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बिहार के भागलपुर में शिक्षा विभाग के भीतर कथित फर्जीवाड़े की ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने सरकारी व्यवस्था और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. कागजों पर तनुश्री नाम की शिक्षिका की नियुक्ति दिखाई गई, लेकिन ऐसी कोई शिक्षिका विद्यालय में थी ही नहीं. फिर भी उसके नाम पर सरकारी खजाने से वेतन और एरियर की रकम जारी होती रही. मई 2025 से जुलाई 2026 के बीच करीब 52 लाख रुपये की निकासी हो गई. जाहिर है, फर्जी दस्तावेजों और बैंक खातों के जरिए सरकारी भुगतान प्रणाली को चकमा दिया गया और सबसे बड़ा सवाल यह कि जिस विभाग में शिक्षकों के वेतन का हिसाब रखा जाता है, वहां इतनी बड़ी गड़बड़ी समय रहते पकड़ में क्यों नहीं आई? इस मामले में जोगसर थाने में 6 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने की बात सामने आई है. संविदाकर्मी अविनाश राज को हिरासत में लिए जाने और डीपीओ शशि चंद चौधरी से पूछताछ की खबर के बीच अब जांच की दिशा पर सबकी नजर है.
क्या अकेले कंप्यूटर ऑपरेटर अकेले ये फर्जीवाड़ा कर सकता है?
इनलोगों पर आरोप है कि फर्जी पहचान और PRAN नंबर के जरिए बैंक खाते तैयार किए गए और वेतन भुगतान की प्रक्रिया में कथित तौर पर हेरफेर कर सरकारी राशि ट्रांसफर कराई गई, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह खेल केवल एक कंप्यूटर ऑपरेटर तक सीमित था या फिर भुगतान की पूरी प्रक्रिया में कई स्तरों पर चूक हुई?
अगस्त, 2026 में करीब 46 लाख रुपये की राशि खाते में भेजे जाने और उसके बाद बैंक की ओर से खाता फ्रीज किए जाने की बात भी सामने आई है. इसके अलावा 73 लाख रुपये के कथित ट्रांसफर प्रयास को भी बैंक द्वारा रोके जाने का दावा किया गया है.
जवाब मांगते सवाल
सवालों के जवाब जांच की दिशा से स्पष्ट होंगे
अब छह लोगों के खिलाफ दर्ज एफआईआर के बाद जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है पूरे लेनदेन की कड़ियों को जोड़ने की. साथ ही कथित फर्जी खातों तक पहुंचना और यह पता लगाना कि निकाली गई राशि कहां गई? इन सवालों के जवाब जांच और कानूनी प्रक्रिया के आगे बढ़ने के साथ ही सामने आएंगे. जिस तरीके से घोटाला हुआ, ऐसे में साफ कहा जा सकता है कि यहां एक बार फिर सृजन घोटाला पार्ट 2 की तैयारी थी.
रिपोर्ट: अश्वनी कुमार