App

बिहार में चिराग के दलित दांव का डंका: अब यूपी के रास्ते देश में जलवा दिखाने की तैयारी!

जैसा कि जीतनराम मांझी ने पिछली दफे कहा था कि हमारा सपना है कि हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा भी राष्ट्रीय पार्टी बने, उसी तरह हर राजनेता की तमन्ना होती है. चिराग पासवान भी यही चाहत रखते हैं. यह चाह रखने और उसे हासिल करने में मुश्किलें भले आ सकती हैं, लेकिन ऐसा न करना भविष्य के लिए आत्मघाती जरूर हो सकता है.

बिहार में चिराग के दलित दांव का डंका: अब यूपी के रास्ते देश में जलवा दिखाने की तैयारी!
Image Credit: चिराग पासवान, केंद्रीय मंत्री और लोजपा रामविलास प्रमुख (File Photo)

लोजपा में विभाजन के बाद चिराग पासवान ने एक तरह से जीरो से शुरुआत की है और लोकसभा चुनाव, 2024 में 100 प्रतिशत स्ट्राइक रेट के साथ 5 में से 5 सीटें जीतकर अपना लोहा मनवा दिया है. लोकसभा चुनाव की तरह विधानसभा चुनाव, 2025 में भी उनकी पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास ने शानदार स्ट्राइक रेट का प्रदर्शन दोहराया. अब वे पार्टी और परिवार को लगे झटकों से उबर चुके हैं और खुले आसमान में पंख फैलाने को आतुर दिखते हैं. अब उनका सपना बिहार की सीमाओं से निकलकर पूरे देश के सियासी अखाड़े में पहचान बनाने के लक्ष्य पर टिक गई है. फिलहाल, उनके सामने उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव है, जहां उन्होंने ऐलान कर दिया है कि अगर एनडीए में सीटों को लेकर सहमति नहीं बनी तो सभी 403 सीटों पर उम्मीदवार उतार सकते हैं. चिराग पासवान के इस कदम को केवल पार्टी का विस्तार करने की नीयत मान लेना गलत होगा. दरअसल, चिराग पासवान खुद को देश की दलित राजनीति का सर्वमान्य चेहरा बनाने की मंशा के साथ आगे बढ़ते दिख रहे हैं.

सिमट रहीं मायावती, उभर रहे चंद्रशेखर

बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती को आज भी देश के सबसे बड़ी दलित नेता माना जाता है. हालांकि, उनकी कम सक्रियता से आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर को अपने दल को विस्तार देने में मदद मिली है. खासतौर से नगीना लोकसभा सीट जीतने के बाद से चंद्रशेखर ने आक्रामक दलित राजनीति करने का एक उदाहरण पेश किया है. बसपा के सिमटते जनाधार और आजाद समाज पार्टी की आक्रामक राजनीति के बीच चिराग पासवान उत्तर प्रदेश में अपने लिए भविष्य तलाश रहे हैं. चिराग पासवान को मायावती से नहीं, चंद्रशेखर से बड़ा खतरा नजर आ रहा है.

युवाओं को भा रही चंद्रशेखर की स्टाइल

पिछले कुछ समय से या यूं कह लें कि नगीना सीट से सांसद चुने जाने के बाद से चंद्रशेखर ने अपने समाज के लोगों के पक्ष में आक्रामक शैली अख्तियार कर ली है. वे सड़क पर उतरकर दलित उत्पीड़न, संविधान, आरक्षण पर खुलकर बोलते हैं और बाबा साहब की विरासत को लेकर चलने का दम भरते हैं. वे सड़कों पर उतरकर टकराव वाली राजनीति करने से भी बाज नहीं आते. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिकारियों में उनको लेकर भय का माहौल है. वे डीएम से लेकर लेखपाल तक को दलित उत्पीड़न एक्ट में फंसाने की धमकी देते नजर आते हैं. उनके इस जुझारूपन से दलित युवाओं में उनकी पैठ मजबूत होती जा रही है.

चिराग को चंद्रशेखर से बड़ा खतरा

चिराग पासवान को यह पता है कि अगर अभी उन्होंने उत्तर प्रदेश या देश के अन्य प्रदेशों में खुद को प्रोजेक्ट नहीं किया तो वे केवल बिहार के दलितों की राजनीति करने वाले नेता के रूप में जाने जाएंगे. साथ ही, मायावती के बाद देश के सबसे बड़े दलित नेता के रूप में चंद्रशेखर स्थापित होते चले जाएंगे. अगर ऐसा हुआ तो बिहार में भी चिराग पासवान की पार्टी को खतरा महसूस होगा. इसलिए चिराग पासवान की रणनीति उत्तर प्रदेश चुनाव में उतरकर मायावती की पार्टी से शिफ्ट हो रहे वोटों को अपनी ओर लाना और चंद्रशेखर की ओर से पैदा हो रहे खतरे से खुद को बचाकर दलित राजनीति के शीर्ष पर स्थापित होना है. यह उनकी मजबूरी भी कही जा सकती है.

प्राथमिकताओं में सबसे आगे बिहार, यूपी में कैसे होगा बेड़ा पार

चिराग पासवान के साथ दिक्कत यह है कि वे अपनी सोशल मीडिया आईडी 'बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट' के नाम से चलाते हैं. वे जब भी कोई बयान देते हैं तो 'बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट' का जिक्र जरूर करते हैं. इससे यह जाहिर होता है बिहार उनकी प्राथमिकताओं में शीर्ष पर है, लेकिन अगर चिराग पासवान लगातार ऐसा ही करते रहे तो फिर उत्तर प्रदेश के दलित वोटरों को एड्रेस नहीं कर पाएंगे. चिराग पासवान बिहार में किसी मुद्दे को लेकर सरकार को घेरते नजर आते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनका विरोध केवल नीतिगत मुद्दों पर ही सामने आता है. वे यूपीएससी के लेटरल एंट्री का विरोध करते हैं, लेकिन किसी राज्य में दलितों को लेकर किसी मसले पर खुलकर नहीं बोलते.

सियासी मर्यादाएं रोक रहीं चिराग पासवान को

चिराग पासवान के ऐसा करने के पीछे एक सियासी मजबूरी है और वह जगजाहिर है. दरअसल, वे खुद को पीएम मोदी का हनुमान बताते हैं और देश के अधिकांश राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं. वे मोदी कैबिनेट में मंत्री भी हैं. इसलिए भाजपा शासित राज्यों में दलितों से जुड़े विवादों या शासन की कमियों के बारे में मुखर नहीं हो पाते. गठबंधन धर्म और मंत्री पद की मर्यादा भी उन्हें आक्रामक होने से रोकती है. यही कारण है कि वे अभी बिहार और बिहारी फर्स्ट की रणनीति पर चलने को मजबूर हैं.

चंद्रशेखर को देख चिराग ने बदली रणनीति

पिछले कुछ दिनों में चंद्रशेखर ने मोदी सरकार और भाजपा की नीतियों की आलोचना कर दलितों का एकमात्र नेता बनने की चाल चली है. उसके बाद से चिराग पासवान ने भी अपनी रणनीति में बदलाव किया है. चिराग पासवान को पता है कि अगर देश की दलित राजनीति में सिक्का जमाना है तो उत्तर प्रदेश को साधे बिना यह मुमकिन नहीं हो सकेगा. इसलिए वे हाल के दिनों में बीजेपी को एक तरह से सियासी संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी पार्टी भी उत्तर प्रदेश की सभी सीटों पर चुनाव लड़ सकती है. उनकी पार्टी को जूनियर पार्टनर न समझा जाए.

यूपी तय करेगा, देश की दलित राजनीति का सिरमौर कौन

यूपी में दलित मतदाताओं की संख्या 21 प्रतिशत है. पूर्वांचल की पासवान बिरादरी में चिराग पासवान की पहले से अपील है, लेकिन वह इतनी प्रभावी नहीं है कि इसी के चलते वे चुनाव में हावी हो जाएंगे. चिराग पासवान की कोशिश इन इलाकों में मौजूदगी दर्ज करना और चुनावों में यहां खाता खोलने की है. यूपी चुनाव यह तय करेगा कि देश की ​दलित राजनीति का सिरमौर कौन होगा. चंद्रशेखर आज जिस तरह की राजनीति कर रहे हैं, वैसा करना और युवा वोटरों के बीच पैठ बनाना चिराग पासवान के लिए आसान नहीं होगा. 

Add Zee News as a Preferred Source

About the Author

Sunil Mishra

Sunil Mishra

इंडस्ट्री में 2 दशकों का अनुभव है तो खबरों की बाजीगरी आती है. डिजिटल मीडिया में आधे दशक हो चुके हैं. लंबे समय तक प्रिंट मीडिया में काम करना डिजिटल की दुनिया में मददगार साबित हुआ. दैनिक जागरण से शुरू हुआ सफर, अमर उजाला, हिन्दुस्तान, News Nation, ABP और India Ahead होते हुए Z Bihar Jharkhand तक पहुंचा है. बिहार और झारखंड की स्थानीय और राजनीतिक खबरों की विशेष समझ.
Read More