SOCIAL MEDIA

Newsletter

PARTNER SITES
Select language

राहुल राज-बंशीधर ब्रजवासी बुरे फंसे; राजद और जन सुराज ने कर दी सभापति से शिकायत, अब दोनों के पास क्या है आखिरी रास्ता?

राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी के मामले में कई सवाल पैदा होते हैं. क्या दोनों की सदस्यता चली जाएगी? अगर नहीं तो क्यों और अगर हां तो भी क्यों? इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता दीपक जैन ने एक-एक पहलू को स्पष्ट कर दिया.

Written By Sunil Mishra
Published: Nov 02, 2026, 05:25 PM IST | Updated: Nov 02, 2026, 05:46 PM IST
Image Credit: राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी के लिए यह खबर बहुत जरूरी है. (AI Image)
Join

सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से एमएलसी राहुल राज और तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से जीते बंशीधर ब्रजवासी के खिलाफ जन सुराज पार्टी ने विधान परिषद के सभापति का चार्ज संभाल रहे रामवचन राय से शिकायत कर दी है. अपनी शिकायतों के समर्थन में राष्ट्रीय जनता दल और जन सुराज पार्टी की ओर से पेन ड्राइव, वीडियो, फोटो, सदस्यता कार्ड संख्या और उनके बयानों, सोशल मीडिया पर लिखे गए स्क्रीनशॉट्स को आधार बनाया गया है. अब यह सभापति के विवेक पर है कि वे इस मामले में कब फैसला लेते हैं. अभी तक राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी ने शपथ भी नहीं ली है और उनकी अयोग्यता की मांग वाली शिकायत सभापति तक पहुंच गई है. तो क्या वे शपथ ले पाएंगे?

READ ALSO: बुरे फंसे राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी: सभापति का चार्ज संभाल रहे जेडीयू के रामवचन राय के पाले में होगी गेंद

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता दीपक जैन का कहना है कि कानूनी तौर पर उन्हें शपथ लेने से कोई रोक नहीं सकता. अयोग्यता की मांग वाली कोई लंबित शिकायत अपने आप में शपथ लेने की प्रक्रिया को नहीं रोकती. उनका कहना है कि 10वीं अनुसूची के तहत, अयोग्यता तभी लागू होती है जब अध्यक्ष (चेयरमैन) पैराग्राफ 6 के तहत शिकायत की सुनवाई करें और कोई आदेश पारित करें.

अधिवक्ता दीपक जैन का कहना है कि व्यावहारिक रूप से अध्यक्ष चाहें तो शपथ ग्रहण की तारीख को टाल सकते हैं, लेकिन बिना किसी ठोस कारण के इसे रोकना अदालत में चुनौती का विषय बन सकता है. भले ही वे शपथ ले लें, फिर भी शिकायत बनी रहेगी, और बाद में सबूतों (सदस्यता फॉर्म, वीडियो, बयान) के आधार पर उन्हें अयोग्य ठहराया जा सकता है.

उनका कहना है कि 10वीं अनुसूची के तहत 'दल-बदल विरोधी कानून' चुनाव परिणाम घोषित होते ही लागू हो जाता है. इसका मतलब यह है कि एक निर्वाचित सदस्य, सदन में औपचारिक शपथ लेने से पहले ही, अपनी पार्टी के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य होता है.

उन्होंने कहा कि सार्वजनिक रिकॉर्ड और महत्वपूर्ण कानूनी मामलों में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता, जहां किसी सदस्य ने शपथ लेने से ठीक पहले ही अपनी सीट खो दी हो या 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित कर दिया गया हो. (ऐसा इसलिए है क्योंकि अयोग्यता की कार्यवाही के लिए अध्यक्ष या सभापति के पास एक औपचारिक याचिका दायर करना और उनका फैसला आना जरूरी होता है. यह प्रक्रिया आमतौर पर तब शुरू होती है जब विधानसभा या संसद की बैठक शुरू होती है और सदस्य कार्यवाही में हिस्सा लेना या उससे दूर रहना शुरू करते हैं.)

वरिष्ठ अधिवक्ता दीपक जैन यह भी मानते हैं कि राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी के पास बचने का एक वास्तविक मौका है, लेकिन यह पूरी तरह से सबूतों पर निर्भर करता है.

राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी के पक्ष में तर्क

• जगजीत सिंह (2006) केस में यह माना गया है कि बाहर से समर्थन देना "पार्टी में शामिल होना" नहीं माना जाता. अगर उन्होंने केवल किसी कार्यक्रम में हिस्सा लिया और समर्थन की घोषणा की, तो यह कानूनी रूप से वैध है.
• याचिकाकर्ता को यह साबित करना होगा कि वे पार्टी में शामिल हुए हैं. बिना सदस्यता फॉर्म, औपचारिक नामांकन या पार्टी में किसी पद के, ऐसा साबित करना मुश्किल है.
• अगर भाजपा खुद यह स्पष्ट कर दे या खंडन कर दे कि वे पार्टी के सदस्य नहीं हैं, तो इससे उन्हें काफी मदद मिलेगी.

दीपक जैन कहते हैं कि केवल किसी कार्यक्रम में शामिल होने या कोई बयान देने से उनकी सदस्यता नहीं जाएगी. इस मामले में पूरी सुनवाई होने के बाद ही सभापति फैसला लेंगे. दोनों सदस्य इतनी आसानी से अपनी सदस्यता नहीं खो सकते.

वरिष्ठ अधिवक्ता राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी को लेकर कहते हैं कि दोनों को सभापति की ओर से जब नोटिस भेजा जाए तो उसका बाकायदा जवाब दाखिल करना चाहिए और स्पष्ट करना चाहिए कि वे पार्टी में शामिल नहीं हुए हैं. इसके समर्थन में हलफनामे और पार्टी का बयान पेश करना चाहिए.

उन्हें पार्टी के ऐसे किसी भी कार्यक्रम, झंडे या पोस्ट से दूर रहना चाहिए, जिसे पार्टी में शामिल होने के रूप में देखा जा सकता हो.

Add Zee News as a Preferred Source
TAGS:

About the Author

इंडस्ट्री में 2 दशकों का अनुभव है तो खबरों की बाजीगरी आती है. डिजिटल मीडिया में आधे दशक हो चुके हैं. लंबे समय तक प्रिंट मीडिया में काम करना डिजिटल की दुनिया में मददगार साबित हुआ. दैनिक जागरण से शुरू हुआ सफर, अमर उजाला, हिन्दुस्तान, News Nation, ABP और India Ahead होते हुए Z Bihar Jharkhand तक पहुंचा है. बिहार और झारखंड की स्थानीय और राजनीतिक खबरों की विशेष समझ.
Read More

ZEENEWS TRENDING STORIES