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27 मई, 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में बिहार में हुए स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी एसआईआर को सही ठहराया था. इसलिए, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिकाओं की सुनवाई के बाद बिहार SIR के रद्द होने की संभावना कम है. इनमें असली खतरा उन फैसलों से है, जो कथित तौर पर आयोग की सामूहिक सहमति के बिना लिए गए थे, खासकर जुलाई 2026 में फॉर्म 6 में किए गए बदलाव के संबंध में.
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने 5 अक्टूबर, 2026 को भारत निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया. कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त को एकतरफा तरीके से निलंबित करने से इनकार कर दिया. हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि उसने फॉर्म 6 के किसी भी संशोधित संस्करण को मंजूरी नहीं दी है.
यहां एक बात साफ करना जरूरी है. याचिकाओं में लगाए गए आरोप सिर्फ़ आरोप ही हैं. कोर्ट ने उनमें से किसी को भी सही नहीं माना है और चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज किया है.
फॉर्म 6 वह कानूनी फॉर्म है जिसके ज़रिए कोई नया वोटर, खासकर पहली बार वोट देने वाला युवा, वोटर लिस्ट में अपना नाम शामिल करने के लिए आवेदन करता है. यह 'रजिस्ट्रेशन ऑफ़ इलेक्टर्स रूल्स, 1960' के तहत तय किया गया है.
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिकाओं में आरोप लगाए हैं कि जुलाई 2026 में फॉर्म 6 में बदलाव किया गया था, जिसमें आवेदकों को यह बताना ज़रूरी कर दिया गया कि क्या वे, उनके माता-पिता या उनके दादा-दादी पिछली SIR की वोटर लिस्ट में शामिल थे. याचिका में कहा गया है कि यह बदलाव ECINet/ERONet पोर्टल पर किया गया था.
मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों में मतभेद: याचिकाओं में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कई फैसलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं. याचिका के अनुसार, जोशी ने कहा था कि फॉर्म 6 एक कानूनी फॉर्म है, इसलिए नियमों में संशोधन की प्रक्रिया का पालन किए बिना इसमें बदलाव नहीं किया जा सकता. यह भी आरोप है कि 2:1 के विरोध के बावजूद ये फ़ैसले लागू किए गए.
चुनाव आयोग का पक्ष: 26 सितंबर, 2026 को पूरे चुनाव आयोग की बैठक के बाद, ECI ने कहा कि उसके बड़े फ़ैसले सामूहिक और सर्वसम्मति से लिए गए थे. उसका कहना है कि फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं किया गया है, केवल एक घोषणापत्र अलग से लागू किया गया था. चुनाव आयोग ने साफ़ कर दिया है कि SIR के अलावा, 1960 के नियमों के तहत तय फ़ॉर्म लागू रहेंगे और दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने इस घोषणा को सही ठहराया है.
क्या हैं कानूनी पेच: 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' की धारा 28 के तहत, केंद्र सरकार ECI से सलाह लेने के बाद इस नियमों में संशोधन कर सकती है. असली सवाल यह है कि क्या किसी कानूनी फ़ॉर्म के साथ सिर्फ़ प्रशासनिक निर्देशों या पोर्टल-स्तर पर बदलाव के ज़रिए कोई नई शर्त जोड़ी जा सकती है. अगर कोर्ट इसे असल में संशोधन मानता है, तो इसे 'अल्ट्रा वायर्स' (अधिकार क्षेत्र से बाहर) माना जा सकता है.

• यह घोषणा कि अनुच्छेद 324 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल चुनाव आयोग को एक बहु-सदस्यीय निकाय के तौर पर करना चाहिए, न कि अकेले CEC को.
• CEC के ख़िलाफ़ 'को वारंटो' (अधिकार-पृच्छा) रिट और फ़ैसले तक उन्हें सस्पेंड करने की मांग.
• यह घोषणा कि पूरी सहमति के बिना लिए गए फ़ैसले, निर्देश और सॉफ़्टवेयर में किए गए बदलाव शुरू से ही अमान्य (void ab initio) हैं.
• फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को हटाना और मूल कानूनी फ़ॉर्म को बहाल करना.
• रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना और सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में जांच आयोग या SIT का गठन.
• एक याचिका में 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' की धारा 32 के तहत मुक़दमा चलाने की भी मांग.
5 अक्टूबर, 2026 की सुनवाई में, कोर्ट ने तीन बातें तय कीं: नोटिस जारी किया गया, कोई सस्पेंशन नहीं हुआ और फॉर्म 6 में बदलाव को कोर्ट की मंज़ूरी मिलने के दावे को खारिज कर दिया गया.
1. एकतरफा सस्पेंशन नहीं: CJI जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने CEC ज्ञानेश कुमार को सुने बिना उन्हें सस्पेंड करने से इनकार कर दिया. इसने ECI, केंद्र सरकार और CEC को नोटिस जारी किया और याचिका को इसी तरह के एक लंबित मामले के साथ जोड़ दिया. इसलिए, CEC अभी अपने पद पर बने हुए हैं.
2. फॉर्म 6 पर स्पष्ट टिप्पणी: CJI ने कहा कि कोर्ट ने किसी भी संशोधित फॉर्म 6 को मंज़ूरी नहीं दी है और एक बार रिकॉर्ड पेश किए जाने के बाद, वह जांच करेगा कि बदलाव किसने किया. यह सीधे तौर पर ECI के 26 सितंबर के उस बयान का खंडन करता है, जिसमें कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट ने घोषणा को बरकरार रखा था.
3. बिहार SIR फैसले से संबंध: कानूनी रिपोर्टों में बताया गया है कि नई घोषणा 27 मई, 2026 के बिहार SIR फ़ैसले के बाद पेश की गई थी. इसलिए, उस फ़ैसले में कोर्ट के पास इसकी जांच करने का कोई मौका नहीं था.
4. चुनाव आयुक्तों को छूट: उसी सुनवाई में, कोर्ट ने टिप्पणी की कि CEC और चुनाव आयुक्तों को जजों से भी ज़्यादा कानूनी छूट मिलती है. उस छूट को चुनौती देने वाली एक अलग याचिका पहले से ही लंबित है.
यह मुद्दा नया नहीं है. TN शेषन बनाम भारत संघ (1995) मामले में, संविधान पीठ ने बहु-सदस्यीय आयोग और बहुमत से निर्णय लेने की व्यवस्था को बरकरार रखा था. कानून के तहत, आयोग का कामकाज जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से और जहां सदस्य असहमत हों, वहां बहुमत से किया जाना चाहिए. अब कोर्ट को यह तय करना है कि रिकॉर्ड के आधार पर, विवादित फैसले इस कसौटी पर खरे उतरते हैं या नहीं.
कानूनी तौर पर, बिहार SIR की मुख्य प्रक्रिया काफी हद तक सुरक्षित है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही एक अंतिम फैसले में इसे सही ठहरा चुका है. कोई भी असर मुख्य रूप से उन बाद के कदमों पर पड़ेगा, जिनके बारे में यह साबित हो जाए कि वे सामूहिक सहमति के बिना उठाए गए थे. बिहार SIR को 2025 में एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चलाया गया था. ड्राफ्ट रोल से लगभग 65 लाख नाम हटा दिए गए थे और फाइनल रोल में लगभग 7.42 करोड़ वोटर थे. 'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत निर्वाचन आयोग' मामले में, CJI सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने 27 मई, 2026 को सर्वसम्मति से SIR को सही ठहराया था.
| पहलू | संभावित असर | कानूनी कारण |
|---|---|---|
| 2025 का बिहार SIR और फाइनल वोटर लिस्ट | कम | 27 मई 2026 का फैसला अंतिम है; इसे फिर से खोलने के लिए रिव्यू या क्यूरेटिव पिटीशन जैसे अलग रास्ते की ज़रूरत होगी. |
| 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे | लगभग कोई नहीं | अनुच्छेद 329(b) के तहत, चुनाव को केवल चुनाव याचिका के ज़रिए ही चुनौती दी जा सकती है और 45 दिन की समय-सीमा खत्म हो चुकी है. |
| जुलाई 2026 के बाद बिहार में नए आवेदन (अगर नई शर्त लागू होती है) | मध्यम | अगर कोर्ट उस शर्त को गैर-कानूनी मानता है, तो वह उस आधार पर रोके गए आवेदनों पर फिर से विचार करने का निर्देश दे सकता है. |
| SIR के बाद सहमति के बिना किए गए आदेश, डेटाबेस या सॉफ्टवेयर में बदलाव | ज़्यादा, अगर आरोप साबित हो जाते हैं | बहुमत के बिना लिया गया फैसला आयोग का फैसला नहीं माना जाता. |
| दूसरे राज्यों में भविष्य की SIR प्रक्रियाएं | ज़्यादा | कोर्ट फैसला लेने की प्रक्रिया पर बाध्यकारी गाइडलाइंस तय कर सकता है. |
एक याचिका में यह घोषणा करने की भी मांग की गई है कि कानूनी अधिकार न होने के कारण SIR और उससे जुड़े कदम अमान्य हैं. हालांकि, बिहार के मामले में, यह मांग 27 मई के फैसले से टकराती है, जिसमें SIR को आयोग के अधिकारों के दायरे में माना गया था. कोर्ट किसी नई रिट याचिका में अपने हालिया संवैधानिक फैसले को आसानी से नहीं पलटता.
फॉर्म 6 का बिहार से क्या संबंध है: फॉर्म 6 की नई शर्त बिहार SIR और उसके फैसले के बाद आई थी. अगर कोर्ट इसे गैर-कानूनी भी मानता है, तो बिहार की पहले से फाइनल हो चुकी वोटर लिस्ट पर इसका सीधा असर कम ही होगा. इसका असर उन युवा और नए आवेदकों पर पड़ सकता है, जिनके आवेदन इस शर्त की वजह से रुके हुए थे या खारिज कर दिए गए थे.
• विवादित फैसलों को रद्द कर सकता है, साथ ही पहले से पूरी हो चुकी कार्रवाई को सुरक्षित रखने के लिए फैसले को भविष्य से लागू कर सकता है.
• निर्देश दे सकता है कि प्रभावित आवेदकों को आवेदन करने या अपनी बात रखने का नया मौका दिया जाए.
• मूल कानूनी फॉर्म 6 को बहाल कर सकता है.
• रिकॉर्ड की जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति या SIT का गठन कर सकता है.
• आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया पर दिशानिर्देश तय कर सकता है.
यह भी याद रखना चाहिए कि रिकॉर्ड की जांच के बाद कोर्ट ECI के पक्ष में फैसला सुना सकता है. अगर रिकॉर्ड से पता चलता है कि फैसले सामूहिक थे, तो याचिकाएं खारिज की जा सकती हैं.
अगर CEC ज्ञानेश कुमार सुप्रीम कोर्ट के मामले में फंस जाते हैं, यानी कोर्ट को लगता है कि उन्होंने अकेले ही आयोग की सामूहिक शक्ति का इस्तेमाल किया, तो इसका सबसे बड़ा असर नए फॉर्म 6 की शर्त और SIR के बाद के विवादित फैसलों पर पड़ेगा, न कि बिहार के 2025 के SIR पर.
बिहार SIR को सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले से सुरक्षा मिली हुई है, और 2025 के चुनाव नतीजे अनुच्छेद 329(b) के दायरे में सुरक्षित हैं. फिर भी, यह मामला एक बड़े संवैधानिक सवाल का फैसला करेगा- क्या अनुच्छेद 324 के तहत बना आयोग किसी एक व्यक्ति की मर्जी से चल सकता है, या इसे वास्तव में कई सदस्यों वाली संस्था के तौर पर काम करना चाहिए?
वोटरों के लिए एक व्यावहारिक बात: जिस किसी का भी फॉर्म 6 आवेदन नई शर्त की वजह से रुका या खारिज हुआ था, उसे आवेदन, पावती और खारिज करने के आदेश की कॉपी अपने पास रखनी चाहिए. अगर कोर्ट राहत देता है, तो ये दस्तावेज दावे को फिर से शुरू करने में मदद करेंगे. पूरी तस्वीर अगली सुनवाई और ECI के जवाब के बाद ही साफ होगी.