बिहार का प्रसिद्ध जितिया पर्व: जानें क्या है मान्यता, कब है उपवास, व्रत विधि और पारण की तिथि
बिहार का प्रसिद्ध जितिया पर्व 2 अक्टूबर से शुरू हो रहा, जो कि 4 अक्टूबर तक चलेगा. इस दिन सुबह उठकर व्रत का संकल्प लिया जाता है. उसके बाद संपूर्ण दिन अन्न और जल का पूरी तरह से त्याग किया जाता है.
बिहार में जितिया व्रत प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण त्योहार है. तीन दिन का बेहद कठिन और पवित्र व्रत, जिसमें वे बिना पानी के रहती हैं और अपने बच्चों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल जीवन की कामना करती हैं. सनातन धर्म में जीवित्पुत्रिका व्रत यानी जितिया व्रत का विशेष महत्व है. यह तीन दिनों का अत्यंत कठिन और पवित्र उपवास है, जिसे माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और विघ्नों से रक्षा के लिए रखती हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि जितिया व्रत कब मनाया जाएगा, व्रत विधि क्या है और साथ ही, पारण की तिथि क्या है?
क्यों किया जाता है जितिया व्रत?
जितिया व्रत माताएं अपने पुत्र की लंबी आयु के लिए रखती हैं. यह व्रत संतान के जीवन में आने वाले विघ्नों को हरने, उनके अच्छे स्वास्थ्य और उनकी समग्र वृद्धि के लिए रखा जाता है. मान्यता है कि इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करने पर संतान पर आने वाले सभी कष्ट दूर हो जाते हैं.
जानें कब है नहाय-खाय?
यह पर्व तीन दिनों तक चलता है. इसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है. इस साल 2 अक्टूबर को नहाय-खाय है. इस दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान-ध्यान करती हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं.
नहाय-खाय में क्या खाया जाता है?
बता दें कि बिहार में कई जगहों पर सतपुतिया (तोरई या झिंगनी) की सब्जी बनाई जाती है. कई जगहों पर मडुआ (रागी) के आटे की रोटी बनाई जाती है. वहीं, कई जगहों पर तो मछली और चावल खाने का रिवाज है. इस दिन नहाय-खाय का पूजन किया जाता है और अगले दिन के कठिन व्रत के लिए मन को तैयार किया जाता है.
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व्रत की विशेष पूजा-अर्चना
व्रत का मुख्य दिन 3 अक्टूबर को है. इस दिन माताएं पूरे 24 घंटे से भी अधिक समय तक निर्जला उपवास रखती हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन सुबह उठकर व्रत का संकल्प लिया जाता है. उसके बाद संपूर्ण दिन अन्न और जल का पूरी तरह से त्याग किया जाता है. यह व्रत बेहद कठोर माना जाता है. प्रदोष काल में इस व्रत की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है.
तरोई के पत्ते की पूजा
बता दें कि जितिया व्रत के दौरान तरोई के पत्तों को बेहद प्राकृतिक, पवित्र माना जाता है. पूजा विधि में भगवान जीमूतवाहन, चील और सियारन की मूर्ति या प्रतीक को स्थापित करने के लिए तोरई के पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है. इस दौरान महिलाएं समूह में कथा सुनती हैं और अपने बच्चों के मंगल की कामना करती हैं.
जानें पारण करने का शुभ मुर्हूत
व्रत का समापन और पारण 4 अक्टूबर, नवमी तिथि को होगा. 4 अक्टूबर को सूर्योदय के बाद पारण किया जाएगा. इस दिन सुबह 7 बजकर 32 मिनट के बाद ही व्रत का पारण शुभ माना गया है. इसके बाद ही महिलाएं अन्न-जल ग्रहण करके अपना व्रत खोलेंगी.
इनपुट: आईएएनएस