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पटना की पहचान गोलघर एक बार फिर आम जनता के लिए खुलने वाला है. बिहार के कला संस्कृति विभाग के मंत्री प्रमोद कुमार चंद्रवंशी ने इसके संकेत दिए हैं. उन्होंने कहा कि गोलघर के दिन अब बदलने वाले हैं. जल्द ही लोगों को पटना की तरह गोलघर भी चकाचक दिखेगा. मंत्री प्रमोद चंद्रवंशी ने कहा कि अगर आप पटना आए और गोलघर नहीं चढ़े तो क्या किए, ऐसे में यह ऐतिहासिक धरोहर एक बार फिर से लोगों के लिए नए रूप एवं नए रंग में दिखेगा. उन्होंने बताया कि भवन निर्माण विभाग गोलघर और सीढ़ियों की मरम्मत का काम करेगा. इसमें लगभग 20 करोड़ रुपये खर्च होंगे. निर्माण पूरा होने में करीब 6 महीना लगेगा.
बता दें कि जून 2016 को लेकर पूर्वी तरफ वाली सीढ़ी बंद कर दी गई थी. इसके बाद एएसआई की देखरेख में जीर्णोद्धार हुआ. इसके कुछ दिनों बाद ही गोलघर को पूरी तरह बंद कर दिया गया था. तब से पार्क में लोग आते हैं और गोलघर को भी देखते हैं, लेकिन गोलघर पर चढ़ने की अनुमति नहीं है. अब कला संस्कृति विभाग ने बड़ी पहल की है. अगर सब कुछ अच्छा रहा तो 6 महीने बाद फिर गोलघर पर चढ़कर पटना देखा जा सकता है. इसके जीर्णोद्धार में लगभग 20 करोड़ रुपये खर्च होंगे.
कब और क्यों बना था गोलघर?
1770 में पड़े भीषण अकाल में करीब एक करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हुए थे. तत्कालीन गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग को अनाज की सुरक्षित भंडारण व्यवस्था की आवश्यकता महसूस महसूस होने पर इसका निर्माण हुआ. तब उन्होंने पटना में अनाज के भंडारण के लिए गोलघर का निर्माण करवाया था. इतिहासकारों के मुताबिक, 1784 में ब्रिटिश इंजीनियर कैप्टन जॉन गास्टिन के नेतृत्व में गोलघर का निर्माण कार्य शुरू हुआ था और 1786 में इसे पूरा किया गया था. शुरुआती दिनों में इसका मालिकाना हक ईस्ट इंडिया कंपनी के पास था, लेकिन 1857 के विद्रोह के बाद यह अंग्रेजी सरकार के अधीन आ गया. वर्तमान समय में इसकी देखरेख पटना नगर निगम द्वारा किया जा रहा है.