की लड़ाई में बदलता दिखाई दे रहा है.
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि टाटा संस का अगला चेयरमैन कौन होगा? बड़ा सवाल यह है कि टाटा संस को चलाने का असली अधिकार किसके पास है?
और उससे भी बड़ा सवाल कि क्या टाटा का वह पुराना ढांचा, जिसमें कारोबार और परोपकार एक-दूसरे से गहराई से जुड़े रहे हैं, शेयर बाजार के नए दौर में भी उसी तरह चल पाएगा?
टाटा समूह को समझने के लिए सबसे पहले टाटा संस को समझना जरूरी है. टाटा संस वह होल्डिंग कंपनी है जिसके नीचे टाटा समूह की 30 से ज्यादा बड़ी कंपनियां आती हैं.
इनमें टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टीसीएस, टाटा डिजिटल जैसी कंपनियां शामिल हैं. टाटा संस में करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी टाटा ट्रस्ट्स की है. वहीं, शापूरजी पलोनजी समूह यानी एसपी समूह के पास करीब 18.4 प्रतिशत हिस्सेदारी है. बाकी हिस्सेदारी अन्य शेयरधारकों के पास है.
यानी साधारण भाषा में कहें तो टाटा संस पूरे टाटा साम्राज्य की छतरी है. साथ ही टाटा संस की सबसे बड़ी हिस्सेदार संस्था टाटा ट्रस्ट्स है.
लेकिन यहां कहानी थोड़ी अलग है. टाटा ट्रस्ट्स कोई सामान्य कारोबारी कंपनी नहीं है. यह परोपकारी संस्थाओं का समूह है. टाटा कंपनियों से मिलने वाली आमदनी का बड़ा हिस्सा शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान और सामाजिक कामों पर खर्च होता है.
इसलिए टाटा संस की संरचना में कोई भी बड़ा बदलाव केवल कारोबार का मामला नहीं है. उसका असर टाटा के उस पूरे मॉडल पर पड़ सकता है, जिसमें कारोबार से पैदा होने वाली संपत्ति का इस्तेमाल समाज के लिए भी किया जाता रहा है.
आरबीआई ने टाटा संस को ऊपरी स्तर की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (Upper Layer NBFC) की श्रेणी में रखा है. इस श्रेणी में आने वाली कंपनियों के लिए कड़े नियामकीय नियम हैं. इन्हीं नियमों के तहत टाटा संस के सामने शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की बाध्यता आई.
टाटा संस इससे बचना चाहता था. कंपनी ने अपनी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी का पंजीकरण वापस करने की कोशिश की. तर्क यह था कि अगर टाटा संस इस श्रेणी से बाहर निकल जाए तो उसे सूचीबद्ध होने की बाध्यता भी नहीं रहेगी.
इसके लिए कंपनी ने अपनी देनदारियां कम कीं और कुछ वरीयता वाले शेयरों को समय से पहले वापस खरीदा लेकिन यह कोशिश कामयाब नहीं हुई. 11 सितंबर 2026 को रिजर्व बैंक ने टाटा संस की इस कोशिश को स्वीकार नहीं किया.
यानी अब टाटा संस के सामने रास्ता काफी हद तक साफ था कि नियामकीय नियमों का पालन करना होगा और सूचीबद्धता की दिशा में आगे बढ़ना होगा.
इसको लेकर 17 सितंबर को टाटा संस बोर्ड की बैठक हुई. बैठक करीब तीन घंटे चली. इसके बाद बोर्ड ने आरबीआई के लागू नियमों का पालन करने और लिस्टिंग की दिशा में कदम उठाने का फैसला किया. कंपनी ने यह भी कहा कि वह आरबीआई, टाटा ट्रस्ट्स और दूसरे शेयरधारकों से मार्गदर्शन लेगी.
यहीं से मामला और पेचीदा हो गया. क्योंकि टाटा ट्रस्ट्स ने कहा कि लिस्टिंग पर अभी सहमति बनी ही नहीं है.
नोएल टाटा का तर्क सिर्फ यह नहीं है कि लिस्टिंग से टाटा संस की कीमत कितनी होगी या किसे कितना फायदा मिलेगा. उनकी चिंता टाटा समूह के उस मॉडल को लेकर है जिसमें सबसे बड़ी हिस्सेदार संस्था खुद एक चैरिटेबल ट्रस्ट है.
टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि टाटा समूह की संरचना सामान्य कॉरपोरेट मॉडल से अलग है. अगर टाटा संस शेयर बाजार में आ गया तो कंपनी को सार्वजनिक शेयरधारकों के प्रति भी जवाबदेह होना पड़ेगा.
ट्रस्ट्स के मुताबिक इससे उस ऑपरेटिंग मॉडल पर असर पड़ सकता है जिसमें कारोबार और परोपकार के बीच एक खास संबंध बना हुआ है. दूसरी तरफ टाटा संस के सामने आरबीआई के नियम हैं.
यानी एक तरफ टाटा मॉडल बचाने की दलील, दूसरी तरफ नियामकीय अनुपालन की जरूरत है. इसी टकराव ने पूरे विवाद को जन्म दिया है.
इस कहानी में एक और बड़ा नाम शापूरजी पलोनजी समूह है. शापूरजी पलोनजी समूह की टाटा संस में हिस्सेदारी कई दशकों से चली आ रही है.
मिस्त्री परिवार और टाटा परिवार के कारोबारी रिश्ते भी पुराने हैं. नोएल टाटा की शादी अलू मिस्त्री से हुई है जो साइरस मिस्त्री की बहन हैं.
साइरस मिस्त्री वही नाम है जो 2016 में टाटा संस के चेयरमैन बने थे और बाद में उन्हें पद से हटा दिया गया था.
एसपी समूह लंबे समय से अपनी टाटा संस हिस्सेदारी से लिक्विडिटी चाहता रहा है और उसने संभावित लिस्टिंग का समर्थन किया है.
अब सामने आए एक प्रस्ताव में एसपी समूह ने टाटा संस में अपनी हिस्सेदारी के एक हिस्से को मोनेटाइज करने का रास्ता सुझाया है.
रिपोर्टों के मुताबिक प्रस्ताव के जरिए करीब 25,000 करोड़ रुपये जुटाने की संभावना बताई गई है.
इसका मतलब यह है कि बिना तत्काल आइपीओ के भी एसपी समूह को कुछ लिक्विडिटी दी जा सकती है लेकिन यह अभी समाधान नहीं है. यह सिर्फ उन विकल्पों में से एक है जिन पर चर्चा हो सकती है.
लिस्टिंग विवाद के साथ ही टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन का मामला भी जुड़ गया. चंद्रशेखरन फरवरी 2017 में टाटा संस के चेयरमैन बने थे.
इससे पहले वह टीसीएस में लंबा करियर बना चुके थे. उनका मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को खत्म होना था. 2022 में उन्हें पांच साल का दूसरा कार्यकाल मिला था.
फरवरी 2026 में उनके अगले कार्यकाल पर बोर्ड के भीतर स्पष्टता नहीं बन पाई थी. फिर 12 अगस्त 2026 को चंद्रशेखरन ने टाटा संस बोर्ड को बताया कि वह मौजूदा कार्यकाल पूरा करेंगे लेकिन उसके बाद नए कार्यकाल की मांग नहीं करेंगे.
टाटा ट्रस्ट्स ने इस फैसले को स्वीकार करते हुए नए चेयरमैन की तलाश शुरू करने को कहा, लेकिन करीब एक महीने बाद कहानी बदल गई.
17 सितंबर को बोर्ड ने चंद्रशेखरन से फिर पद संभालने का आग्रह किया. चंद्रशेखरन ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया.
बोर्ड ने उन्हें अगले पांच साल के लिए फिर कार्यकारी चेयरमैन नियुक्त करने के पक्ष में 4-1 से वोट किया. इस वोट में एकमात्र विरोधी वोट नोएल टाटा का था.
यहीं से मामला सिर्फ कारोबारी नहीं, कानूनी और कॉरपोरेट गवर्नेंस का भी हो जाता है. टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में चेयरमैन की नियुक्ति से जुड़े कुछ विशेष प्रावधान हैं.
ट्रस्ट्स के मुताबिक उनके नॉमिनी डॉयरेक्टर्स की मंजूरी जरूरी है. बोर्ड में टाटा ट्रस्ट्स से जुड़े दो महत्वपूर्ण नॉमिनी डॉयरेक्टर्स नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन हैं.
नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के खिलाफ वोट किया जबकि वेणु श्रीनिवासन ने प्रस्ताव का समर्थन किया. इसके बावजूद बोर्ड में प्रस्ताव 4-1 से पारित हो गया.
टाटा ट्रस्ट्स का दावा है कि ऐसी स्थिति में केवल सामान्य बहुमत पर्याप्त नहीं है. ट्रस्ट्स ने इसे कानूनी रूप से प्रभावहीन बताया है. ट्रस्ट्स ने अपनी स्थिति के समर्थन में पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की कानूनी राय का भी हवाला दिया है.
ऐसे में एक सवाल और उठता है कि जब ट्रस्ट्स के पास 66 फीसदी हिस्सेदारी है तो वह फैसला रोक क्यों नहीं रहा?
यह इस पूरी कहानी का शायद सबसे महत्वपूर्ण और कम समझा गया हिस्सा है. कागज पर देखें तो टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी है.
यानी उसकी ताकत बहुत बड़ी है लेकिन ट्रस्ट्स के भीतर भी एक रेगुलेटरी प्रॉब्लम चल रही है.
टाटा ट्रस्ट्स के सबसे बड़े ट्रस्टों में से एक सर रतन टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में करीब 23.6 फीसदी हिस्सेदारी है.
रिपोर्टों के मुताबिक एक चैरिटी रेगुलेटर ने ट्रस्टीज की नियुक्ति को लेकर विवाद के चलते इस ट्रस्ट को ट्रस्टीज की बैठक बुलाने से रोक रखा है.
इसका सीधा असर यह हुआ है कि टाटा ट्रस्ट्स अपनी पूरी शेयरहोल्डिंग ताकत का इस्तेमाल तत्काल नहीं कर पा रहा.
यानी दिलचस्प स्थिति यह है कि जिस संस्था के पास बहुमत हिस्सेदारी है उसके अपने अंदर की गवर्नेंस समस्या फिलहाल उसकी ताकत को सीमित कर रही है.
18 सितंबर को टाटा ग्रुप की कई लिस्टेड कंपनियों के शेयरों में शुरुआती तेजी के बाद कानूनी विवाद के गहराने से बाजार में अस्थिरता और गिरावट देखी गई.
टीसीएस और टाटा केमिकल समेत कुछ टाटा स्टाक्स में गिरावट कई फीसदी तक रही.बाजार की चिंता का एक कारण यही बोर्डरूम विवाद और उससे पैदा हुई गवर्नेंस अनसर्टेनिटी है.
हालांकि यह भी समझना जरूरी है कि टाटा समूह की हर लिस्टेड कंपनी अलग कंपनी है. उसके अपने बोर्ड और मैनेजमेंट हैं.
टाटा संस की गवर्नेंस में विवाद का मतलब यह नहीं है कि इन सभी कंपनियों का रोजमर्रा का कारोबार अचानक रुक गया है.
लेकिन टाटा संस समूह की होल्डिंग कंपनी होने के कारण वहां की बड़ी रणनीतिक अनिश्चितता का असर इनवेस्टर सेंटीमेंट पर पड़ना स्वाभाविक है.
टाटा समूह में बोर्डरूम विवाद नया नहीं है. 2016 में साइरस मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाया गया था. उस समय भी मामला टाटा समूह के नेतृत्व, गवर्नेंस और रतन टाटा के साथ मतभेदों तक पहुंचा था.
इसके बाद टाटा समूह और मिस्त्री परिवार के बीच लंबी कानूनी लड़ाई चली. 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने मिस्त्री समूह की चुनौती को खारिज कर दिया था. 2026 का विवाद वैसा ही है, ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी.
लेकिन दोनों घटनाओं में एक समान सवाल जरूर दिखाई देता है कि टाटा संस में अंतिम फैसला किस तरह और किसके अधिकार से होगा? इस बार फर्क यह है कि सामने सिर्फ चेयरमैन का सवाल नहीं है.
इसके साथ आरबीआई की रेगुलेटरी रिक्वायरमेंट, टाटा संस की संभावित लिस्टिंग, टाटा ट्रस्ट्स की गवर्नेंस और एसपी समूह की हिस्सेदारी चारों मुद्दे एक साथ आ गए हैं.
सबसे पहले नजर टाटा संस की अगली बोर्ड बैठक और एनुअल जनरल मीटिंग पर होगी.
टाटा ट्रस्ट्स के पास चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को चुनौती देने के लिए कानूनी रास्ता मौजूद है. इसके अलावा एजीएम में भी यह मुद्दा उठ सकता है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक टाटा संस की एजीएम दिसंबर में होने की उम्मीद है लेकिन उससे पहले ट्रस्ट्स को अपनी आंतरिक गवर्नेंस संबंधी अड़चनें सुलझानी होंगी.
दूसरा सवाल टाटा संस की लिस्टिंग का है. आरबीआई की स्थिति ने कंपनी के लिए विकल्पों को सीमित कर दिया है. टाटा संस अब रेगुलेटर से गाइडेंस लेकर आगे बढ़ेगा.
टाटा ट्रस्ट्स अभी भी अल्टरनेटिव तलाशने पर जोर दे रहा है. एसपी समूह अपनी हिस्सेदारी से लिक्विडिटी चाहता है और लिस्टिंग को समर्थन देता है.
तीसरा सवाल चंद्रशेखरन का है. बोर्ड ने उन्हें पांच साल के लिए फिर नियुक्त कर दिया है लेकिन टाटा ट्रस्ट्स इस फैसले की वैधता पर ही सवाल उठा रहा है.
इसलिए फिलहाल यह कहना संभव नहीं है कि 2027 के बाद उनका कार्यकाल किस रूप में आगे बढ़ेगा.
फिलहाल बॉम्बे हाउस में इस समय जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ एक कारोबारी समूह की अंदरूनी कहानी नहीं है.
इसका असर उन करोड़ों निवेशकों, कर्मचारियों, शेयरधारकों और परोपकारी संस्थाओं पर भी पड़ सकता है जो टाटा नाम से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं.