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40 साल में पहली बार अमेरिका की हालत खराब, खुद तेल के लिए तरस रहा रूस कैसे पूरी करेगा ट्रंप की डिमांड...भारत के लिए मौका

US Diesel Deal: अमेरिका के पास विशाल तेल भंडार है, लेकिन वो डीजल रूस से खरीदने के लिए डील कर रहा है. रूस जो तेल बेचने में अव्वल है , वो खुद पेट्रोल के लिए भारत पर निर्भर है, ऐसे में क्या अमेरिका रूस की डीजल डील पूरी हो पाएगी? ये डील भारत के लिए कैसे गेमचेंजर साबित हो सकता है?

40 साल में पहली बार अमेरिका की हालत खराब, खुद तेल के लिए तरस रहा रूस कैसे पूरी करेगा ट्रंप की डिमांड...भारत के लिए मौका

US-Russia Diesel Deal: ईरान युद्ध ने सिर्फ तेल के बाजार को ही नहीं बदला, बल्कि पूरा ग्लोबल पावर शिफ्ट कर दिया है. विश्व का सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका, जिसके पास करीब 75 बिलियन बैरल से अधिक का तेल भंडार है, वो खुद डीजल संकट से जूझ रहा है. दुनिया के सबसे बड़े डीजल सप्लायर को रूस से डीजल खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा. तेल संकट ने अमेरिका को 40 साल के सबसे बड़े संकट के सामने लाकर खड़ा कर दिया.

अब कुछ सवाल:  

  1. सुपरपावर अमेरिका कैसे तेल संकट में फंस गया?
  2. जिस रूसी तेल के लिए उसने 100 फीसदी टैरिफ बिल पास करवाया, उसे क्यों उसी देश के डीजल खरीदना पड़ रहा है?
  3. वो रूस, जो खुद गैसोलीन संकट से जूझ रहा है, भारत और दक्षिण कोरिया जैसे देशों से ईंधन खरीद रहा हैं, क्या वो अमेरिका की जरूरत को पूरा कर पाएगा?  
  4. अमेरिका-रूस की डीजल डील का नफा या नुकसान भारत को कैसे हो सकता है?  


सवाल नंबर 1: जिसके पास तेल का भंडार, वो अमेरिका डीजल पर क्यों झुका? 

जवाब: अमेरिका के पास 75 बिलियन बैरल से अधिक का ऑयल रिजर्व है,लेकिन ईरान युद्ध और होर्मुज का रास्ता बंद होने के बाद से ट्रंप खुद संकट का सामना कर रहे हैं. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका का स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) 40 साल के सबसे निचले स्तर पर करीब 289.6 मिलियन बैरल पर पहुंच गया है. अमेरिका के SPR क्षमता 714 मिलियन बैरल की है, लेकिन होर्मुज संकट की वजह से अटकी सप्लाई के चलते इन देशों को अपने सुरक्षित रिजर्व से तेल निकालना पड़ा है.  

सप्लाई चेन बिगड़ने से अमेरिका में डीजल की कीमतें दोगुनी हो चुकी है. अमेरिका ऑटोमोबाइल एसोसिएशन (AAA) के डेटा के मुताबिक  अमेरिका में डीजल के दाम 6.53 डॉलर प्रति गैलन पर पहुंच चुका है. तेल संकट को संभालने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप ने कई कोशिशें की.

  • दुनिया के सबसे बड़े डीजल निर्यातक देश अमेरिका ने अपनी रिफाइनरियों से रिफाइनिंग कैपिसिटी बढ़ाने का आदेश दिया, लेकिन हालात नहीं बदले.  
  • यूक्रेन ने रूस की तेल रिफाइनरियों पर हमला नहीं करने की अपील की.
  • घरेलू मांग को पूरा करने के लिए डीजल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया, ताकि सप्लाई बढ़ाकर कीमतों को नियंत्रित किया जा सके, लेकिन फिर भी स्थिति काबू में नहीं आई.  
  • यूरोपीय देशों से अगले चार महीनों में 10 करोड़ बैरल तक डीजल और कच्चे तेल का रिलीज करने का आदेश दिया.
  • ट्रंप ने हाईवे पर ‘डाईड डीजल’ के अस्थायी इस्तेमाल को मंजूरी दे दी.  
  • अब ट्रंप ने अपने ही बनाए कानून को तोड़ते हुए रूस से डीजल खरीद के लिए बड़ी डील कर दी है.  


सवाल नंबर 2: अमेरिका-रूस डील से क्या हासिल होगा?  

अमेरिका और रूस के बीच हुई डीजल डील में रूस की ओर से अमेरिका और ग्लोबल मार्केट में डीजल की सप्लाई बढ़ाई जाएगी. 

  • रूस अमेरिका को करीब 48 लाख टन डीजल की सप्लाई करेगा.  
  • रूस फौरन 3 लाख टन से ज्यादा डीजल अमेरिका को भेजेगा. 
  • नवंबर के महीने में 5 लाख टन और डीजल भेजेगा. 
  • उसके तुरंत बाद 10 लाख टन डीजल की सप्लाई करेगा. 

सवाल नंबर 3: क्या रूस इस डील को पूरा कर पाएगा?  

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस के साथ डीजल डील तो कर ली है, लेकिन क्या मॉस्को खुद इस स्थिति में है कि वो अमेरिका की जरूरत को पूरा कर सके. बीते कुछ दिनों में रूस के पेट्रोल पंपों पर गाड़ियों की लंबी लाइनों ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है.  दुनिया को तेल बेचने वाला रूस खुद तेल संकट से घिरा है. यूक्रेन ने रूस की रिफाइनरियों को निशाना बनाया है. जिसकी वजह से रूसी रिफाइनरियां इस समय अपनी कुल क्षमता के केवल 60% पर काम कर रही हैं. हालात ऐसे बने हैं कि रूस खुद भारत से गैसोलीन का इंपोर्ट कर रहा है.

सवाल नंबर 4:  जो खुद भारत से खरीद रहा, वो रूस अमेरिका की जरूरत को कैसे पूरा करेगा?  
 

न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की माने, तो रूस समुद्री रास्तों से भारत से डीजल-पेट्रोल का आयात कर रहा है. भारत से कम से कम 60,000 मीट्रिक टन पेट्रोल रूस भेजा जा चुका है. रूस अलग-अलग देशों से 4 लाख टन पेट्रोल आयात करने की योजना बना रहा है. पड़ोसी देश बेलारूस से ईंधन की सप्लाई बढ़कर 70,000 टन से अधिक हो चुकी है.


IEA के इंडस्ट्री और मार्केट हेड  Neil Atkinson के मुताबिक मौजूदा हालात में ये संभव नहीं दिख रहा है कि रूस अमेरिका को डील के मुताबिक डीजल की सप्लाई कर सके.

S&P ग्लोबल के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया के दूसरे सबसे बड़े डीजल सप्लायर रूस की डीजल निर्यात क्षमता गिरकर औसतन 190000 बैरल रोजाना के स्तर पर पहुंच चुका है, जो दूसरी तिमाही में करीब 690000 बैरल और पहली तिमाही में 850000 बैरल रोजाना था. रिफाइनरियों की गिरती कैपिसिटी को देखते हुए रूस से जुलाई 2026 में डीजल निर्यात पर प्रतिबंध तक लगा दिया, जिसे बाद में बढ़ाकर अक्टूबर तक के लिए कर दिया गया. अब अमेरिका के साथ हुए डील के बाद इस बैन तो फिलहाल हटा लिया गया है, लेकिन अगर रूस के डीजल एक्सपोर्ट के आंकड़ों का कैलकुलेशन देखें, तो ये मुश्किल डील लग रही है.

सवाल नंबर 5: डील तो हो गई, लेकिन क्या हकीकत में बदल पाएगी ?

अगर रूस की मौजूदा निर्यात क्षमता से तुलना करें, तो ट्रंप का ये सौदा काफी पेंचीदा दिखता है. समझौते की शर्त के मुताबिक रूस को डीजल की पहली खेप 3 लाख टन का एक्सपोर्ट करना है, लेकिन मॉस्को की मौजूदा रिफाइनिंग क्षमता के हिसाब से इस आंकड़े तक पहुंच पाना आसान नहीं है.

रूस को पहली खेप भेजने के लिए 3 लाख टन का यानी करीब 22 लाख बैरल डीजल चाहिए, जो रूस के मौजूदा निर्यात के 4 दिन के बराबर है. नवंबर में उसे 5 लाख टन यानी करीब 37 लाख बैरल डीजल निर्यात करता है. ये निर्यात रूस के कुल निर्यात का 25 फीसदी से बराबर है. खुद ऊर्जा संकट से जूझ रहे रूस के लिए डीजल की सप्लाई चुनौतीपूर्ण है.  

सवाल नंबर 6: तेल से ज्यादा ताकत रिफाइनिंग में 

तेल से लबालब भरे देश अमेरिका और रूस दोनों ही ऊर्जा संकट से जूझ रहे हैं. रिफानरियों पर हुए हमले ने वैश्विक ऊर्जा संकट को बढ़ा दिया है. ऐसे में आज क्रूड संपन्न देशों से ज्यादा महत्वपूर्व वो देश हैं,जिनके पास तेल रिफाइनिंग की क्षमता है. असल में आज ऐसे ही देश ग्लोबल ऑयल मार्केट को कंट्रोल कर रहे हैं.

आज जरूरी नहीं है कि जिसके पास तेल का विशाल भंडार है वहीं देश ताकतवर हो, वेनेजुएला और ईरान जैसे देशों की आर्थिक स्थिति किसी से छिपी नहीं है.

अमेरिका के पास हल्का कच्चा तेल बड़ी मात्रा में है, जिससे पेट्रोल जैसे हल्के ईंधन ज्यादा बन सकते हैं, जबकि भारी क्रूड की रिफाइनिंग से डीजल ज्यादा बनता है. मतलब साफ है कि अगर तेल का भंडार है, तो ये भी जरूरी नहीं कि उसके पास पेट्रोल-डीजल भी पर्याप्त हो.  

सवाल नंबर 7: भारत के लिए इस डील के मायने क्या हैं ?

अमेरिकी राष्ट्रपति ने लिंसे ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 बिल के उलट जाकर रूस के साथ ये समझौता किया है. ये बिल अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों पर 100% टैरिफ लगाने का अधिकार देता है, जो रूस से तेल खरीदते  हैं. जब अमेरिका खुद रूस से डीजल खरीदने को तैयार है, तो वो भारत पर इसी आधार पर टैरिफ नहीं लगा सकेगा. मतलब ये कि रूस और अमेरिका की डील ने भारत पर टैरिफ के खतरे को फिलहाल टाल दिया है.

भारत-रूस कच्चे तेल आयात का रास्ता साफ

भारत रूस से अब धड़ल्ले से तेल की खरीदारी कर सकता है. केप्‍लर के अनुसार, सितंबर में भारत के कच्चे तेल के आयात में रूस की हिस्सेदारी जुलाई के 56% से घटकर लगभग 35% रह गई. अमेरिकी टैरिफ के बढ़ते खतरे को देखते हुए भारतीय रिफानरियो ने रूसी तेल का आयात कम कर दिया, लेकिन अब ऐसा करने की जरूरत नहीं होगी.

भारत के पास रिफाइनिंग ताकत

भारत की तेल रिफाइनिंग दुनिया में चौथे नंबर पर है. भारत के पास 4.92 मिलियन बैरल रोजाना तेल की रिफाइनिंग की क्षमता है. सस्ता कच्चा तेल खरीद कर उसकी रिफाइनिंग के बाद पेट्रोल-डीजल का निर्यात कर भारत विदेशी मुद्रा भंडार भर रहा है. भारत के कुल निर्यात में पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी दूसरे नंबर पर है. पेट्रोल, डीजल, ATF के निर्यात से भारत करीब 85 अरब डॉलर की कमाई करता है. इस डील से भारत के लिए सस्ते रूसी तेल की आवाक आसान हो जाएगी उनकी रिफाइनरिंग कर भारत पेट्रोल-डीजल निर्यात में अपनी हिस्सेदारी को और बढ़ा सकेगा.

भारत के डीजल निर्यात पर एक नजर

जहां अमेरिका और रूस जैसे तेल संपन्न देश ईंधन संकट का सामना कर रहे हैं, भारत भारी मात्रा में डीजल का निर्यात कर रहा है. सितंबर 2026 में भारत का डीजल निर्यात साल के ऑल टाइम हाई पर 620000 बैरल रोजाना पर पहुंच गया था. यूरोप, अफ्रीका, एशिया यहां तक की अमेरिका और रूस जैसे देश भारी मात्रा में भारत से डीजल का आयात करते हैं.

  • यूरोप- भारत के कुल डीजल निर्यात का 45 फीसदी यानी करीब 280000 बैरल रोजाना यूरोपीय देशों को जाता है.
  • अफ्रीका-कुल डीजल निर्यात में इसकी हिस्सेदारी 35 फीसदी की है, जो करीब 200000 बैरल रोजाना है. 
  • एशिया-एशियाई देशों को भारत करीब 50000 बैरल रोजाना डीजल एक्सपोर्ट करता है.
  • अमेरिका- करीब 40000 बैरल डीजल अमेरिका को बेचता है.


रिफाइनिंग पावर के दम पर भारत पेट्रोल-डीजल के एक्सपोर्ट में बाजी मार रहा है. भारत की आधुनिक रिफाइनिंग मोटे तेल के प्यूरिफिकेशन की क्षमता रखती है. अब इस डील के भारत को डीजल मार्केट में गेमचेंजर बनने का मौका मिल सकता है.  

 

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About the Author

Bavita Jha

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बवीता झा बिजनेस पत्रकार हैं, उन्हें डिजिटल और टीवी न्यूज़ मीडिया में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News Hindi (Digital) में बतौर चीफ सब-एडिटर कार्यरत हैं. व्यापार जगत की जटिलताओं और आर्थिक आंकड़ों को आम पाठकों के लिए सरल भाषा में डिकोड करना उनका मजबूत पक्ष है.  • शेयर बाजार • बिजनेस एक्सप्लेनर • पर्सनल फाइनेंस और टैक्सेशन  • कमोडिटी, गोल्ड-सिल्वर ट्रेड• ग्लोबल ट्रेड • जियो इकोनॉमिकस डेवलपमेंट • कारोबार से जुड़ी सरकारी योजना और पॉलिटी • बिजनेस और मार्केट ट्रेंडZee News से पहले बवीता ने नवभारत टाइम्स (NBT) के बिजनेस सेक्शन और Oneindia जैसे प्रतिष्ठित डिजिटल संस्थानों में इवनिंग शिफ्ट, होम पेज मैनेजमेंट और ट्रेडिंग न्यूज़ की अहम जिम्मेदारियां संभाल चुकी हैं. इसके अलावा महुआ न्यूज़, जनसंदेश और सहारा जैसे टीवी चैनलों में प्रोग्राम प्रोड्यूसर और रनडाउन मैनेजमेंट का उनके पास 4 वर्षों का ठोस अनुभव है.  दिल्ली से पत्रकारिता में स्नातक और गुरु जंभेश्वर यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन करने वाली बवीता, खबरों की सत्यता और वित्तीय मामलों की सटीक रिपोर्टिंग को प्राथमिकता देती हैं.  बवीता झा से आप bavita.jha@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा आप उनसे एक्स  पर https://x.com/youthreporter2 के जरिए सीधे जुड़ सकते हैं. सोशल मीडिया पर कनेक्ट होने के लिए फेसबुक पेज https://www.facebook.com/bavita.jha , इंस्टाग्राम instagram.com/bavita.jha पर जुड़ सकते हैं. बवीता झा की खबरों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं.
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