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जिसकी आहट से कांप उठती थी दुनिया, 800 साल बाद भी क्यों नहीं मिल पाई है उसकी कब्र? आखिर कहां दफ्न है 'खूंखार' चंगेज खान

Mystery of Genghis Khan Tomb: चंगेज खान दुनिया का सबसे खूंखार विजेता था, जिसकी आहट मात्र से लोग कांप उठते थे. लेकिन इतना बड़ा विजेता होनै के बावजूद 800 साल बाद भी उसकी कब्र का राज दुनिया के लिए पहेली बना हुआ है.

जिसकी आहट से कांप उठती थी दुनिया, 800 साल बाद भी क्यों नहीं मिल पाई है उसकी कब्र? आखिर कहां दफ्न है 'खूंखार' चंगेज खान

Where is Genghis Khan Tomb? दुनिया के इतिहास में एक से बढ़कर सम्राट और सुल्तान हुए हैं, जिन्होंने अपने जीवनकाल में पृथ्वी के बड़े भूभाग को जीतने के लिए अभियान चलाए. इन्हीं में से एक मंगोल साम्राज्य का संस्थापक चंगेज खान (Genghis Khan) भी था. जिसने दुनिया में एक बड़ा खूनी अभियान चलाकर कोरिया से लेकर कैस्पियन सागर तक के इलाके को अपने कब्जे में ले लिया था. उसका साम्राज्य रोमन एंपायर से भी दोगुने क्षेत्र पर फैला हुआ था.

जिसके आने की आहट से खौफ में भर जाते थे लोग

अपनी विश्वविजय की चाहत को पूरा करने के लिए उसने दुनिया में लाखों लोगों का कत्ल करवा दिया और लाखों बच्चों को अनाथ कर दिया. उसके आने की आहट से ही देशों में खौफ भर जाता था. दहशत के पर्याय बन चुके चंगेज खान की वर्ष 1227 में मौत हो गई. इस घटना को 800 वर्षों से अधिक का समय बीत चुका है. इसके बावजूद, उसकी कब्र का आज तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है.

कई इतिहासकार इसे चंगेज खान की 'अंतिम विजय' देते हैं, क्योंकि उसने जीते-जी अपनी पहचान और मरने के बाद अपनी अंतिम विश्राम स्थली को दुनिया की नज़रों से इस तरह ओझल कर दिया कि आधुनिक तकनीक और उपग्रहों के दौर में भी पुरातत्वविद् उसकी कब्र खोजने में असमर्थ रहे हैं.

'तेमुचिन' से कैसे बना 'चंगेज खान'?

इतिहासकारों के मुताबिक, चंगेज खान का जन्म लगभग 1162 ईस्वी में मंगोलिया के एक घुमंतू कबीले में हुआ था. कहा जाता है कि जब वह पैदा हुआ था, तो उसकी मुट्ठी में खून का एक थक्का जमा हुआ था. यही वजह है कि बचपन में उसका नाम 'तेमुचिन' रखा गया. जब वह मात्र नौ वर्ष का था, तब एक प्रतिद्वंद्वी कबीले ने उसके पिता को ज़हर देकर मार डाला. दुश्मनों के कहर से खुद को बचाने के लिए उसके अपने कबीले तेमुचिन के परिवार से दूरी बनाते हुए उसे खुले मैदानों में भूखों मरने के लिए छोड़ दिया था.

बचपन में बेहद कठिनाइयों और अकेलेपन का सामना करने के बावजूद, तेमुचिन ने हार नहीं मानी. उसने मंगोलिया के बिखरे हुए कबीलों को एकजुट किया. इसके बाद वर्ष 1206 में, मंगोल नेताओं ने उसे 'चंगेज खान' की उपाधि दी. इसका अर्थ 'सार्वभौमिक शासक' या 'सब कुछ का राजा' होता है. इसके बाद उसने विश्व विजय का अपना क्रूर अभियान शुरू किया. अपनी असाधारण रणनीतिक सोच, योग्यता आधारित सैन्य प्रणाली और क्रूर अनुशासन के बल पर उसने कुछ ही समय में दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्य स्थापित कर लिया.

चीन के खिलाफ जंग में हुई मौत

लाखों लोगों का खून बहाने के बाद चंगेज खान की मौत चीन शिया जिया साम्राज्य के खिलाफ अभियान के दौरान 1227 में हुई थी. मंगोल संस्कृति और समकालीन स्रोतों में मृत्यु जैसे विषयों पर खुलकर चर्चा नहीं की जाती थी. इसी वजह से उसकी मौत को लेकर तरह-तरह की अजीबोगरीब अफवाहें फैल गईं. कोई कहता था कि वह घोड़े से गिरकर मरा, तो किसी का कहना था कि युद्ध के दौरान उसे तीर लगा या बिजली गिरी.

चंगेज खान की आखिरी इच्छा थी कि उसका अंतिम संस्कार पूरी तरह से गुप्त रखा जाए और उसकी कब्र का किसी को पता न चले. उसकी इस इच्छा को पूरा करने के लिए उसके सैनिकों ने खौफनाक और कठोर कदम उठाए.

साक्षियों का खात्मा कर दिया गया

उसके शव को लेकर मंगोलिया के पवित्र पर्वतों की ओर ले जाया गया. यह सफर 40 दिनों का था. इस दौरान रास्ते में मिलने वाले हर इंसान और जानवर को सैनिकों ने मौत के घाट उतार दिया. जिससे कोई भी मार्ग या अंतिम स्थल का गवाह न बच सके.

घोड़े दौड़ाकर जमीन को किया गया समतल

अज्ञात स्थल पर कब्र खोदने के बाद शव को उसमें दफना दिया गया. इसके बाद वहां पर हज़ारों घोड़ों को दौड़ा दिया गया ताकि जमीन का प्राकृतिक स्वरूप ही बदल जाए और कोई न बता सके कि चंगेज खान को कहां दफनाया गया था. कुछ लोगों का कहना है कि कब्र समेत आसपास की तमाम जमीनों पर पेड़ रोपकर उसकी शेप ही बदल दी गई.

कब्र खोदने वालों की भी कर दी गई हत्या

सैनिकों ने चंगेज खान की मौत की गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए उन लोगों और सैनिकों को भी मार दिया, जिन्होंने  सम्राट की अंतिम संस्कार और दफनाने की प्रक्रिया को अंजाम दिया था.

क्या इस इलाके में दफ्न है चंगेज खान?

यही वजह है कि 800 साल बाद भी चंगेज खान की कब्र को लेकर रहस्य कायम है. इतिहासकारों का मानना है कि चंगेज खान का मकबरा मंगोलिया की पवित्र पर्वत श्रृंखला 'बर्खान खल्डुन' (Burkhan Khaldun) के आसपास कहीं छिपा हुआ है. इस स्थल के प्रति मंगोलों की गहरी आस्था रही है.

इस रहस्य को बनाए रखने में 'दर्खाद' (Darkhad) नामक योद्धा कबीले ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई. बाद के मंगोल शासकों ने इस पूरे पर्वतीय क्षेत्र को 'निषिद्ध क्षेत्र' (Forbidden Zone) घोषित कर दिया और इस कबीले को वहां की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी. दर्खाद रक्षकों ने लगभग 700 वर्षों तक इस क्षेत्र पर कड़ा पहरा दिया और किसी भी बाहरी व्यक्ति या घुसपैठिए को वहां भटकने नहीं दिया. वर्ष 1924 में मंगोलियाई पीपल्स रिपब्लिक की स्थापना के बाद कबीले का यह आधिपत्य खत्म हो गया.

आज तक दुनिया नहीं लगा पाई पता

सोवियत संघ के प्रभाव वाले काल से लेकर आज के आधुनिक युग तक, कई खोजकर्ताओं ने इस गुमनाम कब्र को ढूंढने की बहुतेरी कोशिश की है. नेशनल ज्योग्राफिक के एक्सप्लोरर अल्बर्ट लिन जैसे शोधकर्ताओं ने सैटेलाइट इमेजरी, ग्राउंड-पेनेट्रेटिंग रडार और नॉन-इन्वेसिव तकनीकों का उपयोग करके इस क्षेत्र का डिजिटल सर्वेक्षण किया. फिर वे सही जगह का पता नहीं लगा पाए.

जो लोग चंगेज खान की कब्र की खोज में आए, उन्हें भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ा. उनमें से कई मारे गए, जबकि कई बुरी तरह बीमार हो गए. इसकी एक नहीं बल्कि कई वजहें थीं.

बेहद मुश्किल जलवायु परिस्थितियां

पवित्र पर्वत श्रृंखला 'बर्खान खल्डुन'के आसपास गर्मियों में तापमान 38 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, तो सर्दियों में यह -46°C तक गिर जाता है. यहां सर्दियों में इतनी ठंड पड़ती है कि याक तक दम तोड़ देते हैं. इलाके में कई बार अचानक बाढ़ भी आती रही है. घने जंगल भी इस जगह को दुरुह बना देते हैं.

चंगेज खान की कब्र ढूंढने निकले कई लोग इस इलाके में सांप के काटने, फ्रॉस्टबाइट अत्यधिक ठंड से अंगों के सुन्न होने और चट्टानों से गिरने जैसी दुर्घटनाओं के शिकार हो चुके हैं. एक व्यक्ति ने तो इस काम में अपने जीवन के 40 साल बिता दिए. इसके बावजूद वह कब्र का पता न लगा सका और बिना किसी सफलता के इस दुनिया से चला गया.

दुनिया के बना हुआ है बड़ा रहस्य

कुल मिलाकर, चंगेज खान का मकबरा आज भी दुनिया के लिए एक बड़ा रहस्य बना हुआ है. शायद यह सुदूर कहीं अंतरिक्ष में बैठी चंगेज खान की आत्मा को सबसे अधिक संतुष्टि देती होगी. बात केवल चंगेज खान की नहीं है. यह मंगोल राष्ट्र की पहचान, उसकी सांस्कृतिक विरासत और उस अटूट अनुशासन का प्रतीक है, जिसे दुनिया आज भी पूरी तरह से भेद नहीं पाई है. चाहे आधुनिक तकनीक कितनी भी आगे बढ़ जाए, धरती के इस सबसे क्रूर विश्व विजेता की अंतिम विश्राम स्थली का रहस्य शायद ही कभी दुनिया के सामने आ सकेगा. 
 

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About the Author

Devinder Kumar

Devinder Kumar

अनुभवी पत्रकार और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक हैं. पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. अमर उजाला और नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने के बाद, वर्तमान में वे Zee News में कार्यरत हैं. देश-दुनिया और ब्रेकिंग न्यूज पर नजर रखते हैं. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक घटनाक्रमों और खोजपरक पत्रकारिता में विशेष पकड़ है.
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