BRICS SUMMIT 2026: BRICS समिट में नई दिल्ली घोषणा यानी दिल्ली डिक्लेरेशन 2026 को सभी सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सदस्य देशों के समक्ष घोषणा का मसौदा पेश किया और पूछा कि क्या किसी देश को इस पर कोई आपत्ति है. किसी भी सदस्य देश की ओर से आपत्ति नहीं जताई गई, जिसके बाद नई दिल्ली घोषणा को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया.
BRICS के नई दिल्ली घोषणा-पत्र में वैश्विक अर्थव्यवस्था को अधिक समावेशी, संतुलित और विकासशील देशों के हितों के अनुरूप बनाने पर खास जोर दिया गया है. समूह ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ सीमा पार भुगतान, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, MSME और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने तथा WTO में सुधार जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी है.
BRICS देशों ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में उभरते बाजारों और विकासशील देशों (EMDCs) की भागीदारी और प्रतिनिधित्व बेहतर करने की आवश्यकता पर जोर दिया. BRICS का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में विकासशील देशों का योगदान लगातार बढ़ रहा है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में उनके प्रभाव और निर्णय लेने की क्षमता को भी उसी रेश्यो में बढ़ाया जाना चाहिए.
BRICS ने न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) को और मजबूत करने और उसकी सदस्यता का विस्तार करने का समर्थन किया है. बैंक को विकासशील देशों में बुनियादी ढांचे और सतत विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता के एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देखा जा रहा है.
BRICS के आर्थिक एजेंडे में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार निपटान को बढ़ावा देना प्रमुख मुद्दों में शामिल रहा. सदस्य देशों ने अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से अपनी-अपनी मुद्राओं में व्यापार और निवेश के निपटान की संभावनाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया. इसके लिए BRICS पेमेंट टास्क फोर्स के माध्यम से सीमा पार भुगतान व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने पर काम जारी रखने की बात कही गई है. लक्ष्य है कि सदस्य देशों के बीच भुगतान व्यवस्था तेज, सस्ती, सुरक्षित और अधिक सुविधाजनक बने.
घोषणा-पत्र में छोटे और मध्यम कारोबारों को वैश्विक आर्थिक सहयोग से जोड़ने पर भी जोर दिया गया है. BRICS देशों ने स्टार्टअप और MSME सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न पहलों का समर्थन किया है. इनमें BRICS स्टार्टअप इनोवेशन फंड और इनवॉइस डिस्कॉउंटिंग मैकेनिज्म जैसी पहलें शामिल हैं. इनका उद्देश्य नए उद्यमों को वित्तीय मदद, इनोवेशन और कारोबार के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराना है.
BRICS ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) में सुधार की जरूरत दोहराते हुए वैश्विक व्यापार व्यवस्था को अधिक खुला, पारदर्शी और नियम-आधारित बनाने की वकालत की. घोषणा-पत्र में संरक्षणवाद और एकतरफा टैरिफ एवं गैर-टैरिफ व्यापार प्रतिबंधों को लेकर चिंता जताई गई. BRICS देशों का कहना है कि ऐसे कदम वैश्विक व्यापार को प्रभावित करने के साथ सप्लाई चेन में व्यवधान और आर्थिक अनिश्चितता बढ़ा सकते हैं.
BRICS का आर्थिक एजेंडा वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में विकासशील देशों की बड़ी भूमिका, व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल, सीमा पार भुगतान के वैकल्पिक और MSME और स्टार्टअप्स के लिए बेहतर अवसरों पर केंद्रित है, साथ ही समूह ने WTO समेत मौजूदा वैश्विक आर्थिक संस्थानों में सुधार की जरूरत को भी स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है.
1. वित्तीय संस्थान सुधार- IMF और वर्ल्ड बैंक में EMDCs (उभरते बाजारों) की बेहतर भागीदारी की मांग
2. न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB)- इसे और मजबूत करने और सदस्यता बढ़ाने पर सहमति
3. क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट्स- BRICS मुद्राओं में व्यापार निपटान को बढ़ावा देने पर चर्चा (BRICS Payment Task Force)
4. MSME और स्टार्टअप्स– BRICS स्टार्टअप इनोवेशन फंड, इनवॉइस डिस्कॉउंटिंग मैकेनिज्म जैसी पहलें
5. WTO सुधार– व्यापार में संरक्षणवाद (protectionism) और एकतरफा टैरिफ का विरोध
BRICS देशों ने एकतरफा लगाए जा रहे टैरिफ और अन्य गैर-टैरिफ व्यापारिक प्रतिबंधों को लेकर चिंता जाहिर की है. संगठन ने ऐसी व्यापार नीतियों पर सवाल उठाया है, जिनमें टैरिफ का इस्तेमाल आर्थिक दबाव बनाने के साधन के तौर पर किया जाता है. हालांकि, बयान में अमेरिका का सीधे तौर पर जिक्र नहीं किया गया. लेकिन, मौजूदा वैश्विक व्यापार तनाव और अमेरिकी टैरिफ नीति के बीच BRICS का यह रुख काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.