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जंग में बचेगी जान: यूक्रेन ने मोर्चे पर उतारा Combat Exoskeleton, 20 KM/H की रफ्तार से दौड़ेगा गोलियां चलाता 'रोबोटिक' सैनिक

राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की की फौज ने फ्रंट लाइन पर दुनिया की पहली 'हाइब्रिड रोबोटिक आर्मी' उतार दी है. यूक्रेन के सैनिक अब 'कॉम्बैट एक्सोस्केलेटन' और 'एंटी-ड्रोन सुरक्षात्मक फ्रेम' पहनकर मौत बरसते मैदानों में दुश्मनों को धूल चटा रहे हैं.

Written By Shwetank Ratnamber
Published: Sep 27, 2026, 03:53 PM IST | Updated: Sep 28, 2026, 12:34 PM IST
Image Credit: Combat Exoskeleton(AI)
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Russia Ukraine War: दुनिया ने अब तक रोबोटिक सैनिकों और लोहे के सूट को सिर्फ हॉलीवुड की साइंस फिक्शन फिल्मों में देखा था, लेकिन आज जेलेंस्की की फौज ने इसे यूक्रेन के जलते हुए मैदानों में सच साबित कर दिया है. यूक्रेन ने फ्रंट लाइन पर अपनी सबसे एडवांस 'कॉम्बैट एक्सोस्केलेटन' प्रणालियों को पूरी तरह एक्टिव कर दिया है. आखिर ये तकनीक कैसे एक आम सैनिक को लोहे का सिपाही बना देती है, देखिए इस रिपोर्ट में.

विज्ञान की कथाओं, फिल्मों में आपने आयरन मैन या हॉलीवुड की 'एज ऑफ टुमॉरो' जैसी फिल्मों में सैनिकों को लोहे के सूट पहनकर लड़ते देखा होगा. लेकिन रूस और यूक्रेन के बीच चल रही असली जंग में अब ये हकीकत बन चुका है.

चारों तरफ बरसते गोले और आसमान में रूसी ड्रोन

ऐसे खौफनाक मंजर के बीच यूक्रेनी सेना ने एक ऐसा दांव खेला है जिसने रूस के कमांडरों के होश उड़ा दिए हैं. यूक्रेन के रक्षा नवाचार प्लेटफॉर्म 'BRAVE1' के तहत विकसित किए गए 'कॉम्बैट एक्सोस्केलेटन' अब फ्रंट लाइन पर सैनिकों की सबसे बड़ी ढाल बन चुके हैं. ये कोई साधारण लोहे का ढांचा नहीं है, बल्कि मानव शरीर की क्षमता को कई गुना बढ़ाने वाली एक आधुनिक मशीन है.

'रोबो' आर्मी की खासियत

ये सैनिक की पीठ और पैरों पर पड़ने वाले शारीरिक दबाव को 30% तक कम करता है.
महज 2 किलो का ये मैकेनिकल ढांचा सैनिक को 70 किलो तक का भार आसानी से उठाने की ताकत देता है.
एल्युमीनियम मॉडल में लगे सेंसर्स सही कमांड देते हैं, जिससे वो 20 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ सकते हैं.

जेलेंस्की की हाइटेक आर्मी

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तकनीक को मुख्य रूप से दो रूपों में उतारा गया है. पहला है पैसिव मॉडल जो बिना बैटरी के सिर्फ स्प्रिंग और लीवर मैकेनिक्स पर काम करता है. इसे पहनने में सिर्फ दो मिनट का समय लगता है. वहीं दूसरा है एआई-संचालित एक्टिव मॉडल, जिसके सेंसर्स सैनिक की चाल को रीयर-टाइम में समझकर उसकी मांसपेशियों की थकान को पूरी तरह मिटा देते हैं. तोपखाने के जो सैनिक दिनभर में केवल 50 भारी गोले उठा पाते थे, वे अब बिना थके 75 से ज्यादा गोले दाग रहे हैं.

लेकिन इस तकनीक का सबसे घातक रूप है एंटी-ड्रोन सुरक्षा फ्रेम.

रूसी FPV सुसाइड ड्रोन से जान बचाने में आसानी

आज के युद्ध में रूसी FPV सुसाइड ड्रोन यूक्रेन के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं. इनसे बचने के लिए सैनिकों को भारी-भरकम 'इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर' यानी EW जैमर्स और एक्स्ट्रा सुरक्षा कवच ढोना पड़ता था. अब इस एक्सोस्केलेटन के ऊपर ही एक सुरक्षा घेरा यानी एंटी-ड्रोन फ्रेम लगा दिया गया है. ये ढांचा भारी जैमर्स के वजन को खुद संभाल लेता है और सैनिक के चारों तरफ एक ऐसा अदृश्य सुरक्षा कवच बना देता है, जिससे टकराकर ड्रोन हवा में ही रास्ता भटक कर तबाह हो जाते हैं.

यूक्रेन के लिए वरदान

फिलहाल इसे पूरी यूक्रेन आर्मी के लिए अनिवार्य नहीं किया गया है, लेकिन फ्रंट लाइन, रसद सप्लाई और घायल सैनिकों को बचाने वाली रेस्क्यू टीमों के लिए ये एक 'स्टैंडर्ड हथियार' बनता जा रहा है. 

दरअसल सैनिकों की कमी से जूझ रहे यूक्रेन के लिए ये तकनीक किसी वरदान से कम नहीं है, क्योंकि ये कम उम्र या कम शारीरिक क्षमता वाले रंगरूटों को भी पल भर में 'सुपर-सोल्जर' बना देती है.

साफ है कि यूक्रेन ने पहली बार वास्तविक युद्ध में एक्सोस्केलेटन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करके भविष्य के युद्ध की परिभाषा बदल दी है. अब लड़ाई सिर्फ इंसानी जज्बे की नहीं, बल्कि इंसानी शरीर और रोबोटिक तालमेल की बन चुकी है.

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About the Author

श्वेतांक रत्नाम्बर वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी और डिजिटल न्यूज़ मीडिया में 22 वर्षों से ज्यादा का व्यापक अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News (Hindi) की डिजिटल टीम में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय (देश-दुनिया) खबरों की डेस्क पर कार्यरत हैं. समसामयिक मुद्दों, वैश्विक राजनीति और कूटनीति पर गहरी समझ रखने वाले श्वेतांक जटिल अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों और राजनीतिक समीकरणों का सटीक विश्लेषण करने के विशेषज्ञ हैं.Zee News डिजिटल से पहले उन्होंने ज़ी मीडिया नेटवर्क के ग्लोबल न्यूज़ चैनल 'WION' के साथ काम किया है. इस दौरान उन्होंने 'Gravitas', 'The West Asia Post' और 'One Africa' जैसे कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्राइम-टाइम शोज़ के हिंदी प्रोडक्शन और इंटरप्रिटेशन में अहम भूमिका निभाई. 2004 से शुरू हुए अपने पत्रकारिता करियर में श्वेतांक ने रिपोर्टिंग और एंकरिंग के साथ-साथ चार लोकसभा और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की व्यापक ग्राउंड कवरेज की है.जामिया मिल्लिया इस्लामिया (JMI), नई दिल्ली से जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा के बाद मास कम्युनिकेशन और पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स डिग्री हासिल करने वाले श्वेतांक लंबे समय से 'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया' (PCI) के सम्मानित सदस्य हैं.आप श्वेतांक रत्नाम्बर से सीधे shwetank.ratnamber@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा आप उनसे एक्स (ट्विटर), मेटा (फेसबुक) और लिंक्डइन पर भी कनेक्ट कर सकते हैं.' 
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