फ्रांस समेत यूरोप के अन्य देशों में हो रहे प्रदर्शनों से कई नए नारे भी मिले हैं. इन्हीं में से एक नारा 'Bismillah, c’est les ténèbres' है. जो ना सिर्फ फ्रांस बल्कि कई और देशों में भी चर्चा का विषय बन गया है. जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने भी इस नारे को दोहराया. जिसके बाद धीरे-धीरे यह फ्रांस से बाहर बेल्जियम और इटली के प्रदर्शनों तक पहुंच गया. दिलचस्प बात यह है कि इस नारे का इस्तेमाल पुलिस के खिलाफ मजाकिया तौर पर किया जा रहा है. चलिए जानते हैं कि इस नारे का मतलब क्या और क्यों यह चर्चा का विषय बना हुआ है.
सबसे पहले जानते हैं कि इस नारे की शुरुआत कैसे हुई. दरअसल फ्रांस में चल रहे प्रदर्शनों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म स्नैपचैट का अहम रोल है. छात्रों ने स्नैपचैट पर ग्रुप बनाए हुए हैं और उसी पर अपनी रणनीति बनाते हैं. फ्रांसीसी अखबार 'Le Progrès' ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि इसी बीच ‘Mamadou’ नाम के एक यूजर ने ग्रुप में शामिल होने के लिए मैसेज भेजा और वो मैसेज था, 'Salut ! Bismillah c’est les ténèbres. C’est quand le blocus wallah mon frangin. On va tous casser. Met moi dans le groupe blocus Aichek'. जिसका हिंदी अर्थ है, 'हाय! बिस्मिल्लाह, यह अंधकार है. नाकेबंदी कब होगी, भाई? हम सब कुछ तोड़ देंगे. मुझे नाकेबंदी वाले ग्रुप में जोड़ दो, शुक्रिया!'
छात्रों को इस मैसेज की भाषा बेहद अजीब लगी और उन्हें शक हुआ कि यह कोई छात्र नहीं है. यह कोई और है जो उनके ग्रुप में शामिल होना चाहता और उनकी रणनीति पर नजर रखना चाहता है और वो छात्र बनकर बात करने की कोशिश कर रहा है. संभव है कि कोई पुलिसकर्मी ऐसा कर रहा हो, लेकिन वो अपनी मैसेज की अजीब भाषा के चलते संदेह में आ गया. क्योंकि मैसेज में अरबी और फ्रेंच भाषा के शब्दों को अजीब तरीके से मिलाया गया था.
फ्रांसीसी अखबार 'Le Progrès' के मुताबिक धीरे-धीरे इस मैसेज का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर फैल गया. छात्रों ने इस अटपटे वाक्यांश को अपनाया और मजेदार वीडियो भी इसको लेकर बनाने लगे. उन्होंने इसे अपने प्रदर्शन के पोस्टरों पर भी लिखना शुरू कर दिया और यह सब एक मजाकिया अंदाज में किया जा रहा था. फ्रांस की न्यू एंटी-कैपिटलिस्ट पार्टी ने भी इस वाक्यांश का इस्तेमाल युवाओं के अधिकारों से जुड़े एक पोस्टर में किया. जगह-जगह इस्तेमाल होने के चलते यह नारा छोटा होकर 'C’est les ténèbres' रह गया.
फ्रांस के अंदर चल रहे प्रदर्शन की शुरुआत सितंबर के मध्य में क्रेतेइल (Créteil) शहर से हुई और बहुत जल्द ही इन प्रदर्शनों ने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया. छात्रों ने स्कूल के लंबे समय, खचाखच भरी कक्षाओं, जर्जर होती स्कूल इमारतों और शिक्षकों की गैरमौजूदगी के खिलाफ विरोध जताया है. कई लोगों का तर्क है कि इन समस्याओं का सबसे बुरा असर मजदूर वर्ग के इलाकों और अल्पसंख्यक समुदायों पर पड़ रहा है. सिर्फ 2 अक्टूबर को ही, प्रदर्शनों और नाकेबंदी के की वजह से लगभग 400 स्कूल बंद रहे. बाद में 17 अक्टूबर को छात्रों का यह विरोध-प्रदर्शन जीवन-यापन की बढ़ती लागत के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शनों में शामिल हो गया, जो दंगे और लूटपाट में बदल गया. इस दौरान हजारों की तादाद में प्रदर्शनकारियों और दंगाइयों को हिरासत में लिया गया.