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Analysis: बिहार की बाढ़.. पानी उतर जाएगा लेकिन क्या संकट भी उतर जाएगा?

बिहार में बाढ़ आती नहीं है, बिहार में बाढ़ लौटती है. सवाल यह है कि हर साल लौटने वाली बाढ़ के बावजूद हमारी तैयारी इतनी कमजोर क्यों होती है? आखिर बिहार की बाढ़ का अंत कब होगा? या हमने बाढ़ को ही बिहार की नियति मान लिया है?

Analysis: बिहार की बाढ़.. पानी उतर जाएगा लेकिन क्या संकट भी उतर जाएगा?
Image Credit: Bihar Flood Zee Archive Photo

सितंबर 2026 में बिहार के 15 जिलों के 87 प्रखंडों और 575 ग्राम पंचायतों में 48 लाख से ज्यादा लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं. नेपाल और स्थानीय इलाकों में लगातार हो रही भारी बारिश के कारण गंगा, कोसी और गंडक सहित राज्य की लगभग 8 प्रमुख नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं.

प्रशासन ने राहत शिविर, सामुदायिक रसोई, नाव और एनडीआरएफ-एसडीआरएफ की टीमें लगाई हैं. पानी कुछ जगहों पर घटने लगा है लेकिन खतरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 1,251 सामुदायिक रसोई, 13 राहत शिविर और करीब 1,790 नावें राहत कार्य में लगाई गई हैं. ये आंकड़े सरकार की सक्रियता बताते हैं. लेकिन एक दूसरा आंकड़ा कौन बताएगा? इन 48 लाख लोगों में कितने लोगों की फसल गई?

कितने घर क्षतिग्रस्त हुए? कितने पशु मरे? कितने छोटे कारोबार बंद हुए? और सबसे महत्वपूर्ण कि अगली बाढ़ आने से पहले इनमें से कितने परिवार आर्थिक रूप से संभल पाएंगे? यही वह आंकड़ा है जो बाढ़ की असली कीमत बताएगा.

विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों का मानना है कि बिहार की भौगोलिक स्थिति बाढ़ को बेहद जटिल बनाती है. हिमालय से आने वाली नदियां भारी मात्रा में गाद लेकर आती हैं. कोसी, गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, घाघरा और गंगा जैसी नदियों का पूरा नदी तंत्र एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है.

हालिया बाढ़ में भी ये स्थिति सिर्फ स्थानीय बारिश से नहीं बनी है. गंगा के ऊंचे जलस्तर ने उसकी सहायक नदियों में बैकवाटर इफेक्ट पैदा किया, जिससे पानी की निकासी प्रभावित हुई. नदी में गाद जमने और चैनल की क्षमता घटने ने समस्या को और गंभीर बनाया.

बाढ़ प्राकृतिक है लेकिन तबाही?

बिहार में बाढ़ को अक्सर प्रकृति का कहर कहकर बात खत्म कर दी जाती है. लेकिन अगर हर साल यही होता है तो इसे केवल प्राकृतिक आपदा कैसे कहा जा सकता है?

जो आपदा हर साल आती है, क्या वह आपदा है या हमारी व्यवस्था की स्थायी विफलता? जब हमें पता है कि पानी कहां से आएगा, किस रास्ते से आएगा और किन इलाकों को डुबो सकता है तो फिर हर साल वही गांव अचानक 'बाढ़ प्रभावित' कैसे हो जाते हैं?

हालांकि इस बार की बाढ़ ने एक पुरानी कहानी पर नया सवाल खड़ा किया है.

इस साल का एक तथ्य विशेष रूप से चौंकाने वाला है. बिहार में मानसून के दौरान बारिश सामान्य से कम थी. सितंबर की शुरुआत तक राज्य में सूखे जैसे हालात की चर्चा थी.

फिर अचानक गंगा और दूसरी नदियों का जलस्तर बढ़ा और बाढ़ ने लाखों लोगों को अपनी चपेट में ले लिया.

यानी इस बार कहानी सिर्फ यह नहीं है कि बहुत बारिश हुई इसलिए बाढ़ आई.

तो फिर सवाल है कि क्या हमारी बाढ़ नीति अभी भी पिछली सदी की मौसम संबंधी धारणाओं पर टिकी हुई है? अगर कम बारिश वाले साल में भी इतनी बड़ी बाढ़ आ सकती है, तो क्या हमारे फ्लड मॉडल बदल रहे हैं?

इसके लिए हम क्या तैयारी कर रहे हैं? क्या नदी बेसिन को एक इकाई मानकर योजना बन रही है? क्या गंगा के बढ़े जलस्तर और उसकी सहायक नदियों के बीच संबंध को पर्याप्त रूप से समझा जा रहा है?  

या हम अब भी वही पुराना सवाल पूछ रहे हैं कि पानी कहां से आया? जबकि असली सवाल होना चाहिए कि पानी गया क्यों नहीं?

क्या समाधान सिर्फ बिहार के भीतर है?

बिहार की कई प्रमुख नदियों का स्रोत नेपाल और हिमालयी क्षेत्र से जुड़ा है. इसलिए बिहार की बाढ़ का समाधान सिर्फ पटना के किसी दफ्तर में बैठकर नहीं निकलेगा.

इसके लिए सीमा पार जल प्रबंधन, मौसम संबंधी डेटा साझा करने, बांधों और जलाशयों के समन्वित संचालन और बेसिन लेवल प्लानिंग की जरूरत है.

यह सवाल भी उठता है कि क्या भारत और नेपाल के बीच बाढ़ प्रबंधन को उतनी प्राथमिकता मिलती है जितनी हर साल आने वाली बाढ़ इसकी मांग करती है. शायद इसका उत्तर नकारात्मक ही है.

फरक्का बैराज, गाद और गंगा के जलप्रवाह को लेकर बिहार में लंबे समय से बहस होती रही है. ऐसे में यह विषय राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा वैज्ञानिक अध्ययन की मांग करता है. क्योंकि सवाल किसी सरकार या किसी दल का नहीं है. सवाल बिहार का है.

पानी उतरना राहत नहीं, एक नया संकट है

अभी सबसे खतरनाक भ्रम यही है कि पानी घटने लगा तो खतरा भी घट गया. ऐसा जरूरी नहीं है. जलस्तर में तेजी से गिरावट से भी तटबंधों और दूसरी संरचनाओं पर दबाव की स्थिति बन सकती है. प्रशासन को इस चरण में भी विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं. लेकिन उससे आगे का खतरा?

बाढ़ का सबसे बड़ा खतरा कई बार पानी के साथ नहीं आता. वह पानी के जाने के बाद आता है. गांवों में जमा गंदा पानी, सड़ते पशु, दूषित हैंडपंप, खराब हो चुके शौचालय,  मच्छरों का प्रकोप, त्वचा रोग, डायरिया, बुखार मंजर को भयावह बनाते हैं.

हालिया बाढ़ के बीच दूषित पानी से संक्रमण और जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ने की रिपोर्टें सामने आई हैं और प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए 'बोट एंबुलेंस' जैसी पहल की गई है. लेकिन असली परीक्षा बोट एंबुलेंस की नहीं है.

असली परीक्षा यह है कि पानी उतरने के 15 दिन बाद गांव की स्वास्थ्य व्यवस्था कैसी होगी? या फिर 30 दिन या तीन महीने बाद कैसी होगी?

क्या किसी सरकारी एजेंसी के पास इसका सार्वजनिक डैशबोर्ड है कि कितने गांवों में पीने का पानी दूषित है, कितने हैंडपंप खराब हैं, कितने स्कूल क्षतिग्रस्त हैं और कितने परिवारों को अब भी घर लौटना बाकी है? अगर नहीं है तो क्यों नहीं?

स्थायी समाधान की फाइल कहां है?

मशहूर लेखक फणीश्वरनाथ रेणु ने 1975 की बाढ़ को सिर्फ देखा नहीं था उसे जिया था. उनके रिपोर्ताज में बाढ़ सिर्फ पानी नहीं थी. वह भूख थी, बीमारी थी, बेबसी थी, टूटते घर थे और पानी उतरने के बाद बची हुई एक ऐसी जिंदगी थी जिसे फिर से खड़ा करने की कोई गारंटी नहीं थी.

यही रेणु की रिपोर्टिंग की सबसे बड़ी ताकत थी कि उन्होंने नदी का जलस्तर नहीं लिखा उन्होंने इंसान का गिरता हुआ जीवनस्तर लिखा. आज करीब पांच दशक बाद बिहार के सामने तस्वीर बहुत अलग नहीं है.

आज भी सवाल वही है कि बाढ़ के बाद बिहार के उन लाखों लोगों का क्या होगा जिनकी जिंदगी पानी अपने साथ बहा ले गया?

ऐसे में बिहार को हर साल सिर्फ तात्कालिक राहत की तलाश नहीं करनी है बल्कि स्थायी समाधान की फाइल खोजनी होगी.

अगर बिहार में बाढ़ हर साल आने वाली वास्तविकता है तो सरकारों को पांच साल, दस साल और बीस साल की फ्लड मैनेजमेंट स्ट्रेटजी यानी बाढ़ प्रबंधन की रणनीति बनानी होगी.  

हमें बाढ़ का नहीं, जवाबदेही का नक्शा बनाना होगा. बाढ़ को सिर्फ डिजास्टर मैनेजमेंट का विषय मानना बंद करना होगा.

सरकार को इसे गवर्नेंस मैनेजमेंट का विषय मानकर ठीक करना होगा. ताकि अगली बाढ़ आने से पहले वो कह सके कि हमने बिहार की बाढ़ वाली तस्वीर में बदलाव लाया है.

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About the Author

Amit Singh

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अमित सिंह देश के वरिष्ठ पत्रकारों और डिजिटल मीडिया संपादकों में शामिल हैं. राजनीति, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक नीति और सामाजिक मुद्दों पर लेखन का उन्हें 18 वर्षों से अधिक का अनुभव है. अपने लंबे पत्रकारिता करियर में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विषयों की रिपोर्टिंग, विश्लेषण और संपादकीय नेतृत्व किया है. उनकी पहचान तथ्यों पर आधारित, संतुलित और गहन विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. वर्तमान में अमित सिंह Zee News की हिंदी वेबसाइट के संपादक हैं. इस भूमिका में वे संपादकीय दिशा तय करने, विशेष कवरेज की रणनीति बनाने और डिजिटल न्यूज़रूम के संचालन का नेतृत्व करते हैं.पत्रकारिता में उत्कृष्ट योगदान के लिए अमित को देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक Ramnath Goenka Excellence in Journalism Awards से सम्मानित किया जा चुका है. यह सम्मान उनकी पेशेवर विश्वसनीयता, खोजी दृष्टि और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर प्रभावशाली पत्रकारिता का प्रमाण है.अमित ने अपने करियर के दौरान भारत के अग्रणी मीडिया संस्थानों The Wire, Tehelka, Dainik Jagran, Hindustan और Aaj Tak में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में कार्य किया है. उन्हें प्रिंट, टेलीविजन और डिजिटल तीनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है. आप अमित सिंह से सीधे amit.singh@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं.
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