DUSU चुनावः संख्या बल DU में भारी, लेकिन JNU ने मानी बिहारी बौद्धिकता की सरदारी!
ABVP हो या NSUI, दोनों ही छात्र संगठनों ने DUSU चुनाव बिहार से आने वाले किसी छात्र को मुख्य केंद्रीय पैनल में सीधे तौर पर शामिल नहीं किया है. मधुबनी के अनिल झा वत्स ही अकेले बिहारी हैं, जो दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके हैं. वहीं, जेएनयू में अब तक बिहार से आने वाले दो छात्रों को छात्रसंघ अध्यक्ष चुना जा चुका है.
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव का आज (शनिवार, 19 सितंबर) रिजल्ट आने वाला है. यह देश का सबसे बड़ा स्टूडेंट इलेक्शन है. इस बार ABVP और NSUI के बीच कड़ी टक्कर मानी जा रही है. शुक्रवार को हुए मतदान में 40.46 प्रतिशत छात्रों ने वोटिंग की थी. वोटिंग का यह आंकड़ा दिल्ली यूनिवर्सिटी के सभी 52 पोलिंग सेंटर्स से मिले वोटिंग डेटा पर आधारित है. DUSU चुनाव रिजल्ट पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं, क्योंकि कुछ दिनों पहले ही दिल्ली में छात्रों का बड़ा आंदोलन देखने को मिला था. इसके बावजूद DU के कई कॉलेजों में यूनियन चुनाव जीत लिए हैं. बिहार के लिहाज से बात करें तो एक बार फिर से DUSU चुनाव ने बिहारी छात्रों को निराश किया है. ABVP हो या NSUI, दोनों ही छात्र संगठनों ने बिहार से आने वाले किसी छात्र को मुख्य केंद्रीय पैनल में सीधे तौर पर शामिल नहीं किया है. आसान लफ्जों में कहें तो दोनों छात्र संगठनों से किसी बिहारी को चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिला.
DUSU का एकमात्र बिहारी अध्यक्ष कौन?
बता दें कि अब तक केवल एक बिहारी छात्र को दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष बनने का मौका मिला है और वो हैं मधुबनी जिले के रहने वाले अनिल झा वत्स. अनिल झा ने साल 1997–98 में ABVP की टिकट पर DUSU अध्यक्ष पद का चुनाव जीता था. 1996-97 में वे DUSU के उपाध्यक्ष भी रहे थे. बाद में वे दिल्ली की किराड़ी सीट से विधायक हैं. 24 अगस्त 1974 को मधुबनी में जन्में अनिल झा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई की थी. छात्र राजनीति के बाद उन्होंने बीजेपी के साथ सियासत में कदम रखा और साल 2008 में पहली बार किराड़ी सीट से विधायक बने. इसके बाद 2013 के दिल्ली चुनाव भी बीजेपी की टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे. साल 2015 और 2020 के दिल्ली चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 से पहले आम आदमी पार्टी ज्वाइन कर ली और एक बार फिर से विधानसभा पहुंचे.
JNU में 2 बिहारियों का रहा जलवा
दिल्ली विश्वविद्यालय ने भले ही बिहार की युवा प्रतिभा को निराश किया हो, लेकिन JNU ने बिहारी बौद्धिकता की सरदारी को सहर्ष स्वीकार किया है. जेएनयू में अब तक 2 बिहारी छात्रों को छात्रसंघ अध्यक्ष चुना गया है. पहले हैं- चंद्रशेखर प्रसाद (चंदू) और दूसरे- कन्हैया कुमार. चंद्रशेखर प्रसाद चंदू की बेमिसाल भाषण शैली और सादगी के कारण छात्रों में उनका क्रेज था. वे 1993 में JNUSU के उपाध्यक्ष और उसके बाद 1994 और 1995 में लगातार दो बार जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए थे. इसी तरह से बिहार के बेगूसराय जिले में पैदा हुए कन्हैया कुमार भी JNU छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके हैं.
चंद्रशेखर प्रसाद चंदू के बारे में जानिए
20 सितंबर 1964 को बिहार के सीवान जिले में जन्मे चंद्रशेखर प्रसाद को लोग प्यार से उन्हें चंदू कहते थे. सैनिक स्कूल, तिलैया में पढ़ाई के बाद उनका चयन राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में हो गया था, लेकिन आठ साल की उम्र में उनके पिता जीवन सिंह का निधन हो गया. पिता के निधन ने उनके दिलो-दिमाग पर गहरा असर डाला और उनका मन सैन्य सेवा में नहीं लगा. JNU में पढ़ाई के दौरान वे अपने सौन्य स्वभाव, बेमिसाल भाषण शैली और सामाजिक मुद्दों पर गहरी समझ के कारण छात्रों के बीच काफी पॉपुलर हुए. JNU छात्रसंघ अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई. छात्र जीवन से निकलने के बाद उन्होंने CPI (ML) ज्वाइन कर ली और बिहार में 'लाल सलाम' को मजबूत करने निकल पड़े. 1990 के दशक में बिहार में लालू यादव की सरकार थी और सिवान में मोहम्मद शहाबुद्दीन की बादशाहत चलती थी. मो. शहाबुद्दीन के खिलाफ चंद्रशेखर प्रसाद चंदू ने आवाज उठाई. लिहाजा, 31 मार्च 1997 के दिन उन्हें CPI (ML) की एक सभा में सैकड़ों लोगों के सामने गोलियों से छलनी कर दिया गया. मोहम्मद शहाबुद्दीन पर हत्या का आरोप लगा, लेकिन सियासी हस्तक्षेप के कारण वह CBI जांच में भी साफ बच निकला.
कन्हैया कुमार कौन हैं?
कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं में शामिल कन्हैया कुमार भी JNU छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके हैं. बतौर JNU अध्यक्ष उन्हें देशद्रोह के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था. इसी कांड से वह पूरे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गए थे. हालांकि, कन्हैया कुमार ने हमेशा इन आरोपों से इनकार किया है. बिहार के बेगूसराय से संबंध रखने वाले कन्हैया कुमार सितंबर 2015 में जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए थे. फरवरी 2016 में ही दिल्ली पुलिस ने उन्हें JNU परिसर में कथित देशद्रोही नारेबाजी के संबंध में गिरफ्तार कर लिया था. हालांकि, जांच में उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं मिलने पर उन्हें इन आरोपों से बरी कर दिया गया. अप्रैल 2018 में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ सियासत में कदम रखा और 2019 के लोकसभा चुनाव में CPI की टिकट पर बेगूसराय से चुनाव लड़ा, लेकिन बीजेपी के गिरिराज सिंह के हाथों करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा. 2021 में, वे कांग्रेस में शामिल हो गए और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें उत्तर पूर्वी दिल्ली सीट से चुनाव लड़वाया. यहां वे बीजेपी के मनोज तिवारी से हार गए. सियासी करियर में कुछ खास हासिल नहीं करने के बावजूद वे राहुल गांधी की कोर टीम का हिस्सा माने जाते हैं.