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US-Russia Diesel Deal: ईरान युद्ध ने सिर्फ तेल के बाजार को ही नहीं बदला, बल्कि पूरा ग्लोबल पावर शिफ्ट कर दिया है. विश्व का सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका, जिसके पास करीब 75 बिलियन बैरल से अधिक का तेल भंडार है, वो खुद डीजल संकट से जूझ रहा है. दुनिया के सबसे बड़े डीजल सप्लायर को रूस से डीजल खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा. तेल संकट ने अमेरिका को 40 साल के सबसे बड़े संकट के सामने लाकर खड़ा कर दिया.
अब कुछ सवाल:
जवाब: अमेरिका के पास 75 बिलियन बैरल से अधिक का ऑयल रिजर्व है,लेकिन ईरान युद्ध और होर्मुज का रास्ता बंद होने के बाद से ट्रंप खुद संकट का सामना कर रहे हैं. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका का स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) 40 साल के सबसे निचले स्तर पर करीब 289.6 मिलियन बैरल पर पहुंच गया है. अमेरिका के SPR क्षमता 714 मिलियन बैरल की है, लेकिन होर्मुज संकट की वजह से अटकी सप्लाई के चलते इन देशों को अपने सुरक्षित रिजर्व से तेल निकालना पड़ा है.
सप्लाई चेन बिगड़ने से अमेरिका में डीजल की कीमतें दोगुनी हो चुकी है. अमेरिका ऑटोमोबाइल एसोसिएशन (AAA) के डेटा के मुताबिक अमेरिका में डीजल के दाम 6.53 डॉलर प्रति गैलन पर पहुंच चुका है. तेल संकट को संभालने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप ने कई कोशिशें की.

अमेरिका और रूस के बीच हुई डीजल डील में रूस की ओर से अमेरिका और ग्लोबल मार्केट में डीजल की सप्लाई बढ़ाई जाएगी.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस के साथ डीजल डील तो कर ली है, लेकिन क्या मॉस्को खुद इस स्थिति में है कि वो अमेरिका की जरूरत को पूरा कर सके. बीते कुछ दिनों में रूस के पेट्रोल पंपों पर गाड़ियों की लंबी लाइनों ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है. दुनिया को तेल बेचने वाला रूस खुद तेल संकट से घिरा है. यूक्रेन ने रूस की रिफाइनरियों को निशाना बनाया है. जिसकी वजह से रूसी रिफाइनरियां इस समय अपनी कुल क्षमता के केवल 60% पर काम कर रही हैं. हालात ऐसे बने हैं कि रूस खुद भारत से गैसोलीन का इंपोर्ट कर रहा है.

न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की माने, तो रूस समुद्री रास्तों से भारत से डीजल-पेट्रोल का आयात कर रहा है. भारत से कम से कम 60,000 मीट्रिक टन पेट्रोल रूस भेजा जा चुका है. रूस अलग-अलग देशों से 4 लाख टन पेट्रोल आयात करने की योजना बना रहा है. पड़ोसी देश बेलारूस से ईंधन की सप्लाई बढ़कर 70,000 टन से अधिक हो चुकी है.
IEA के इंडस्ट्री और मार्केट हेड Neil Atkinson के मुताबिक मौजूदा हालात में ये संभव नहीं दिख रहा है कि रूस अमेरिका को डील के मुताबिक डीजल की सप्लाई कर सके.
S&P ग्लोबल के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया के दूसरे सबसे बड़े डीजल सप्लायर रूस की डीजल निर्यात क्षमता गिरकर औसतन 190000 बैरल रोजाना के स्तर पर पहुंच चुका है, जो दूसरी तिमाही में करीब 690000 बैरल और पहली तिमाही में 850000 बैरल रोजाना था. रिफाइनरियों की गिरती कैपिसिटी को देखते हुए रूस से जुलाई 2026 में डीजल निर्यात पर प्रतिबंध तक लगा दिया, जिसे बाद में बढ़ाकर अक्टूबर तक के लिए कर दिया गया. अब अमेरिका के साथ हुए डील के बाद इस बैन तो फिलहाल हटा लिया गया है, लेकिन अगर रूस के डीजल एक्सपोर्ट के आंकड़ों का कैलकुलेशन देखें, तो ये मुश्किल डील लग रही है.

अगर रूस की मौजूदा निर्यात क्षमता से तुलना करें, तो ट्रंप का ये सौदा काफी पेंचीदा दिखता है. समझौते की शर्त के मुताबिक रूस को डीजल की पहली खेप 3 लाख टन का एक्सपोर्ट करना है, लेकिन मॉस्को की मौजूदा रिफाइनिंग क्षमता के हिसाब से इस आंकड़े तक पहुंच पाना आसान नहीं है.
रूस को पहली खेप भेजने के लिए 3 लाख टन का यानी करीब 22 लाख बैरल डीजल चाहिए, जो रूस के मौजूदा निर्यात के 4 दिन के बराबर है. नवंबर में उसे 5 लाख टन यानी करीब 37 लाख बैरल डीजल निर्यात करता है. ये निर्यात रूस के कुल निर्यात का 25 फीसदी से बराबर है. खुद ऊर्जा संकट से जूझ रहे रूस के लिए डीजल की सप्लाई चुनौतीपूर्ण है.
तेल से लबालब भरे देश अमेरिका और रूस दोनों ही ऊर्जा संकट से जूझ रहे हैं. रिफानरियों पर हुए हमले ने वैश्विक ऊर्जा संकट को बढ़ा दिया है. ऐसे में आज क्रूड संपन्न देशों से ज्यादा महत्वपूर्व वो देश हैं,जिनके पास तेल रिफाइनिंग की क्षमता है. असल में आज ऐसे ही देश ग्लोबल ऑयल मार्केट को कंट्रोल कर रहे हैं.
आज जरूरी नहीं है कि जिसके पास तेल का विशाल भंडार है वहीं देश ताकतवर हो, वेनेजुएला और ईरान जैसे देशों की आर्थिक स्थिति किसी से छिपी नहीं है.
अमेरिका के पास हल्का कच्चा तेल बड़ी मात्रा में है, जिससे पेट्रोल जैसे हल्के ईंधन ज्यादा बन सकते हैं, जबकि भारी क्रूड की रिफाइनिंग से डीजल ज्यादा बनता है. मतलब साफ है कि अगर तेल का भंडार है, तो ये भी जरूरी नहीं कि उसके पास पेट्रोल-डीजल भी पर्याप्त हो.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने लिंसे ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 बिल के उलट जाकर रूस के साथ ये समझौता किया है. ये बिल अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों पर 100% टैरिफ लगाने का अधिकार देता है, जो रूस से तेल खरीदते हैं. जब अमेरिका खुद रूस से डीजल खरीदने को तैयार है, तो वो भारत पर इसी आधार पर टैरिफ नहीं लगा सकेगा. मतलब ये कि रूस और अमेरिका की डील ने भारत पर टैरिफ के खतरे को फिलहाल टाल दिया है.
भारत रूस से अब धड़ल्ले से तेल की खरीदारी कर सकता है. केप्लर के अनुसार, सितंबर में भारत के कच्चे तेल के आयात में रूस की हिस्सेदारी जुलाई के 56% से घटकर लगभग 35% रह गई. अमेरिकी टैरिफ के बढ़ते खतरे को देखते हुए भारतीय रिफानरियो ने रूसी तेल का आयात कम कर दिया, लेकिन अब ऐसा करने की जरूरत नहीं होगी.
भारत की तेल रिफाइनिंग दुनिया में चौथे नंबर पर है. भारत के पास 4.92 मिलियन बैरल रोजाना तेल की रिफाइनिंग की क्षमता है. सस्ता कच्चा तेल खरीद कर उसकी रिफाइनिंग के बाद पेट्रोल-डीजल का निर्यात कर भारत विदेशी मुद्रा भंडार भर रहा है. भारत के कुल निर्यात में पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी दूसरे नंबर पर है. पेट्रोल, डीजल, ATF के निर्यात से भारत करीब 85 अरब डॉलर की कमाई करता है. इस डील से भारत के लिए सस्ते रूसी तेल की आवाक आसान हो जाएगी उनकी रिफाइनरिंग कर भारत पेट्रोल-डीजल निर्यात में अपनी हिस्सेदारी को और बढ़ा सकेगा.
जहां अमेरिका और रूस जैसे तेल संपन्न देश ईंधन संकट का सामना कर रहे हैं, भारत भारी मात्रा में डीजल का निर्यात कर रहा है. सितंबर 2026 में भारत का डीजल निर्यात साल के ऑल टाइम हाई पर 620000 बैरल रोजाना पर पहुंच गया था. यूरोप, अफ्रीका, एशिया यहां तक की अमेरिका और रूस जैसे देश भारी मात्रा में भारत से डीजल का आयात करते हैं.

रिफाइनिंग पावर के दम पर भारत पेट्रोल-डीजल के एक्सपोर्ट में बाजी मार रहा है. भारत की आधुनिक रिफाइनिंग मोटे तेल के प्यूरिफिकेशन की क्षमता रखती है. अब इस डील के भारत को डीजल मार्केट में गेमचेंजर बनने का मौका मिल सकता है.