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बिहार के लिए बाढ़ ने इस बार भी लाखों लोगों को संताप में पहुंचा दिया और जहां से उन्होंने जिंदगी शुरू की थी, वहीं पहुंचा दिया. लाखों लोगों का घर बाढ़ में समा गया. खाने और पीने के लाले पड़ गए हैं और जनजीवन पूरी तरह अस्त व्यस्त हो गया है. सत्तारूढ़ एनडीए की ओर से सभी विधायकों और विधान पार्षदों ने अपनी एक महीने की सैलरी बाढ़ पीड़ितों के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष में दान की है. दिल्ली के सांसद और भोजपुरी सुपरस्टार मनोज तिवारी ने भी 2 महीने की सैलरी बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए दान की है. वहीं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने 3 महीने की सैलरी दान में दी है. प्रदेश बीजेपी ने पार्टी फंड से 51 लाख रुपये का फंड बाढ़ पीड़ितों के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष में दान देने का ऐलान किया है. पिछले साल पंजाब, गुजरात और हिमाचल प्रदेश के बाढ़ पीड़ितों के लिए 5 महीने की सैलरी दान करने वाले पप्पू यादव ने बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए अभी तक ऐसा कुछ नहीं किया है. हालांकि, वे व्यक्तिगत रूप से लोगों को मदद मुहैया करवा रहे हैं. दूसरी ओर, विपक्ष के किसी भी विधायक, विधान पार्षद और सांसद ने ऐसी किसी भी तकलीफ लेने की सोची भी नहीं है. विपक्ष केवल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर ही बाढ़ पीड़ितों के दर्द पर मरहम लगा रहा है.
एनडीए के 249 MLA-MLCs ने दान की एक महीने की सैलरी
एनडीए के सभी MLA-MLCs ने अपनी एक महीने की सैलरी मुख्यमंत्री राहत कोष में दान दी है. अभी एनडीए के पास 202 विधायक हैं और विधान पार्षदों की संख्या 48 है. कुल मिलाकर यह संख्या 250 हो जाती है. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने चूंकि अलग से 2.70 लाख रुपये मुख्यमंत्री राहत कोष में दान दिया है, तो बाकी बचे 249 MLA-MLCs की सैलरी का कैलकुलेशन कर लेते हैं. भत्तों को छोड़ दें तो बिहार के विधायकों की सैलरी 40 हजार रुपये है. अगर 249 विधायकों और विधान पार्षदों ने अपनी सैलरी दान दी है तो यह करीब 9,960,000 रुपये होता है. अगर इसमें मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की भी दान की गई सैलरी जोड़ दें यह 10,230,000 रुपये होते हैं. प्रदेश बीजेपी की ओर से दिए गए 51 लाख रुपये, नितिन नवीन के 6.35 लाख और मनोज तिवारी की 2 महीने की सैलरी जोड़ेंगे तो यह आंकड़ा और बढ़ जाता है.
विपक्ष के 61 MLA-MLCs ने नहीं किया मदद का कोई ऐलान
दूसरी ओर, विपक्ष के 41 विधायकों और 20 विधान पार्षदों में से किसी ने भी बाढ़ राहत के नाम पर अपनी सैलरी दान करने का ऐलान नहीं किया है. इतना जरूर है कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने बिहार में कांग्रेस कार्यकर्ताओं से व्यक्तिगत तौर पर बाढ़ पीड़ितों के मदद की अपील की है. ऐसे समय में जब बिहार की जनता बाढ़ में डूब रही है तो मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल की ओर से केवल सरकार को कोसा जा रहा है. तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी के विधायक और विधान पार्षद अपने बयानों और प्रेस कांफ्रेंस के अलावा एक्स पर पोस्ट के माध्यम से बाढ़ पीड़ितों के दर्द पर मरहम लगाने की कोशिश कर रहे हैं. राज्यव्यापी आपदा के समय विपक्ष की खामोशी और निष्क्रियता सवाल खड़े कर रही है. तेजस्वी यादव की सक्रियता केवल अपने विधानसभा क्षेत्र राघोपुर के बाढ़ पीड़ितों के लिए है, जहां वे नाव से पीड़ितों का कुशलक्षेम लेने पहुंचे थे.

पंजाब-हिमाचल की बाढ़ में 5 महीने का वेतन देने वाले पप्पू यादव बिहार में खामोश
सबसे बड़ा आश्चर्य तो पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव के दोहरे रवैये को लेकर हो रहा है. पिछले साल गुजरात, पंजाब और हिमाचल प्रदेश बाढ़ में डूब रहे थे, तब पप्पू यादव ने अपनी 5 महीने की सैलरी इन राज्यों के बाढ़ पीड़ितों के नाम पर दान कर दी थी. आज जब बिहार का ज्यादातर हिस्सा बाढ़ में डूबा हुआ है तो उनके पास अपने ही राज्य के पीड़ितों को देने के लिए सैलरी कम पड़ रही है. हालांकि, व्यक्तिगत तौर पर वे बाढ़ राहत सामग्री और पीड़ितों को 500-500 रुपये देने का दावा कर रहे हैं और इसके कुछ वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल किए जा रहे हैं. लेकिन, खुद पप्पू यादव भी नहीं बता सकते कि उन्होंने अब तक बाढ़ पीड़ितों को कितने रुपये दान दिए या उनकी मदद की. और वैसे भी, किसी बाढ़ पीड़ित को 500 रुपये दे देने से उसकी क्या मदद हो जाएगी? जब तक एकमुश्त राशि उनकी मदद के लिए नहीं होगी, उनके पुनर्वास की व्यवस्था कैसे हो सकेगी?
बाढ़ के बीच चमका रीलबाजों और राजनीति चमकाने वालों का धंधा
बिहार की बाढ़ ने फिर से साबित कर दिया है कि पानी के बीच फंसे लोग राजनेताओं के लिए उनकी राजनीति चमकाने का एक जरिया भर हैं. किसी को रील बनाकर मिलियन व्यूज लाने हैं तो किसी को अपनी राजनीति में चार चांद लगाने हैं. बाढ़ पीड़ितों का दर्द मीडिया की हेडलाइंस में ज्यादा दिखता है, राजनेताओं के बयानों में कम. कुछ लोग नेशनल मीडिया की हाईलाइट्स पाने के लिए दूसरे राज्यों में 5 महीने का वेतन दान कर देते हैं और बयान देते हैं कि जरूरत पड़ी तो पूरे साल की सैलरी दान कर दूंगा, लेकिन अपने ही राज्य में जब जलदेवता कुपित हुए तो नाव पर सवार होकर कैमरामैन लेकर 500 रुपये बांटने निकल पड़ते हैं. नेताओं को समझना होगा कि बाढ़ में फंसी जनता को प्रतीकात्मक मदद की नहीं, वास्तविक मदद की जरूरत है, जो संकट के इस दौर में उनके आंसुओं को पोंछ सके.
अगर चुनाव सिर पर होता तो...
फर्ज कीजिए, बिहार में निकट भविष्य में कोई चुनाव होने वाला होता और बाढ़ की इसी तरह विभीषिका होती तो क्या होता? सत्तारूढ़ दल और विपक्षी दलों के सभी विधायक और सांसद कम से कम 6 महीने की सैलरी दान कर चुके होते. अब आसपास कोई चुनाव है नहीं तो ये लोग भी समझ रहे हैं कि बिना मतलब का इन्वेस्टमेंट क्यों करें. चुनाव तो 2029 और 2030 में होने वाले हैं. अगर अभी से ही पैसे लगाने लगे तो बाढ़ तो हर साल की आपदा है, नुकसान बहुत ज्यादा हो जाएगा और पता नहीं फिर भी सत्ता में आ पाएंगे या नहीं. इसलिए राजनीतिक दल और राजनेता बिहार की बाढ़ को लेकर उदासीन हैं. अब जिम्मेदारी सत्तारूढ़ दल या गठबंधन की है. सरकार चला रहे हैं तो दान करने की बेसिक जिम्मेदारी तो उन्हीं की है. विपक्ष तो 2028 से सक्रिय होना शुरू करेगा.