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N Chandrasekaran Reappointment: देश के सबसे बड़े कारोबारी घरानों में से एक टाटा ग्रुप में फिर से अंदरूनी घमासान तेज हो गया है. टाटा संस के सबसे बड़े शेयरहोल्डर सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) ने एन चंद्रशेखरन को अगले 5 सालों के लिए फिर से चेयरमैन बनाए जाने के फैसले को अदालत में चुनौती देने का मन बना लिया है. टाटा संस के फैसले को चुनौती देने के लिए बॉम्बे एनसीएलटी (NCLT) में याचिका दायर करने की तैयारी चल रही है. सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने चंद्रशेखरन के री-अपॉइंटमेंट को कानूनन तौर पर अमान्य ठहराया है. अब इस आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर टाटा ग्रुप के शीर्ष नेतृत्व में यह नया विवाद क्यों शुरू हुआ है.
टाटा संस के बोर्ड ने हाल ही में एन चंद्रशेखरन को दोबारा 5 साल का कार्यकाल देने के प्रपोजल को पारित कर दिया. चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को खत्म हो रहा है. हालांकि, टाटा संस में कुल 66% हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स का मानना है कि यह फैसला कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (Articles of Association) के नियमों का उल्लंघन है. अकेले सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के पास टाटा संस की करीब 28% हिस्सेदारी है.
इस पूरे विवाद की अहम जड़ टाटा संस का 'आर्टिकल 121' (Article 121) है. इस नियम के अनुसार टाटा संस के बोर्ड में ट्रस्ट्स की तरफ से नामित (Nominated) दोनों निदेशकों की सहमति से कोई बड़ा फैसला पारित हो सकता है. टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन के री-अपॉइंटमेंट के खिलाफ वोट किया था. जबकि ट्रस्ट्स के दूसरे नॉमिनी डायरेक्टर वेणु श्रीनिवासन ने इस प्रपोजल के पक्ष में वोट किया था.
इसके बाद दोनों नॉमिनी निदेशकों के बीच राय बंटने पर मीटिंग की अध्यक्षता कर रहे इंडिपेंडेंट डायरेक्टर हरीश मनवानी ने अपने 'कास्टिंग वोट' का का इस्तेमाल करते हुए चंद्रशेखरन के पक्ष में फैसला सुना दिया. ट्रस्ट्स का तर्क है कि जब दो नॉमिनी निदेशकों में से एक ने विरोध कर दिया तो चेयरपर्सन का कास्टिंग वोट उस नियम को ओवरराइड नहीं कर सकता.
सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट अब कंपनी एक्ट के सेक्शन-241 और 242 के तहत एनसीएलटी (NCLT) जाने की संभावना तलाश रहा है. इन सेक्शन का इस्तेमाल कंपनी में मिसमैनेजमेंट (Mismanagement) या शेयरहोल्डर्स के अधिकारों के हनन (Oppression) के खिलाफ किया जाता है. यदि ट्रिब्यूनल याचिका स्वीकार करता है तो वह चंद्रशेखरन के री-अपॉइंटमेंट के प्रपोजल को रद्द भी कर सकता है.
कानूनी मोर्चे पर पकड़ मजबूत करने के लिए टाटा ट्रस्ट्स ने देश के पूर्व चीफ जस्टिस (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ से कानूनी सलाह ली है. दूसरी तरफ, टाटा संस ने भी सीनियर एडवोकेट सुदीप्तो सरकार से लीगल ओपिनियन लिया है, जो बोर्ड के फैसले को पूरी तरह कानूनी ठहरा रहे हैं.
टाटा ग्रुप का हालिया विवाद साल 2016 के उस चर्चित दौर की याद दिलाता है जब सायरस मिस्त्री को चेयरमैन पद से हटा दिया गया था. उस समय भी मिस्त्री से जुड़ी कंपनियों ने सेक्शन-241 और 242 के तहत केस दायर किया था. इसकी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची थी और 2021 में फैसला टाटा संस के पक्ष में आया था. हालांकि, इस बार का मामला पूरे बोर्ड के खिलाफ न होकर एक खास प्रस्ताव की वैधता और रूल बुक के उल्लंघन पर बेस्ड है.